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शुक्रवार, 30 मई 2014

आज नारी की छवि

आज नारी की छवि 
या तो साहसहीन, निर्बल, भीरू की है या फ़िर उसे भोग्य वस्तु बनाकर पेश किया जाता है| इसका प्रसार मिडिया ने तो किया ही है लेकिन कुछ सम्प्रदाय भी नारी के बारे में यही राय रखते हैं| जिसके कारण समाज की अत्यधिक गिरावट हुई है| नारी की इस अवहेलना और अनादर से ही आज हम असामयिक मौतें , भय और अन्याय से ग्रस्त हैं|
वेदों की घोषणा को महर्षि मनु अपनी संहिता में देते हुए कहते हैं (३३.५६) : “जो समाज स्त्री का आदर करता है वह स्वर्ग है और जहां स्त्री का अपमान होता है, वहां किए गए सत्कर्म भी ख़त्म हो जाते हैं|” वेदों के इस महत्वपूर्ण सन्देश की अनदेखी के कारण ही भारत एक ऐसा गुलाम राष्ट्र बना जिसे गुलामों द्वारा ही चलाया जाता रहा और यही कारण है कि आज बहुत सारी तथाकथित प्रगति के बावजूद भी दुनिया एक खतरनाक और दाहक जगह बन गई है| महिलाएं – जो साहस का उद्गम हैं उनको यथोचित सम्मान न मिलना ही इस का मूल कारण है|
अगर हम ने स्त्रियों को भोगविलास और नुमाइश की वस्तु मान लिया तो कर्मफल व्यवस्था के अनुसार हमें अत्यंत कठोर परिणाम भुगतने होंगे और यही हो रहा है| लेकिन अगर हम मातृशक्ति को साहस और हमारी समस्त अच्छाइयों का प्रतिमान मान लें तो हम संसार को स्वर्ग बना सकेंगे|
वेदों पर आधारित एक बलिष्ठ और सशक्तसमाज में स्त्री का सहज गुण उसका साहस है| उसका यह साहस उसकी अपनी आत्मा औरमन के बल से उपजता है,यह साहस कोई दुस्साहस नहीं है|
देखें, वेद क्या कह रहे हैं –
अथर्ववेद १४. १. ४७ – हे नारी, तू समाज की आधारशिला है| तेरे लिये हम सुखदायक अचल शिलाखंड को रखते हैं| इस शिलाखंड के ऊपर खड़ी हो, यह तुझे दृढ़ता का पाठ पढ़ायेगा| इस शिलाखंड के अनुरूप तू भी वर्चस्विनी बन जिससे संसार में आनंदपूर्वक रह सके| तेरी आयु सुदीर्घ हो ताकि हम तेरे तेज को पा सकें|
यजुर्वेद ५.१० – हे नारी, तू स्वयं को पहचान| तू शेरनी है| हे नारी, तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटनेवाली है, तू दिव्य गुणों के प्रचार के लिए स्वयं को शुद्ध कर| हे नारी, तू दुष्कर्मों एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विध्वस्त करने वाली है, सभी के हित के लिए तू दिव्य गुणों को धारण कर|
यजुर्वेद ५.१२ – हे नारी तू शेरनी है, तू आदित्य ब्रह्मचारियों को जन्म देती है, हम तेरी पूजा करते हैं| हे नारी, तू शेरनी है, तू समाज में महापुरुषों को जन्म देती है, हम तेरा यशोगान करते हैं| हे नारी, तू शेरनी है, तू श्रेष्ट संतान को देनेवाली है, तू धन की पुष्टि को देनेवाली है, हम तेरा जयजयकार करते हैं, हे नारी, तू शेरनी है, तू समाज को आनंद और समृद्धि देती है, हम तेरा गुणगान करते हैं| हे नारी, सभी प्राणियों के हित के लिए हम तुझे नियुक्त करते हैं|
यजुर्वेद १०.२६ – हे नारी, तू सुख़देनेवाली है, तू सुदृढ़ स्थितिवाली है, तू क्षात्र बल की भंडार है, तू साहसका उद्गम है| तेरा स्थान समाज में गौरवशाली है|
यजुर्वेद १३.१६ – हे नारी, तू ध्रुव है, अटल निश्चयवाली है, सुदृढ़ है, तू हम सब का आधार है| परमपिता परमेश्वर ने तुझे विद्या, वीरता आदि गुणों से भरा है| समुद्रके समान उमड़ने वाली शत्रु सेनाएं भी तुझे हानि न पहुंचा सकें, गिद्ध केसमान आक्रान्ता तुझे हानि न पहुंचा सकें| किसी से पीड़ित न होती हुई तूविश्व को समृद्ध कर| (अर्थात् पूरे समाज को नारी की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए, ताकि वह समाज में अपना योगदान दे सके| नारी के गौरव के लिए अपने प्राण तक उत्सर्ग करने वाले वीरों का यह प्रेरणा सन्देश है|)
यजुर्वेद १३.१८ – हे नारी, तू अद्भुत सामर्थ्य वाली है| तू भूमि के समान दृढ़ है| तू समस्त विश्व के लिए मां है| तू सकल लोक का आधार है| तू विश्व को कुमार्ग पर जाने से रोक, विश्व को दृढ़ कर और हिंसा मत होने दे| (हर स्त्री को मां के रूप में सम्मान देने से ही समाज में शांति, स्थिरता और समृद्धि आएगी| इस के विपरीत स्त्रियों का भोगवादी चित्रण समाज में दुखों और आपत्तियों का कारण है| आज आदर्श रूप में झाँसी की रानी, अहिल्याबाई आदि वीरांगनाओं को सामने रखना होगा|)

यजुर्वेद १३.२६ – हे नारी, तू विघ्न – बाधाओं से पराजित होने योग्य नहीं है बल्कि विघ्न- बाधाओं को पराजित कर सकने वाली है| तू शत्रुओं को परास्त कर, सैन्य- बल को परास्त कर| तुझ में सहस्त्र पुरुषों का पराक्रम है| अपने असली सामर्थ्य को पहचान और अपनी वीरता प्रदर्शित कर के तू विश्व को प्रसन्नता प्रदान कर|
यजुर्वेद २१.५ – हे नारी, तू महाशाक्तिमती है, तू श्रेष्ठ पुत्रों की माता है| तू सत्यशील पति की पत्नी है| तू भरपूर क्षात्रबल से युक्त है| तू शत्रु के आक्रमण से जीर्ण न होनेवाली है| तू अतिशय कर्मण्य है| तू शुभ कल्याण करनेवाली है| तू शुभ नीति का अनुसरण करनेवाली है| हम तुझे रक्षा के लिए पुकारते हैं| (अर्थात् गलत मार्ग पर चलने वाले पति का अन्धानुकरण न करके पत्नी को सत्य और न्याय की स्थापना के लिए आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि नारी में असीम शक्ति का निवास है|)
ऋग्वेद ८.६७.१० – हे खंडित न होने वाली, सदा अदीन बनी रहने वाली पूजा योग्य नारी, हम तुझे परिवार एवं राष्ट्र में उत्कृष्ट सुख़ बरसाने के लिए पुकारते हैं ताकि हम अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त कर सकें|
ऋग्वेद ८.१८.५ – हे नारी, जैसे तू शत्रु से खंडित न होनेवाली, सदा अदीन रहनेवाली वीरांगना है वैसे ही तेरे पुत्र भी अद्वितीय वीर हैं जो महान कार्यों का बीड़ा उठानेवाले हैं| वे स्वप्न में भी पाप का विचार अपने मन में नहीं आने देते, फ़िर पाप- आचरण तो क्या ही करेंगे! वे द्वेषी शत्रु से भी लोहा लेना जानते हैं क्योंकि तुम मां हो|
यजुर्वेद १४.१३ – हे नारी, तू रानी है| तू सूर्योदय की पूर्व दिशा के समान तेजोमयी है! तू दक्षिण दिशा के समान विशाल शक्तिवाली है| तू सम्राज्ञी है, पश्चिम दिशा के समान आभामयी है| तू अपनी विशेष कांति से भासमान है, उत्तर दिशा के समान प्राणवती है| तू विस्तीर्ण आकाश के समान असीम गरिमावाली है|
ऋग्वेद १०.८६.१० – नारी तो आवश्यकता पड़ने पर बलिदान के स्थल संग्राम में भी जाने से नहीं हिचकती| जो नारी सत्य विधान करने वाली है, वीर पुत्रों की माता है, वीर की पत्नी है, वह महिमा पाती है| उसका वीर पति विश्व भर में प्रसिद्धि पाता है|
यजुर्वेद १७.४४ -हे वीर क्षत्रिय नारी, तूशत्रु की विशाल सेनाओं को परास्त कर दे| शत्रुओं के लिए प्रयाण कर, उनकेह्रदयों को शोक से दग्ध कर दे| अधर्म से दूर रह और शत्रुओं को निराशा रूपघोर अंधकार से ग्रस्त कर ताकि वो फ़िर सिर न उठा पाएँ|
यजुर्वेद १७.४५ – विद्वानों द्वारा शिक्षा से तीक्ष्ण हुई एवं प्रशंसित तथा शस्त्र आदि चलाने में कुशल हे नारी, तू शत्रुओं पर टूट पड़| शत्रुओं के पास पहुंचकर उन्हें पकड़ ले और किसी को भी छोड़ मत, कैद करके कारागार में डाल दे|
ऋग्वेद ६.७५.१५ – हेवीर स्त्री, अपराधियों के लिए तुम विष बुझा तीर हो| तुम में अपार पराक्रमहै| उस बाण के समान गतिशील, कर्म कुशल, शूरवीर देवी को हम भूरि- भूरिनमस्कार करते हैं|
ऋग्वेद १०.८६.९ – यह घातक मुझे अवीरा समझ रहा है, मैं तो वीरांगना हूं, वीर पत्नी हूं, आंधी की तरह शत्रु पर टूट पडने वाले वीर मेरे सखा हैं| मेरा पति विश्वभर में वीरता में प्रसिद्ध है|
ऋग्वेद १०.१५९.२ – मैं राष्ट्र की ध्वजा हूं, मैं समाज का सिर हूं| मैं उग्र हूं, मेरी वाणी में बल है| शत्रु – सेनाओं का पराजय करने वाली मैं युद्ध में वीर- कर्म दिखाने के पश्चात ही पति का प्रेम पाने की अधिकारिणी हूं|
ऋग्वेद १०.१५९.३ – मेरे पुत्रों ने समस्त शत्रुओं का संहार कर दिया है| मेरी पुत्री विशेष तेजस्विनी है और मैं भी पूर्ण विजयिनी हूं| मेरे पति में उत्तम कीर्ति का वास है|
ऋग्वेद १०.१५९.४ – मेरे पति ने आत्मोसर्ग की आहुति दे दी है, आज वही आहुति मैंने भी दे दी है| आज मैं निश्चय ही शत्रु रहित हो गई हूं|
ऋग्वेद १०.१५९.५ – मैं शत्रु रहित हो गई हूं, शत्रुओं का मैंने वध कर दिया है, मैंने विजय पा ली है, वैरियों को पराजित कर दिया है| शत्रु – सेनाओं के तेज को मैंने ऐसे नष्ट कर दिया है, जैसे अस्थिर लोगों की संपत्तियां नष्ट हो जाती हैं|
आइए, नारी को उसके सत्य स्वरुप – मां के स्वरुप में पूजें और नारी भी अपने स्व को पहचाने ताकि समाज, राष्ट्र और पूरी मानव जाति का कल्याण हो|
संदर्भ- ऋषि दयानंद के भाष्य, वैदिक नारी – पं. रामनाथ वेदालंकार, वैदिक शब्दार्थ विचार – पं. रामनाथ वेदालंकार, वैदिक कोष – पं. राजवीर शास्त्री|

नियोग और नारी

नियोग और नारी
‘सत्यार्थ प्रकाश’ के चतुर्थ समुल्लास के क्रम सं0 120 से 149 तक की सामग्री पुनर्विवाह और नियोग विषय से संबंधित है। लिखा है कि


द्विजों यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों में पुनर्विवाह कभी नहीं होने चाहिए। (4-121)
स्वामी जी ने पुनर्विवाह के कुछ दोष भी गिनाए हैं जैसे -
(1) पुनर्विवाह की अनुमति से जब चाहे पुरुष को स्त्री और स्त्री को पुरुष छोड़कर दूसरा विवाह कर सकते हैं।
(2) पत्नी की मृत्यु की स्थिति में अगर पुरुष दूसरा विवाह करता है तो पूर्व पत्नी के सामान आदि को लेकर और यदि पति की मृत्यु की स्थिति में स्त्री दूसरा विवाह करती है तो पूर्व पति के सामान आदि को लेकर कुटुम्ब वालों में झगड़ा होगा।
(3) यदि स्त्री और पुरुष दूसरा विवाह करते हैं तो उनका पतिव्रत और स्त्रीव्रत धर्म नष्ट हो जाएगा।
(4) विधवा स्त्री के साथ कोई कुंवारा पुरुष और विधुर पुरुष के साथ कोई कुंवारी कन्या विवाह न करेगी। अगर कोई ऐसा करता है तो यह अन्याय और अधर्म होगा। ऐसी स्थिति में पुरुष और स्त्री को नियोग की आवश्यकता होगी और यही धर्म है। (4-134)

किसी ने स्वामी जी से सवाल किया कि अगर स्त्री अथवा पुरुष में से किसी एक की मृत्यु हो जाती है और उनके कोई संतान भी नहीं है तब अगर पुनर्विवाह न हो तो उनका कुल नष्ट हो जाएगा। पुनर्विवाह न होने की स्थिति में व्यभिचार और गर्भपात आदि बहुत से दुष्ट कर्म होंगे। इसलिए पुनर्विवाह होना अच्छा है। (4-122)
जवाब दिया गया कि ऐसी स्थिति में स्त्री और पुरुष ब्रह्मचर्य में स्थित रहे और वंश परंपरा के लिए स्वजाति का लड़का गोद ले लें। इससे कुल भी चलेगा और व्यभिचार भी न होगा और अगर ब्रह्मचारी न रह सके तो नियोग से संतानोत्पत्ति कर ले। पुनर्विवाह कभी न करें। आइए अब देखते हैं कि ‘नियोग’ क्या है ?

अगर किसी पुरुष की स्त्री मर गई है और उसके कोई संतान नहीं है तो वह पुरुष किसी नियुक्त विधवा स्त्री से यौन संबंध स्थापित कर संतान उत्पन्न कर सकता है। गर्भ स्थिति के निश्चय हो जाने पर नियुक्त स्त्री और पुरुष के संबंध खत्म हो जाएंगे और नियुक्ता स्त्री दो-तीन वर्ष तक लड़के का पालन करके नियुक्त पुरुष को दे देगी। ऐसे एक विधवा स्त्री दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य पुरुषों के लिए अर्थात कुल 10 पुत्र उत्पन्न कर सकती है। (यहाँ यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि कन्या उत्पन्न होती है तो नियोग की क्या ‘शर्ते रहेगी ?) इसी प्रकार एक विधुर दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य विधवाओं के लिए पुत्र उत्पन्न कर सकता है। ऐसे मिलकर 10-10 संतानोत्पत्ति की आज्ञा वेद में है।
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।
(ऋग्वेद 10-85-45)
भावार्थ ः ‘‘हे वीर्य सेचन हार ‘शक्तिशाली वर! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।’’ (4-125)

वेद की आज्ञा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णस्थ स्त्री और पुरुष दस से अधिक संतान उत्पन्न न करें, क्योंकि अधिक करने से संतान निर्बल, निर्बुद्धि और अल्पायु होती है। जैसा कि उक्त मंत्र से स्पष्ट है कि नियोग की व्यवस्था केवल विधवा और विधुर स्त्री और पुरुषों के लिए नहीं है बल्कि पति के जीते जी पत्नी और पत्नी के जीते जी पुरुष इसका भरपूर लाभ उठा सकते हैं। (4-143)

आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृराावन्नजामि।
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पति मत्।
(ऋग्वेद 10-10-10)
भावार्थ ः ‘‘नपुंसक पति कहता है कि हे देवि! तू मुझ से संतानोत्पत्ति की आशा मत कर। हे सौभाग्यशालिनी! तू किसी वीर्यवान पुरुष के बाहु का सहारा ले। तू मुझ को छोड़कर अन्य पति की इच्छा कर।’’
इसी प्रकार संतानोत्पत्ति में असमर्थ स्त्री भी अपने पति महाशय को आज्ञा दे कि हे स्वामी! आप संतानोत्पत्ति की इच्छा मुझ से छोड़कर किसी दूसरी विधवा स्त्री से नियोग करके संतानोत्पत्ति कीजिए।

अगर किसी स्त्री का पति व्यापार आदि के लिए परदेश गया हो तो तीन वर्ष, विद्या के लिए गया हो तो छह वर्ष और अगर धर्म के लिए गया हो तो आठ वर्ष इंतजार कर वह स्त्री भी नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकती है। ऐसे ही कुछ नियम पुरुषों के लिए हैं कि अगर संतान न हो तो आठवें, संतान होकर मर जाए तो दसवें और कन्या ही हो तो ग्यारहवें वर्ष अन्य स्त्री से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकता है। पुरुष अप्रिय बोलने वाली पत्नी को छोड़कर दूसरी स्त्री से नियोग का लाभ ले सकता है। ऐसा ही नियम स्त्री के लिए है। (4-145)

प्रश्न सं0 149 में लिखा है कि अगर स्त्री गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए और पुरुष दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो ऐसी स्थिति में दोनों किसी से नियोग कर पुत्रोत्पत्ति कर ले, परन्तु वेश्यागमन अथवा व्यभिचार कभी न करें। (4-149)
लिखा है कि नियोग अपने वर्ण में अथवा उत्तम वर्ण और जाति में होना चाहिए। एक स्त्री 10 पुरुषों तक और एक पुरुष 10 स्त्रियों तक से नियोग कर सकता है। अगर कोई स्त्री अथवा पुरुष 10वें गर्भ से अधिक समागम करे तो कामी और निंदित होते हैं। (4-142) विवाहित पुरुष कुंवारी कन्या से और विवाहित स्त्री कुंवारे पुरुष से नियोग नहीं कर सकती।
पुनर्विवाह और नियोग से संबंधित कुछ नियम, कानून, ‘शर्ते और सिद्धांत आपने पढ़े जिनका प्रतिपादन स्वामी दयानंद ने किया है और जिनको कथित लेखक ने वेद, मनुस्मृति आदि ग्रंथों से सत्य, प्रमाणित और न्यायोचित भी साबित किया है। व्यावहारिक पुष्टि हेतु कुछ ऐतिहासिक प्रमाण भी कथित लेखक ने प्रस्तुत किए हैं और साथ-साथ नियोग की खूबियां भी बयान की हैं। इस कुप्रथा को धर्मानुकूल और न्यायोचित साबित करने के लिए लेखक ने बौद्धिकता और तार्किकता का भी सहारा लिया है। कथित सुधारक ने आज के वातावरण में भी पुनर्विवाह को दोषपूर्ण और नियोग को तर्कसंगत और उचित ठहराया है। आइए उक्त धारणा का तथ्यपरक विश्लेषण करते हैं।
ऊपर (4-134) में पुनर्विवाह के जो दोष स्वामी दयानंद ने गिनवाए हैं वे सभी हास्यास्पद, बचकाने और मूर्खतापूर्ण हैं। विद्वान लेखक ने जैसा लिखा है कि दूसरा विवाह करने से स्त्री का पतिव्रत धर्म और पुरुष का स्त्रीव्रत धर्म नष्ट हो जाता है परन्तु नियोग करने से दोनों का उक्त धर्म ‘ाुद्ध और सुरक्षित रहता है। क्या यह तर्क मूर्खतापूर्ण नहीं है ? आख़िर वह कैसा पतिव्रत धर्म है जो पुनर्विवाह करने से तो नष्ट और भ्रष्ट हो जाएगा और 10 गैर पुरुषों से यौन संबंध बनाने से सुरक्षित और निर्दोष रहेगा ?

अगर किसी पुरुष की पत्नी जीवित है और किसी कारण पुरुष संतान उत्पन्न करने में असमर्थ है तो इसका मतलब यह तो हरगिज़ नहीं है कि उस पुरुष में काम इच्छा ;ैमगनंस कमेपतम) नहीं है। अगर पुरुष के अन्दर काम इच्छा तो है मगर संतान उत्पन्न नहीं हो रही है और उसकी पत्नी संतान के लिए किसी अन्य पुरुष से नियोग करती है तो ऐसी स्थिति में पुरुष अपनी काम तृप्ति कहाँ और कैसे करेगा ? यहाँ यह भी विचारणीय है कि नियोग प्रथा में हर जगह पुत्रोत्पत्ति की बात कही गई है, जबकि जीव विज्ञान के अनुसार 50 प्रतिशत संभावना कन्या जन्म की होती है। कन्या उत्पन्न होने की स्थिति में नियोग के क्या नियम, कानून और ‘शर्ते होंगी, यह स्पष्ट नहीं किया गया है ?

जैसा कि स्वामी जी ने कहा है कि अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो भी पुरुष नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न कर सकता है। यहाँ यह तथ्य विचारणीय है कि अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो इसके लिए स्त्री नहीं, पुरुष जिम्मेदार है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि मानव जाति में लिंग का निर्धारण नर द्वारा होता है न कि मादा द्वारा।
यह भी एक तथ्य है कि पुनर्विवाह के दोष और हानियाँ तथा नियोग के गुण और लाभ का उल्लेख केवल द्विज वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए किया गया है। चैथे वर्ण ‘शूद्र को छोड़ दिया गया है। क्या ‘शुद्रों के लिए नियोग की अनुमति नहीं है ? क्या ‘शूद्रों के लिए नियोग की व्यवस्था दोषपूर्ण और पाप है ?
जैसा कि लिखा है कि अगर पत्नी अथवा पति अप्रिय बोले तो भी वे नियोग कर सकते हैं। अगर किसी पुरुष की पत्नी गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए अथवा पति दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो दोनों कहीं उचित साथी देखकर नियोग कर सकते हैं। क्या यहाँ सारे नियमों और नैतिक मान्यताओं को लॉकअप में बन्द नहीं कर दिया गया है ? क्या नियोग का मतलब स्वच्छंद यौन संबंधों ;ैमग थ्तमम) से नहीं है ? क्या इससे निम्न और घटिया किसी समाज की कल्पना की जा सकती है?

कथित विद्वान लेखक ने नियोग प्रथा की सत्यता, प्रमाणिकता और व्यावहारिकता की पुष्टि के लिए महाभारत कालीन सभ्यता के दो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। लिखा है कि व्यास जी ने चित्रांगद और विचित्र वीर्य के मर जाने के बाद उनकी स्त्रियों से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न की। अम्बिका से धृतराष्ट्र, अम्बालिका से पाण्डु और एक दासी से विदुर की उत्पत्ति नियोग प्रक्रिया द्वारा हुई। दूसरा उदाहरण पाण्डु राजा की स्त्री कुंती और माद्री का है। पाण्डु के असमर्थ होने के कारण दोनों स्त्रियों ने नियोग विधि से संतान उत्पन्न की। इतिहास भी इस बात का प्रमाण है।
जहाँ तक उक्त ऐतिहासिक तथ्यों की बात है महाभारत कालीन सभ्यता में नियोग की तो क्या बात कुंवारी कन्या से संतान उत्पन्न करना भी मान्य और सम्मानीय था। वेद व्यास और भीष्म पितामह दोनों विद्वान महापुरुषों की उत्पत्ति इस बात का ठोस सबूत है। दूसरी बात महाभारत कालीन समाज में एक स्त्री पांच सगे भाईयों की धर्मपत्नी हो सकती थी। पांडव पत्नी द्रौपदी इस बात का ठोस सबूत है। तीसरी बात महाभारत कालीन समाज में तो बिना स्त्री संसर्ग के केवल पुरुष ही बच्चें पैदा करने में समर्थ होता था।

महाभारत का मुख्य पात्र गुरु द्रोणाचार्य की उत्पत्ति उक्त बात का सबूत है। चैथी बात महाभारतकाल में तो चमत्कारिक तरीके से भी बच्चें पैदा होते थे। पांचाली द्रौपदी की उत्पत्ति इस बात का जीता-जागता सबूत है। अतः उक्त समाज में नियोग की क्या आवश्यकता थी ? यहाँ यह भी विचारणीय है कि व्यास जी ने किस नियमों के अंतर्गत नियोग किया ? दूसरी बात नियोग किया तो एक ही समय में तीन स्त्रियों से क्यों किया? तीसरी बात यह कि एक मुनि ने निम्न वर्ण की दासी के साथ क्यों समागम किया ? चैथी बात यह कि कुंती ने नियम के विपरीत नियोग विधि से चार पुत्रों को जन्म क्यों दिया ? विदित रहे कि कुंती ने कर्ण, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन चार पुत्रों को जन्म दिया और ये सभी पाण्डु कहलाए। पांचवी बात यह कि जब उस समाज में नियोग प्रथा निर्दोष और मान्य थी तो फिर कुंती ने लोक लाज के डर से कर्ण को नदी में क्यों बहा दिया ? छठी बात यह है कि वे पुरुष कौन थे जिन्होंने कुंती से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न की ? स्वामी जी ने बहुविवाह का निषेध किया है जबकि उक्त सभ्यता में बहुविवाह होते थे। अब क्या जिस समाज से स्वामी जी ने नियोग के प्रमाण दिए हैं, उस समाज को एक उच्च और आदर्श वैदिक समाज माना जाए ?
‘सत्यार्थ प्रकाश’ के ‘शंका-समाधान परिशिष्ट में पं0 ज्वालाप्रसाद ‘ार्मा द्वारा नियोग प्रथा के समर्थन में अनेक प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। लिखा है कि प्राचीन वैदिक काल में कुलनाश के भय से ऋषि-मुनि, विद्वान, महापुरुषों से नियोग द्वारा वीर्य ग्रहण कर उच्च कुल की स्त्रियां संतान उत्पन्न करती थी। जो प्रमाण पंडित जी ने प्रस्तुत किए हैं वे सभी महाभारत काल के हैं। क्या महाभारत काल ही प्राचीन वैदिक काल था ? क्या नियोग ही ऋषियों का एक मात्र प्रयोजन था?
यहाँ यह तथ्य भी विचारणीय है कि अगर स्वामी दयानंद सरस्वती नियोग को एक वेद प्रतिपादित और स्थापित व्यवस्था मानते थे तो उन्होंने इस परंपरा का खुद पालन करके अपने अनुयायियों के लिए आदर्श प्रस्तुत क्यों नहीं किया ? इससे स्वामी जी के चरित्र को भी बल मिलता और एक मृत प्रायः हो चुकी वैदिक परंपरा पुनः जीवित हो जाती। यह भी एक अजीब विडंबना है कि जिस वैदिक मंत्र से स्वामी जी ने नियोग परंपरा को प्रतिपादित किया है उसी मंत्र से अन्य वेद विद्वानों और भाष्यकारों ने विधवा पुनर्विवाह का प्रतिपादन किया है। निम्न मंत्र देखिए -
‘‘कुह स्विद्दोषा कुह वस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोषतुः।
को वां ‘ात्रुया विधवेव देवरं मंर्य न योषा कृणुते सधस्य आ।।
(ऋग्वेद, 10-40-2)
‘‘उदीष्र्व नार्यभिजीवलोकं गतासुमेतमुप ‘ोष एहि।
हस्तग्राभस्य दिधिशोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ।।’’
(ऋग्वेद, 10-18-8)
उक्त दोनों मंत्रों से जहाँ स्वामी दयानंद सरस्वती ने नियोग प्रथा का भावार्थ निकाला है वहीं ओमप्रकाश पाण्डेय ने इन्हीं मंत्रों का उल्लेख विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में किया है। अपनी पुस्तक ‘‘वैदिक साहित्य और संस्कृति का स्वरूप’’ में उन्होंने लिखा है कि वेदकालीन समाज में विधवा स्त्रियों को पुनर्विवाह की अनुमति प्राप्त थी। उक्त मंत्र (10-18-8) का भावार्थ उन्होंने निम्न प्रकार किया है -
‘‘हे नारी ! इस मृत पति को छोड़कर पुनः जीवितों के समूह में पदार्पण करो। तुमसे विवाह के लिए इच्छुक जो तुम्हारा दूसरा भावी पति है, उसे स्वीकार करो।’’
इसी मंत्र का भावार्थ वैद्यनाथ ‘शास्त्री द्वारा निम्न प्रकार किया गया है -
‘‘जब कोई स्त्री जो संतान आदि करने में समर्थ है, विधवा हो जाती है तब वह नियुक्त पति के साथ संतान उत्पत्ति के लिए नियोग कर सकती है।’’
उक्त मंत्रों में स्वामी दयानंद ने देवर ‘शब्द का अर्थ जहाँ ‘द्वितीय नियुक्त पति’ लिया है वहीं पाण्डेय जी ने देवर ‘शब्द का अर्थ ‘द्वितीय विवाहित पति’ लिया है। निरुक्त के संदर्भ में पाण्डेय जी ने लिखा है कि यास्क ने अपने निरूक्त में देवर ‘शब्द का निर्वचन ‘द्वितीय वर’ के रूप में ही किया है। उक्त मंत्रों के साथ पाण्डेय जी ने अथर्ववेद का भी एक मंत्र विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में प्रस्तुत किया है। जो निम्न है -
‘‘या पूर्वं पतिं वित्त्वाथान्यं विन्दते परम्।
पत्र्चैदनं च तावजं ददातो न वि योषतः।।
समानलोको भवति पुनर्भुवापरः पतिः।
योऽजं पत्र्चैदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति।।’’
(अथर्वसंहिता 9-5-27,28)
उक्त से स्पष्ट है कि वेद भाष्यों में इतना अधिक अर्थ भेद और मतभेद पाया जाता है कि सत्य और विश्वसनीय धारणाओं का निर्णय करना अत्यंत मुश्किल काम है? यहाँ यह भी विचारणीय है कि विवाह का उद्देश्य केवल संतानोत्पत्ति करना ही नहीं होता बल्कि स्वच्छंद यौन संबंध को रोकना और भावों को संयमित करना भी है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि जो विषय (नारी और सेक्स) एक बाल ब्रह्मचारी के लिए कतई निषिद्ध था, स्वामी जी ने उसे भी अपनी चर्चा और लेखनी का विषय बनाया है।
बेहद अफसोस और दुःख का विषय है कि जहाँ एक विद्वान और समाज सुधारक को पुनर्विवाह और विधवा विवाह का समर्थन करना चाहिए था, वहाँ कथित समाज सुधारक द्वारा नियोग प्रथा की वकालत की गई है और इसे वर्तमान काल के लिए भी उपयुक्त बताया है। क्या यह एक विद्वान की घटिया मनोवृत्ति का प्रतीक नहीं है ? आज की फिल्में जो कतई निम्न स्तर का प्रदर्शन करती हैं, उनमें भी कहीं इस प्रथा का प्रदर्शन और समर्थन देखने को नहीं मिलता। स्वामी दयानंद को छोड़कर नवजागरण के सभी विद्वानों और सुधारकों द्वारा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया गया है।
जब किसी कौम या समाज के धार्मिक लोग जघन्य नैतिक बुराइयों और बिगाड़ में गर्क हो जाते हैं, तो वह कौम नैतिक पतन की पराकाष्ठा को पहुंच जाती है। नैतिक बुराइयों में निमग्न होने के बावजूद कथित धार्मिक लोग अपने बचाव और समाज में अपना स्तर और आदर-सम्मान बनाए रखने के लिए और साथ-साथ अपने को सही और सदाचारी साबित करने के लिए उपाय तलाशते हैं। अपने बचाव के लिए कथित मक्कार लोग अपनी धार्मिक पुस्तकों से छेड़छाड़ करते हैं और उनमें फेरबदल कर उस नैतिक बुराई को जो उनमें है, अपने देवताओं, अवतारों, ऋषियों, मुनियों और आदर्शों से जोड़ देते हैं और जनसाधारण को यह समझाकर अपने बचाव का रास्ता निकाल लेते हैं कि यह बुराई नहीं है बल्कि धर्मानुकूल है। ऐसा तो हमारे ऋषि-मुनियों और महापुरुषों ने भी किया है। नियोग के विषय में भी मुझे ऐसा ही प्रतीत होता है। जब कौम में स्वच्छंद यौन संबंधों की अधिकता हो गई और जो बुराई थी, वह सामाजिक रस्म और रिवाज बन गई तो मक्कार लोगों ने उस बुराई को अच्छाई बनाकर अपने धार्मिक ग्रंथों में प्रक्षेपित कर दिया। प्राचीन काल में धार्मिक ग्रंथों में परिवर्तन करना आसान था, क्योंकि धार्मिक ग्रंथों पर चन्द लोगों का अधिकार होता था। नियोग एक गर्हित और गंदी परंपरा है, इसे किसी भी काल के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।
भारतीय चिंतन में नारी की स्थिति अत्यंत दयनीय प्रतीत होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋषि, मुनियों और महापुरुषों द्वारा कुछ ऐसे नियम-कानून बनाए गए, जिन्होंने नारी को भोग की वस्तु और नाश्ते की प्लेट बना दिया। नियोग प्रथा ने विधवा स्त्री को कतई वेश्या ही बना दिया। जैसा कि आप ऊपर पढ़ चुके हैं कि एक विधवा 10 पुरुषों से नियोग कर सकती है। यहाँ विधवा और वेश्या ‘शब्दों को एक अर्थ में ले लिया जाए तो ‘शायद अनुचित न होगा। विधवाओं की दुर्दशा को चित्रित करने वाली एक फिल्म ‘वाटर’ सन् 2000 में विवादों के कारण प्रतिबंधित कर दी गई थी, जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर विधवाओं को वेश्याओं के रूप में दिखाया गया था। प्रायः विधवा स्त्रियाँ काशी, वृन्दावन आदि तीर्थस्थानों में आकर मंदिरों में भजन-कीर्तन करके और भीख मांगकर अपनी गुजर बसर करती थी, क्योंकि समाज में उनको अशुभ और अनिष्ट सूचक समझा जाता था।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी जी ने भी इस दशा का वर्णन करते हुए लिखा है- ‘‘वृंदावन जब था तब था अब तो वेश्यावनवत्, लल्ला-लल्ली और गुरु-चेली आदि की लीला फैल रही है। (11-159), आज भी काशी में लगभग 16000 विधवाएं रहती हैं।
‘मनुस्मृति’ में विवाह के आठ प्रकार बताए गए हैं। (3-21) इनमें आर्ष, आसुर और गान्धर्व विवाह को निकृष्ट बताया गया है मगर ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों और मर्मज्ञों ने इनका भरपूर फायदा उठाया। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, मुनि पराशर, कौरवों-पांडवों के पूर्वज ‘ाान्तनु, पाण्डु पुत्र अर्जुन और भीम आदि ने उक्त प्रकार के विवाहों की आड़ में नारी के साथ क्या किया ? इसका वर्णन भारतीय ग्रंथों में मिलता है।
भारतीय ग्रंथों में नारी को किस रूप में दर्शाया गया है आइए अति संक्षेप में इस पर भी एक दृष्टि डाल लेते हैं।
1. ‘‘ढिठाई, अति ढिठाई और कटुवचन कहना, ये स्त्री के रूप हैं। जो जानकार हैं वह इन्हें ‘ाुद्ध करता है।’’ (ऋग्वेद, 10-85-36)
2. ‘‘सर्वगुण सम्पन्न नारी अधम पुरुष से हीन है।’’
(तैत्तिरीय संहिता, 6-5-8-2)
3. नारी जन्म से अपवित्र, पापी और मूर्ख है।’’ (रामचरितमानस)
उक्त तथ्यों के आधार पर भारतीय चिंतन में नारी की स्थिति और दशा का आकलन हम भली-भांति कर सकते हैं। भारतीय ग्रंथों में नारी की स्थिति दमन, दासता और भोग की वस्तु से अधिक दिखाई नहीं पड़ती। यहाँ यह भी विचारणीय है कि क्या आधुनिक भारतीय नारी चिंतकों की सोच अपने ग्रंथों से हटकर हो सकती है ? आइए भारतीय संस्कृति में नारी की दशा का आकलन करने के लिए छांदोग्य उपनिषद् के एक मुख्य प्रसंग पर भी दृष्टि डाल लेते हैं।
नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि, बह्वहं चरन्ती
परिचारिणी यौवने त्वामलमे साहमेतन्न वेद यद्
गोत्रत्वमसि, जाबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम
त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति।
(छांदोग्य उपनिषद् 4-4-2)
यह प्रसंग सत्यकाम का है। जिसकी माता का नाम जबाला था। सत्यकाम गौतम ऋषि के यहाँ विद्या सीखना चाहता था। जब वह घर से जाने लगा, तब उसने अपनी माँ से पूछा ‘‘माता मैं किस गोत्र का हूँ ?’’ उसकी माँ ने उससे कहा, ‘‘बेटा मैं नहीं जानती तू किस गोत्र का है। अपनी युवावस्था में, जब मैं अपने पिता के घर आए हुए बहुत से अतिथियों की सेवा में रहती थी, उस समय तू मेरे गर्भ में आया था। मैं नहीं जानती तेरा गोत्र क्या है ? मेरा नाम जबाला है, तू सत्यकाम है, अपने को सत्यकाम जबाला बताना।’’
क्या उपरोक्त उद्धरणों से तथ्यात्मक रूप से यह बात साबित नहीं होती कि भारतीय चिंतन में नारी को न केवल निम्न और भोग की वस्तु बल्कि नाश्ते की प्लेट समझा गया है ?

गुरुवार, 22 मई 2014

ओउम वधु सौभाग्य के साथ ससुराल में प्रवेश करे

 ओउम वधु सौभाग्य के साथ ससुराल में प्रवेश करे
प्रत्येक सास, स्वसुर व परिवार की यह कामना होती है कि उनकी बहु सुन्दर हो, सुशील हो , सुखों की परिवार में वर्षा करने वाली हो | इस कामना की पूर्ति के लिए विवाहोपरांत जब नववधू गृह में प्रवेश कर...ती है तो उस परिवार में उसका स्वागत करने वाले तथा उसे आशीर्वाद देने वालों का तांता सा लग जाता है | यह इस लिए कि यह नव वधु इस परिवार को ऊँचा उठाने का कार्य करे , इस वधु के आगमन से यह परिवार स्वर्गिक सुखों से भर जावे , नव वधू के कार्यों से उस की ही नहीं पुरे परिवार की सर्वत्र प्रशंसा हो तथा परिवार में सुख, समृद्धि व एश्वर्य की वर्षा हो | ऋग्वेद १०.८५.३३ तथा अथर्ववेद १४.२.२८ में इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए कहा गया ई कि : -
सुमंगलीरियं वधु - रिमां समेत पश्यत |
सौभाग्यमस्यै दात्वाया$थास्तं वि परेतन ||
ऋग्वेद १०.८५.३३,अथर्ववेद १४.२.२८ ||
शब्दार्थ : -

(इयं वधु) यह वधु (सुमंगली ) मंगलयुक्त (समेत) सब एकत्र हों (इमां) इसको (पश्यत) देखें ( आस्ययी)इस वधु को (सौभाग्यं ) सौभाग्य का आशीर्वाद (दात्वाय) देकर (अथ) तदन्तर (अस्तम) अपने घर को (वि परेतन) लौट जावें |
भावार्थ : -
इस घर में प्रवेश करने वाली यह वधु सुन्दर व मंगलयुक्त हो | सब लोग आकर इसको देखें | यह सब लोग इस वधु को सौभाग्य का आशीर्वा देकर अपने अपने स्थान को जावें |
सुमंगल ही विवाह का मुख्य महत्त्व है, मुख्य तात्पर्य है, मुख्य प्रयोजन है | विवाह सदा सुमंगल की कामना के साथ किया जाता है | विवाह होने के पश्चात जिस परिवार में सुखों की वर्षा नहीं होती, शान्ति का साम्राज्य नहीं होता, एश्वर्य की प्राप्ति नहीं होती , वह परिवार नरक का दूसरा रूप हो जाता है | इस लिए नव वधु को सुमंगली कहा गया है | भाव यह है कि हे नववधू ! तूं इस परिवार में सुखों की वृद्धि के लिए प्रवेश कर , इस परिवार के धन एश्वर्य को बढाने के लिए प्रवेश कर , तूं इस परिवार में आज्ञाकारी व सुशिक्षित पुत्र - पुत्रियों को बढाने के लिए प्रवेश कर आदि आदि |
विवाह संस्कार की विभिन्न विधियों में से एक विधि सुमंगलीकरण का अत्यधिक महत्त्व है | वधु की मांग में जो सिंदूर वर द्वारा दान किया जाता है, यह स्त्री के सौभाग्यवती होने के प्रतीक स्वरूप किया जाता है | यदि स्त्री की मांग में सिंदूर होता है तो वह सौभाग्यवती जानी जाती है | कोई उस की और आँख उठाने का साहस नहीं करता | सब जानते हैं कि यह स्त्री अपने साथ एक भरा पूरा परिवार रखती है , यदि उस पर किंचित भी बुरी दृष्टि डाली तो विनाश हो जावेगा किन्तु इस सिंदूर से रहित नारी का इस संसार में जीवन ही दूभर हो जाता है | अत: सौभाग्य का यह चिन्ह सिंदूर ही उस का सब कुछ हो जाता है, जो उसे उसके पति द्वारा दिया जाता है |
इस सिंदूर दान के अतिरिक्त भी विवाह के अवसर पर जो अन्य क्रियाएं की जाती हैं , उनमें प्रदक्षिणा, लाजाहोम , सप्तपदी आदि की विधियां होती है किन्तु इन सब विधियों के अंत में ही सिंदूर द्वारा यह सुमंगलीकरण की विधि की जाती है | इस का करण है कि यह वधु अब इस परिवार का अंग हो गयी है | यहाँ आ कर परिवार का मंगल करेगी , कल्याण करेगी , इस परिवार के सुखों को बढाने का कार्य करेगी | इस सब के लिए उसे बड़ों का आशीर्वाद चाहिए | बड़ों के आशीर्वाद से ही उसे साहस मिलेगा, मार्ग - दर्शन मिलेगा | इस मार्गदर्शन से ही वह भविष्य में ऐसे कार्य करेगी, जिस से परिवार को भी सौभाग्य से भर दे | किसी को कुछ भी दान देने के लिए, वह वस्तु अपने पास होना भी आवश्यक है | यदि अपने पास एक पैसा ही नहीं है तो आगंतुक भिखारी को पैसा कैसे दिया जा सकता है ? यदि वधु के पास सुमंगल है ही नहीं तो वह परिवार को सुमंगल से कैसे भरेगी ? इस लिए सर्व प्रथम वधु के सुमंगल की कामना करते हुए बड़े लोग उसे सुमंगलीभव से आशीर्वाद देते हैं | इसके साथ ही उपस्थित जन समूह को भी इस अवसर पर बताया जाता है कि यह वधु अब सौभाग्यवती हो गयी है | एसा बताते हुए उनसे भी आशीर्वाद कि परिवार कामना करता है , वह चाहते हैं कि उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति भी उनके सुखमय भविष्य के लिए प्रभु से प्रार्थना करते हुए उन्हें आशीर्वाद दे |
मानव जीवन में आशीर्वाद का विशेष महत्त्व माना जाता है | मानव के ह्रदयों में जो भाव भरे होते हैं , यह आशीर्वाद उसकी वाचक अभिव्यक्ति के स्वरूप जाना जाता है | यह माना जाता है कि ( माना ही नहीं जाता अपितु यह मानवीय जीवन कि अनुभूति भी है ) साधु - संतों , हितैषियों, हितचिंतकों , वृद्धों अर्थात बड़े लोगों व गुरुजनों आदि के आशीर्वाद में अत्यधिक शक्ति होती है | उनसे प्राप्त आशीर्वचन कार्य कि सिद्धि में सहायक होते हैं | उनसे प्राप्त आशीर्वाद के प्रेरक शब्दों से ही प्रेरक हो हम उत्साहित हो कर कार्य को संपन्न करने में जुट जाते हैं , जी जान से जुट जाते है, अंत में सफलता मिलाती है | नव दम्पति को भी इस आशीर्वाद से अत्यधिक प्रेरणा मिलाती है , अत्यधिक उत्साह मिलता है , इससे उत्साहित हो कर वह अपने कार्य को संपन्न करने में जुट जाते है | इस लिए ही कहा गया है कि बड़े तो बड़े, छोटे छोटे बच्चों को भी जीवन में यह सिखाया जावे कि वह नित्य प्रात: व रात्रि को तो अपने से बड़ों का आशीर्वाद पावें ही दिन में आने वाले बड़े लोगों से भी आशीर्वाद लें | यदि आरम्भ से ही बड़ों से मार्ग दर्शन पाने की परंपरा होगी तो आगे चल कर यह जीवन की महान सफलताओं का कारण बनेगी | इस लिए ही बहु प्रत्येक गृह कार्य करने से पूर्व बड़ों के आशीर्वाद पाने के रूप में सर्व प्रथम अपनी सास का आशीर्वाद पाना नहीं भूलती | यहाँ तक कि आटा , दाल आदि बनाते समय भी सास के पास जा कर कहती है कि माँ जी ! आप एक बार हाथ लगा दीजिये ताकि घर में बरकत बनी रहे | इस से माँ को भी अपनी बहु पर गर्व होता है तथा उसकी झोलियाँ आशीर्वाद से भर देती है |
यह आशीर्वाद का ही बल है कि प्रत्येक नवदम्पति बड़ों का आशीर्वाद पाने की अभिलाषा रखता है | इस आशीर्वाद से ही वह अपना जीवन उच्च बनांते हुए अपने भविष्य को उज्जवल बनाने का प्रयास करते हैं | इस प्रयास के साथ ही साथ वह अपने माता - पिता व अन्य बड़े लोगों कि जो भावनाएं होती है अथवा उनकी जो आकांक्षाएं अपनी संतान से होती हैं , वह पूर्ण करने का प्रयास प्रतिक्षण करते हैं | इस से स्पष्ट है की सौभाग्य बड़ों के आशीर्वाद में छुपा होता है | यदि हम अपने माता - पिता , गुरुजनों व अन्य बड़ों को प्रसन्

भारतीय संस्कृति का प्रतीक यज्ञोपवीत लेखक- स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

भारतीय संस्कृति का प्रतीक यज्ञोपवीत
लेखक- स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती
यज्ञोपवीत भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। यह यज्ञ की वेश-भूषा है। यह विद्या का चिह्न है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, योगिराज श्रीकृष्ण, महाराज शिव, ब्रह्मा जी, ब्रह्मवादिनी गार्गी, भगवती सीता सती-साध्वी द्रौपदी आदि सभी नर-नारी यज्ञोपवीत धारण करते थे। यज्ञोपवीत में तीन तार होते हैं। तीनों तारों का सन्देश है-
मनुष्य पर तीन ऋण चढ़े हुए हैं- देवऋण, ऋषि-ऋण, पितृ-ऋण। इन तीनों ऋणों से अनृण होना होता है। यज्ञ करो, विद्वानों का सत्कार करो, परमेश्वर की उपासना करो। वेद का स्वाध्याय करो, माता-पिता की सेवा करो। इस प्रकार इन ऋणों से अनृण होंगे।
तीन अनादि पदार्थ हैं- ईश्वर, जीव, प्रकृति। इन तीनों को जानें। ईश्वर का और हमारा क्या सम्बन्ध है? उसे कैसे पाया जा सकता है। मैं कौन हूँ? कहॉं से आया हूँ? मुझे कहॉं जाना है? इन बातों का चिन्तन करें। संसार क्या है? हम इस गोरखधन्धे में कैसे फंस गये? इससे कैसे निकल सकते हैं? इन तत्वों पर चिन्तन और विचार करना।
सत्व, रज, तम (प्रोटोन, इलैक्ट्रोन, न्यूट्रोन) तीन गुण हैं। इन गुणों से ऊपर उठकर त्रिगुणातीत होना है। माता, पिता, आचार्य तीन गुरु हैं। तीनों की सेवा तथा आदर-सम्मान करो। प्रातःसवन, माध्यन्दिनसवन और सायंसवन ये तीन सवन होते हैं। तीनों समय के कार्यों को यथासमय करो।
इस प्रकार तीन-तीन के अनेक जोड़े हैं। इन सभी का समावेेश यज्ञोपवीत के तीन तारों में हो जाता है। इसलिए यज्ञ के तीन तारों में सारे विश्व का विज्ञान भरा हुआ है।
यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस प्रकार कुल तारों की संख्या नौ हो जाती है। नौ तार क्या सन्देश देते हैं? वेद में कहा है-
अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।। अथर्ववेद 10.2.31
आठ चक्रों और नौ द्वारों वाला अयोध्या नामक एक नगर है। यह नगर है मानवदेह। इसमें आठ चक्र हैंऔर नौ द्वार हैं। नौ द्वार हैं- दो आंख, दो कान, दो नासिका छिद्र, एक मुख ये सात हुए। इनके लिए वेद में कहा है कि हमारे शरीर में सात ऋषि बैठे हुए हैं। इन्हें ऋषि बनाना है। ये ऋषि बन गये तो जीवन का कल्याण हो जाएगा। यदि ये राक्षस बन गये तो जीवन का विनाश हो जाएगा। दो मल और मूत्र के द्वार हैं। इस प्रकार कुल नौ द्वार हैं। यज्ञोपवीत के नौ तार सन्देश देते हैं कि अपनी इन्द्रियों पर एक-एक चौकीदार बैठाओ, जिससे किसी इन्द्रिय से कोई बुराई जीवन में प्रवेश न करे। हम कानों से अच्छा सुनें, आँखों से अच्छा देखें। नासिका से ओ3म का जप करें। (जप नासिका से ही होता है) मुख से अभक्ष्य पदार्थों का सेवन न करें। मल-मूत्र के द्वारों से ब्रह्मचर्य का पालन करें।
यज्ञोपवीत में पांच गांठें होती हैं। पांच गांठों के दो सन्देश हैं-
काम, क्रोध, लोभ मोह और मद (अभिमान) ये मनुष्य के पॉंच शत्रु हैं। इन पर विजय प्राप्त करें। दूसरा गृहस्थों को प्रतिदिन पॉंच यज्ञों का अनुष्ठान करना चाहिए। पॉंच यज्ञ ये हैं-
ब्रह्मयज्ञ- सन्ध्या और स्वाध्याय। देवयज्ञ-अग्निहोत्र और विद्वानों का मान-सम्मान। पितृयज्ञ- जीवित माता-पिता, दादा-दादी, परदादा आदि का श्राद्ध और तर्पण करना, इनकी सेवा-शुश्रूषा करके इन्हें सदा प्रसन्न रखना और इनका आशीर्वाद प्राप्त करना। बलिवैश्वदेवयज्ञ- घर में जो भोजन बने उसमें से खट्‌टे और नमकीन पदार्थों को छोड़कर रसोई की अग्नि में दस आहूतियॉं देना तथा कौआ, कुत्ता, कीट-पतंग, लूले-लंगड़े, पापरोगी, चाण्डाल को भी अपने भोजन में से भाग देना। अतिथियज्ञ-घर पर आने वाले वेद-शास्त्रों के विद्वान, धार्मिक उपदेशकों का भी आदर-सम्मान करना।
इसे बायें कन्धें पर डाला जाता है। यह हृदय से होता हुआ कटि तक पहुंचता है। मनुष्य जन्म से शूद्र होता है। यज्ञोपवीत संस्कार होने पर द्विज बनता है। द्विज बनने पर कर्त्तव्यों का भार वहन करना होता है। मनुष्य में बोझ उठाने की शक्ति कन्धे में होती है, इसलिए इसे कन्धे पर डाला जाता है। यज्ञोपवीत धारण करते हुए कुछ प्रतिज्ञाएं की जाती हैं। इन प्रतिज्ञाओं का हृदय से पालन करना होता है। इसलिए यह हृदय से होता हुआ आता है। अपने कर्त्तव्यों को करने के लिए हम सदा कटिबद्ध रहेंगे, इसलिए यह कटि तक पहुंचता है।
संक्षेप में यह सन्देश है यज्ञोपवीत का।
इसे धारण करके उतारे नहीं, घर जाकर खूंटी पर न टांगें । सोपवीती सदा भाव्यम्‌। सदा यज्ञोपवीतधारी रहना चाहिए। महर्षि दयानन्द के इस कथन को सदा ध्यान में रखें-
""विद्या का चिह्न यज्ञोपवीत और शिखा को छोड़ मुसलमान ईसाइयों के सदृश बन बैठना, यह भी व्यर्थ है। जब पतलून आदि वस्त्र पहिनते हों और तमगों आदि की इच्छा करते हों, तो क्या यज्ञोपवीत आदि का कुछ बड़ा भार हो गया था?'' (सत्यार्थप्रकाश एकादश समुल्लास)l

क्या स्त्रियों को वेदाध्ययन का अधिकार हैं

क्या स्त्रियों को वेदाध्ययन का अधिकार हैं ?
 सत्य सनातन वैदिक धर्म के शास्त्रो में , महिलाओ के वेदाध्ययन करने के असंख्यों प्रमाण है। इन असंख्यों प्रमाणो को अनदेखा करते हुये कुछ अज्ञानीजन "गिने चुने कुछ प्रक्षिप्त श्लोको" के आधार पर , स्त्रियो को अनाधिकारिणी सिद्ध करने का मूर्खतापूर्ण प्रयास करते रहते है। यह लोग विद्या के लिए, विद्या की देवी सरस्वती जो स्त्री देह धारिणी है, उनकी उपासना करते है और स्त्रीयों को वेदपाठ से वंचित करने की बात करते... है। मतलब पहले विद्या के लिए स्त्री सरस्वती जी की शरण मे जाना, और विद्याप्राप्ति के पश्चात ये 'फतवा' जारी कर देना कि स्त्रीयों को अधिकार नहीं है , हास्यास्पद है।

यह मूढ़ कभी ये क्यो नहीं सोचते कि यदि स्त्रियों को वेदमन्त्रों का अधिकार नहीं, तो प्राचीनकाल में स्त्रियाँ वेदों की मन्त्रद्रष्ट्री- ऋषिकाएँ क्यों हुईं? यदि वेद की वे अधिकारिणी नहीं तो यज्ञ आदि धार्मिक कृत्यों तथा षोडश संस्कारों में उन्हें सम्मिलित क्यों किया जाता है? विवाह आदि अवसरों पर स्त्रियों के मुख से वेदमन्त्रों का उच्चारण क्यों कराया जाता है? बिना वेदमन्त्रों के नित्य सन्ध्या और हवन स्त्रियाँ कैसे कर सकती हैं? यदि स्त्रियाँ अनधिकारिणी थीं तो अनसूया, अहल्या, अरुन्धती, मदालसा आदि अगणित स्त्रियाँ वेदशास्त्रों में पारंगत कैसे थीं? ज्ञान, धर्म और उपासना के स्वाभाविक अधिकारों से नागरिकों को वंचित करना क्या अन्याय एवं पक्षपात नहीं है। जब स्त्री, पुरुष की अर्धांगिनी है तो आधा अंग अधिकारी और आधा अनधिकारी किस प्रकार रहा?

खैर इन प्रश्नो के उत्तर तो इनसे नहीं देते बनेंगे, किन्तु अब शास्त्रो से ही इनके इस असत्यमत के खंडन, और इस सत्य --" स्त्रियो को वेदमंत्रो के उच्चारण का, अध्ययन का, यज्ञादि करने का, आचार्या बनने का अधिकार था व है , इसकी सिद्धि हेतु प्रमाण प्रस्तुत किए जाते है, विचारशील व्यक्ति स्वयं इससे समझ सकते है कि सत्य क्या है ---

ऋग्वेद १०। ८५ में सम्पूर्ण मन्त्रों की ऋषिका ‘सूर्या- सावित्री’ है। ऋषि का अर्थ निरुक्त में इस प्रकार किया है—‘‘ऋषिर्दर्शनात्। स्तोमान् ददर्शेति (२.११)। ऋषयो मन्त्रद्रष्टर: (२.११ दु. वृ.)।’’ अर्थात् मन्त्रों का द्रष्टा उनके रहस्यों को समझकर प्रचार करने वाला ऋषि होता है। ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची बृहद् देवता के दूसरे अध्याय में इस प्रकार है—

घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषद्, निषद्, ब्रह्मजाया (जुहू), अगस्त्य की भगिनी, अदिति, इन्द्राणी और इन्द्र की माता, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा और नदियाँ, यमी, शश्वती, श्री, लाक्षा, सार्पराज्ञी, वाक्, श्रद्धा, मेधा, दक्षिणा, रात्री और सूर्या- सावित्री आदि सभी ब्रह्मवादिनी हैं।
ऋ ग्वेद के १०- १३४, १०- ३९, ४०, १०- ९१, १०- ९५, १०- १०७, १०- १०९, १०- १५४, १०- १५९, १०- १८९, ५- २८, ८- ९१ आदि सूक्त की मन्त्रदृष्टा ये ऋषिकाएँ हैं।
ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह वेदाध्ययन व यज्ञ करती और कराती थीं। वे यज्ञ- विद्या और ब्रह्म- विद्या में पारंगत थीं।

तैत्तिरीय ब्राह्मण’’ में सोम द्वारा ‘सीता- सावित्री’ ऋषिका को तीन वेद देने का वर्णन विस्तारपूर्वक आता है—
तं त्रयो वेदा अन्वसृज्यन्त। अथ ह सीता सावित्री। सोमँ राजानं चकमे। तस्या उ ह त्रीन् वेदान् प्रददौ। -तैत्तिरीय ब्रा०२/३/१०/१,३
इस मन्त्र में बताया गया है कि किस प्रकार सोम ने सीता- सावित्री को तीन वेद दिये।

द्विविधा: स्त्रिया:। ब्रह्मवादिन्य: सद्योवध्वश्च। तत्र ब्रह्मवादिनीनामुपनयनम्, अग्रीन्धनं वेदाध्ययनं स्वगृहे च भिक्षाचर्येति। सद्योवधूनां तूपस्थिते विवाहे कथञ्चिदुपनयनमात्रं कृत्वा विवाह: कार्य:। —हारीत धर्म सूत्र
ब्रह्मवादिनी और सद्योवधू ये दो स्त्रियाँ होती हैं। इनमें से ब्रह्मवादिनी- यज्ञोपवीत, अग्निहोत्र, वेदाध्ययन तथा स्वगृह में भिक्षा करती हैं। सद्योवधुओं का भी यज्ञोपवीत आवश्यक है। वह विवाहकाल उपस्थित होने पर करा देते हैं।
शतपथ ब्राह्मण में याज्ञवल्क्य ऋषि की धर्मपत्नी मैत्रेयी को ब्रह्मवादिनी कहा है—
तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव। —शत०ब्रा० १४/७/३/१
अर्थात् मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी।
ब्रह्मवादिनी का अर्थ बृहदारण्यक उपनिषद् का भाष्य करते हुए श्री शंकराचार्य ने ‘ब्रह्मवादनशील’ किया है।

शतपथ ब्राह्मण १४। १। ४। १६ में, यजुर्वेद के ३७। २० मन्त्र ‘त्वष्टमन्तस्त्वा सपेम’ इस मन्त्र को पत्नी द्वारा उच्चारण करने का विधान है। तैत्तिरीय संहिता के १। १। १० ‘सुप्रजसस्त्वा वयं’ आदि मन्ज्ञत्रों को स्त्री द्वारा बुलवाने का आदेश है। आश्वलायन गृह्य सूत्र १। १। ९ के ‘पाणिग्रहणादि गृह्य....’ में भी इसी प्रकार यजमान की अनुपस्थिति में उसकी पत्नी, पुत्र अथवा कन्या को यज्ञ करने का आदेश है। काठक गृह्य सूत्र ३। १। ३० एवं २७। ३ में स्त्रियों के लिए वेदाध्ययन, मन्त्रोच्चारण एवं वैदिक कर्मकाण्ड करने का प्रतिपादन है। लौगाक्षी गृह्म सूत्र की २५वीं कण्डिका में भी ऐसे प्रमाण मौजूद हैं।

सूर्य दर्शन के समय भी वह यजुर्वेद के ३६। २४ मन्त्र ‘तच्चक्षुर्देवहितं’ को स्वयं ही उच्चारण करती है। विवाह के समय ‘समञ्जन’ करते समय वर- वधू दोनों साथ- साथ ‘अथैनौ समञ्जयत: .....’ इस ऋग्वेद १०। ८५। ४७ के मन्त्र को पढ़ते हैं। ऐतरेय ५। ५। २९ में कुमारी गन्धर्व गृहीता का उपाख्यान है, जिसमें कन्या के यज्ञ एवं वेदाधिकार का स्पष्टीकरण हुआ है।

कात्यायन श्रौत सूत्र १। १। ७, ४। १। २२ तथा २०। ६। १२ आदि में ऐसे स्पष्ट आदेश हैं कि अमुक वेद- मन्त्रों का उच्चारण स्त्री करे। लाट्यायन श्रौत सूत्र में पत्नी द्वारा सस्वर सामवेद के मन्त्रों के गायन का विधान है। शांखायन श्रौत सूत्र के १। १२। १३ में तथा आश्वलायन श्रौत सूत्र १। ११। १ में इसी प्रकार के वेद- मन्त्रोच्चारण के आदेश हैं। मन्त्र ब्राह्मण के १। २। ३ में कन्या द्वारा वेद- मन्त्र के उच्चारण की आज्ञा है। यजुर्वेद मे आता है , ---

कुलायिनी घृतवती पुरन्धि: स्योने सीद सदने पृथिव्या:। अभित्वा रुद्रा वसवो गृणन्त्विमा। ब्रह्म पीपिहि सौभगायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिहत्वा। —यजुर्वेद १४। २
अर्थात, हे स्त्री! तुम कुलवती घृत आदि पौष्टिक पदार्थों का उचित उपयोग करने वाली, तेजस्विनी, बुद्धिमती, सत्कर्म करने वाली होकर सुखपूर्वक रहो। तुम ऐसी गुणवती और विदुषी बनो कि रुद्र और वसु भी तुम्हारी प्रशंसा करें। सौभाग्य की प्राप्ति के लिये इन वेदमन्त्रों के अमृत का बार- बार भली प्रकार पान करो। विद्वान् तुम्हें शिक्षा देकर इस प्रकार की उच्च स्थिति पर प्रतिष्ठित कराएँ।

यह सर्वविदित है कि यज्ञ, बिना वेदमन्त्रों के नहीं होता और यज्ञ में पति- पत्नी दोनों का सम्मिलित रहना आवश्यक है। रामचन्द्र जी ने सीता जी की अनुपस्थिति में सोने की प्रतिमा रखकर यज्ञ किया था। ब्रह्माजी को भी सावित्री की अनुपस्थिति में द्वितीय पत्नी का वरण करना पड़ा था, क्योंकि यज्ञ की पूर्ति के लिये पत्नी की उपस्थिति आवश्यक है। जब स्त्री यज्ञ करती है, तो उसे वेदाधिकार न होने की बात किस प्रकार कही जा सकती है? देखिये—

अ यज्ञो वा एष योऽपत्नीक:। —तैत्तिरीय सं० २। २। २। ६
अर्थात् बिना पत्नी के यज्ञ नहीं होता है।
अथो अर्धो वा एष आत्मन: यत् पत्नी।
—तैत्तिरीय सं० ३। ३। ३। ५

अर्थात्- पत्नी पति की अर्धांगिनी है, अत: उसके बिना यज्ञ अपूर्ण है।

अब महाभारत से कुछ प्रमाण प्रस्तुत करते है ---

भारद्वाजस्य दुहिता रूपेणाप्रतिमा भुवि। श्रुतावती नाम विभो कुमारी ब्रह्मचारिणी॥ —महाभारत शल्य पर्व ४८। २

अर्थात, भारद्वाज की श्रुतावती नामक कन्या थी जो ब्रह्मचारिणि थी। कुमारी के साथ- साथ ब्रह्मचारिणि शब्द लगाने का तात्पर्य यह है कि वह अविवाहित और वेदाध्ययन करने वाली थी।

अत्रैव ब्राह्मणी सिद्धा कौमार- ब्रह्मचारिणि। योगयुक्ता दिवं याता, तप: सिद्धा तपस्विनी॥ —महाभारत शल्य पर्व ५४। ६

अर्थात, योग सिद्धि को प्राप्त कुमार अवस्था से ही वेदाध्ययन करने वाली तपस्विनी, सिद्धा नाम की ब्रह्मचारिणि मुक्ति को प्राप्त हुई।

महाभारत शान्ति पर्व अध्याय ३२० में ‘सुलभा’ नामक ब्रह्मवादिनी संन्यासिनी का वर्णन है, जिसने राजा जनक के साथ शास्त्रार्थ किया था। इसी अध्याय के श्लोकों में सुलभा ने अपना परिचय देते हुए कहा—

प्रधानो नाम राजर्षिव्र्यक्तं ते श्रोत्रमागत:। कुले तस्य समुत्पन्नां सुलभां नाम विद्धि माम्
साऽहं तस्मिन् कुले जाता भर्तर्यसति मद्विधे। विनीता मोक्षधर्मेषु चराम्येकामुनिव्रतम्॥ —महा०शान्ति पर्व ३२०। १८१। १८३

मैं सुप्रसिद्ध क्षत्रिय कुल में उत्पन्न सुलभा हूँ। अपने अनुरूप पति न मिलने से मैंने गुरुओं से शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त करके संन्यास ग्रहण किया है।

अब वाल्मीकि रामायण से प्रमाण देखिये ----

देही शोकसन्तप्ता हुताशनमुपागमत्। —वाल्मीकि० सुन्दर ५३। २६
अर्थात्- तब शोक सन्तप्त सीताजी ने हवन किया।

‘तदा सुमन्त्रं मन्त्रज्ञा कैकेयी प्रत्युवाच ह।’ —वा० रा० अयो० १४। ६१
वेदमन्त्रों को जानने वाली कैकेयी ने सुमन्त्र से कहा।
सा क्षौमवसना हृष्ट नित्यं व्रतपरायणा। अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत् कृतमंगला॥ —वा० रा० २। २०। १५

वह रेशमी वस्त्र धारण करने वाली, व्रतपरायण, प्रसन्नमुखी, मंगलकारिणी कौशल्या मन्त्रपूर्वक अग्निहोत्र कर रही थी।

तत: स्वस्त्ययनं कृत्वा मन्त्रविद् विजयैषिणी। अन्त:पुरं सहस्त्रीभि: प्रविष्टि शोकमोहिता॥ —वा० रा० ४। १६। १२

तब मन्त्रों को जानने वाली तारा ने अपने पति बाली की विजय के लिये स्वस्तिवाचन के मन्त्रों का पाठ करके अन्त:पुर में प्रवेश किया।
इसके अतिरिक्त वसिष्ठ स्मृति भी स्त्रियो के वेदमंत्रो के उच्चारण व अध्ययन का समर्थन ही करती है ।


व्याकरण शास्त्र के भी कतिपय स्थलों पर ऐसे उल्लेख हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि वेद का अध्ययन- अध्यापन भी स्त्रियों का कार्यक्षेत्र रहा है। देखिए—

‘इडश्च’ ३। ३। २१ के महाभाष्य में लिखा है— ‘उपेत्याधीयतेऽस्या उपाध्यायी उपाध्याया’
अर्थात् जिनके पास आकर कन्याएँ वेद के एक भाग तथा वेदांगों का अध्ययन करें, वह उपाध्यायी या उपाध्याया कहलाती है।

आचार्यादणत्वं। —अष्टाध्यायी ४। १। ४९
इस सूत्र पर सिद्धान्त कौमुदी में कहा गया है—
आचार्यस्य स्त्री आचार्यानी पुंयोग इत्येवं आचार्या स्वयं व्याख्यात्री।
अर्थात् जो स्त्री वेदों का प्रवचन करने वाली हो, उसे आचार्या कहते हैं।

ऐसे ही अन्य भी अनेकों प्रमाण है जो सिद्ध करते है कि स्त्रीयों को भी वेदाध्ययन करने का अधिकार शास्त्रसम्मत है।

 साभार- वैदिक सुधा निधि

बुधवार, 21 मई 2014

'गृह की शोभा गृहिणी से ही है

'''''''''''''''''गृह की शोभा गृहिणी से ही है''''''''''''''''''''''''''''''''''''''

डा. अशोक आर्य

वेद में नारी को समाज में ऊँचा स्थान दिया गया है | इसे माता कहा गया है | माता उसे कहते हैं ,जो निर्माण करे | माता संतान को पैदा ही नहीं करती, उसका निर्माण भी करती है | माता ही संतान को सुसंतान बना कर उन्नत मार्ग पर अग्रसर करती है तथा माता जब कुमाता बन जाती है तो संतान का विनाश भी करती है ,किन्तु ऐसी बुद्धिहीन ,कर्तव्य विहीन माता वास्तव में माता कहलाने का अधिकार नहीं रखती | जो माता संतान को ऊँचे आसन तक पहुँचाने के लिए तप करती है, सुख सुविधाओं को त्याग, भूखे रह कर भी उसके सुखों में कमीं नहीं आने देती , माता तो वह ही है | एसा कार्य जग की प्रत्येक माता करना चाहती है , इस कारण ही वह माता है | इस कारण ही विश्व में नारी का सम्मान है किन्तु मध्य युग में नारी के सम्मान का ह्रास हुआ है | इस का कारण गुलामी तथा वेद विद्या का अभाव ही कहा जा सकता है | वेद में नारी को जग की जननी तथा त्याग की मूर्ति कहते हुए इसे उच्च आसन देने का आदेश किया है | नारी को प्रशस्ति पूर्ण स्थान देने के लिए वेद में अनेक विध नारी का गुण गान किया गया है | ऋग्वेद ३.५३.४ में कहा गया है कि गृहिणी अर्थात नारी ही गृह है, घर है | नारी के बिना गृह की कल्पना भी नहीं की जा सकती | मन्त्र इस प्रकार दिया है : – जायेदसत्न मघवन त्सेदु योनी: – तदित तवा युक्ता हरयो वहन्तु | यदा कदा च सुनवाय सोमम अग्निष्ट्वा दूतो धन्वात्यच्छ ||ऋग ३.५३.४ || शब्दार्थ : – हे (मघवन) हे एश्वर्य युक्त इंद्र (जाया इत) पत्नी ही (असतं) घर है (उ) और ( सा इत ) वह ही (योनि:) संतान उत्पादन का आधार है (तट इत ) उसी घर में वही (युक्ता:) जूते हुए (हरय:) घोड़े (त्वा) तुझ को (वहन्तु ) ले जावें (यदा कदा च) और जब कभी (सोमम) सोम रस को (सुनवाम ) निकालेंगे ( दूत:अग्नि: ) तब तुम्हारा दूत अग्नि (त्वा ) तेरे (अच्छ) पास (धन्वाती) दौड़कर जाएगा | भावार्थ : – हे इंद्र ! पत्नी ही घर है | कुलवृद्धि का आधार भी वही है | तुझे उसी घर में जूते हुए घोड़े लावें | तुम्हारा दूत अग्नि तब ही तुम्हारे पास जाएगा , जब हम सोमरस निकालेंगे | यह मन्त्र हमें बताता है कि गृहस्थ का आधार क्या है ? उसका मूल क्या है ? तथा उसके मूल में क्या पदार्थ डालने की आवश्यकता है ? इन बातों का उत्तर देते हुए मन्त्र कहता है कि : – गृहस्थ का आधार क्या है ? पत्नी ही घर का आधार है | संस्कृत मई कहा भी है कि :”न गृहं गृहमित्याहू: , गृहिणी गृहमुच्याते ” अर्थात घर को घर नहीं कहते अपितु गृहिणी कि ही घर कहते हैं | कहा भी है कि गृहिणी के बिना घर में भुत का डेरा होता है | गृह में क्या कार्य होता है ? गृह में मुख्य कार्य होता है गृह कि सुरक्षा , गृह कि व्यवस्था, गृह का संचालन, गृह का निरिक्षण तथा समुन्नयन | यह सब कार्य गृहपत्नी अथवा नारी ही कराती है | पुरुष तो गृह व्यवस्था के साधन अर्थात धनोपार्जन के लिए प्राय अधिकाँश समय गृह से बाहर ही रहता है | इस कारण इन सब कार्यों को वह नहीं कर सकता | इन कार्यों को करने के लिए अधक समय वहां उपस्थित होना आवश्यक होता है , किन्तु ओउरुष के लिए एसा संभव न हो पाने के कारण यह सब व्यवस्था पत्नी ही देखती है | अत: पत्नी के बिना यह सब कार्य व्यवस्था ठीक से नहीं हो पाती , इस कारण गृह के इन कार्यों के लिए पत्नी का विशेष महत्व इस मन्त्र में बताया गया है | यदि गृहिणी न हो तो गृह कि यह सब व्यवस्था छीन भिन्न हो जाती है | तभी टी गृहिणी के बिना घर को भुत बंगला अथवा भूतों का निवास कहा गया है | मन्त्र न केवल पत्नी के कर्तव्यों पर ही प्रकाशः डालता है अपितु उस के महत्व का भी वर्णन करता है | यदि हम गृहस्थ को एक वृक्ष मानें तो पत्नी उस वृक्ष का मूल अर्थात जड़ होती है | जब तक मूल नहीं है , तब तक वृक्ष का अस्तित्व ही नहीं होता | मूलाधार ही समग्र वृक्ष का भार वहन करता है | इस आधार पर हम कह सकते हैं कि नारी गृह का मूल आधार होता है | उस के कन्धों पर ही पूरा परिवार खड़ा होता है | नारी के बिना यह स्वपन साकार नहीं हो सकता | वृक्ष की जड़ तो केवल वृक्ष को खड़ा रखने तथा उसे भोजन पहुँचाने का कार्य करती है किन्तु नारी न केवल जड़ का अर्थात परिवार का आधार अथवा परिवार के खड़े होने की परिकल्पना को साकार करने वाली होती है अपितु संतानोत्पति का कार्य अर्थात बीज व भूमि का कार्य भी करती है | नारी ही गृह की सश्रीकता का आधार है | नारी के बिना संतानोत्पति संभव नहीं | नारी के बिना परिवार की समृद्धि भी संभव नहीं | अत: नारी परिवार की अच्छी समृद्धि का कारण होती है | एक उत्तम नारी ही परिवार में सुखों की वर्षा करती है | तभी तो इसे योनि अथवा मूल कहा गया है | यह परिवार का मूल कारण होती है | परिवार के सुखों की वृद्धि का चिंतन नारी को ही होता है | नारी के बिना किसी प्रकार के सुख व समृद्धि की कल्पाना ही नहीं की जा सकती | सश्रीकता कहाँ से आती है ? : – ऊपर कहा गया है कि नारी गृह की सश्रीकता होती है | इस का उत्तर देते हुए मन्त्र कहता है कि यह सोम से आती है | सश्रीकता के लिए सौम्य गुणों का होना आवश्यक है } सौम्य गुण ही इस का मूल आधार हैं | यह सौम्यगुण ही परिवार की श्रीवृद्धि करते हैं , क्योंकि यह कार्य नारी करती है , इसलिए नारी का सौम्यगुणों से युक्त होना आवश्यक है | यदि नारी बात बात पर झगड़ती है तो परिवार का संचालन, परिचालन व व्यवस्था ढीली हो जाती है | यह सुव्यवस्था न रह कर कुव्यवस्था हो जाती है | सुव्यवस्था के लिए सौम्यता आवश्यक है | अत: नारी में सौम्य गुण की प्रचुर मात्रा आवश्यक है | इंद्र तथा जीवात्मा की उपस्थिति भी सौम्यगुन के साथ ही होती है | वहीँ आत्मिक बल होता है तथा जहाँ इंद्र वा जीवात्मा तथा आत्मिक बल हो वहां श्रीवृद्धि भी निरंतर होती रहती है | अत: इस मन्त्र के आधार पर हम संक्षेप में कह सकते हैं कि नारी ही गृह का आधार है, गृह अथवा परिवार का मूल भी नारी ही है , सौम्य गुण इस मूल को पुष्ट करते हैं | यह पुष्टि का ही परिणाम होता है कि आत्म बल, सात्विकता, पवित्रता ,सुशीलता, तथा विनय आदि गुणों का आघान होता है | अत: परिवार के निर्माण व पुष्टि के लिए सौम्यता का होना आवश्यक है | यह सौम्यता नारी में विपुल मात्रा में होने के कारण ही नारी को ही गृहिणी को ही गृह अर्थात घर कहा गया है | इस के बिना घर की कल्पना भी संभव नहीं | इसलिए परिवार में नारी का सम्मान हो ताकि वह खुश रहते हुए सौम्यगुणों को बढाती रहे |

मंगलवार, 20 मई 2014

सोलह श्रृंगार

सोलह श्रृंगार

By Veda Mandan Pakhand Khandan on Wednesday, May 7, 2014 at 1:42pm
-नित्यानंद शर्मा तप और त्यागभारतीय संस्कृति में तप और त्याग को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। भारत में वही पुजे जाते हैं जिन्होने सबकुछ त्याग दिया था। ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं। ऐसे ही एक महात्मा की कहानी है।एक बार की बात है। एक महात्मा बहुत ही कठोर तपस्या कर रहे थे । उनके तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान ने उन्हे दर्शन दिया और बोले - हम तुम्हारे तपस्या से प्रसन्न हैं, माँगो क्या वर माँगना चाहते हो। यह सुनकर महात्माजी ने हाथ जोड़कर भगवान से कहा - हे प्रभो, आप तो सबकुछ जानने वाले हैं। आपने जरुर यह देखा होगा कि मेरे अंदर कहीं किसी चिज की इच्छा रह गयी है जिसके कारण आपने वरदान माँगने को कहा। अगर आप देना हि कुछ चाहते हैं तो मेरे अंदर किसी चिज का इच्छा ना रहे यही वरदान दिजिये । इस तरह से महात्माजी ने सभी तरह की इच्छाओं ने मुक्ति पा ली। उन्होने सर्वस्व त्याग दिया और निरन्तर परमात्मा में लिन रहे ।वो महात्मा कोई और नहीं - भारद्वाज मुनि थे ।Posted by Nitya at 3:15 AM Labels: त्याग, भारद्वाज, महात्मा, संस्कृति 0 commentsEmail ThisBlogThis!Share to TwitterShare to FacebookShare to PinterestFriday, September 7, 2012मंत्रॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।अर्थात : उस पूर्ण परमब्रह्म का विस्तार अनन्त है। यद्यपि अनन्त संसार उससे व्युत्पित तथा विलोपित होते रहते हैं, तथापि वह पूर्ण ही है।सोलह श्रृंगारभारतीय परंपरा में नारी के सोलह श्रृंगार बताये गये हैं । वे सोलह श्रृंगार है-    सिंदुर     काजल    बिंदी    गजरा    लाली    अलता    पायल    चुड़ी    मंगलसूत्र    इत्र    बाजूबंद    नथनी    मेहंदी    बाली    बिछुआ    नख-रंगनीहाँलाकि भिन्न-भिन्न जगहों पर श्रृंगार स्थाननुसार होते हैं, फिर भी, साधारणतया हर जगह ये सारे श्रृंगार किये जाते रहे हैं।

रविवार, 18 मई 2014

यौन अपराध इस्लाम की सौगात हैं-

यौन अपराध इस्लाम की सौगात हैं !
इस बात  से  कोई  भी  व्यक्ति  इंकार   नही  कर सकता   कि मनुष्य   के  ऊपर  संगती   का  प्रभाव     जरूर  पड़ता   है  .  चूँकि   भारत   को एक   सेकुलर  देश   बना   दिया   गया   है  , इसलिए   हिंदुओं   पर इस्लामी  रंग  पड़ना  स्वाभाविक   है  . यह   बात  भारत   में महिलाओ  के  साथ  होने  वाले यौन  अपराधो   के  बार में   है  ,जो  कठोर   कानून   बनाये   जाने   के  बावजूद  कम  होने   की  जगह  और  बढ़  रहे  हैं  . यह बात  इसलिए  और  गम्भीर    हो  जाती  है  कि जब प्रतष्ठित  व्यक्ति   भी  महिला उत्पीड़न    जैसे निंदनीय   अपराधो  में  आरोपित   किये जाते हैं  .  कुछ  लोग  इसका   कारण नैतिक शिक्षा  की  कमी बताते हैं , लेकिन  उनको  इस  कटु सत्य   को स्वीकार  करना  पड़ेगा   कि सभी यौन अपराध जैसे  बलात्कार ,लडकियो  को  बेचना ( WomenTraffiking ) वेश्यावृत्ति ,अपहरण इत्यादि  इस्लाम     की   सौगात   हैं  ,क्योंकि   इस्लामी  किताबो   में  इसे  उचित  और   जायज  बताया  गया   है  .  सामान्य  लोग  कुरान और हदीसों   को  इस्लाम   की   प्रमाणिक   किताबें   समझते   हैं  , लेकिन उनको पता  होना  चाहिए  कि इस्लाम   की   ऎसी और  किताबे   हैं  ,जो हदीसों की  तरह   ही  प्रमाणिक    हैं   .  इस  लेख में  कुछ  ऎसी  ही  किताबो  के  आधार  पर    यही  सिद्ध   किया  जा रहा है कि सभी  यौन अपराधों   की  प्रेरणा   इस्लाम  की नारी  विरोधी   शिक्षा   ही   है ,चूँकि  हरेक  दुराचार  और  कुकर्मो  की  बुनियाद    अक्सर  घर में ही पड़  जाती   है , इसे  साबित  करने  के  लिए फतवाए आलम गीरी   का एक फतवा  ज्यों   का त्यों दिया  जा  रहा   है  ,
1-माँ और बहिन से निकाह जायज है  

Ager 5 aurto say ik aqad main nikah kia ya 4 kay nikah main panchavee ka nikah kia ya apni joro ki behan ya maa say nikah kia pas iss say jamaa kia aur kaha ka main janta tha kay yeh muj per Haram hai ya aurat say batoor e muttah tazooj kia tu in say surtoo main wati kunenda per had wajib na ho ge agerche us nay kaha kay main janta tha kay wo muj per haram hain

"If someone marries five women at a time or marries a fifth woman while already having four wives or marries his sister in law or mother in law and then performs intercourse with her and then says that I knew that it is haram for me or performs nikah al mutah with a woman then there will be no plenty of adultery on him in all of these situations though he confessed that he knew it was haram on him"

Fatwa Alamgiri, Volume 3 page 264

http://www.ahnafexpose.com/biwi_ke_behen_ya_maa_se_nikaah_aur_jamaa.html

2-रसूल  के घर  सामूहिक  दुष्कर्म 

हिजरी  सन  1111  में  पैदा  हुए शिया  विद्वान  " मुहम्मद  बाकर अल  मजलिसी -    محمد باقر المجلسي "  ने  अपनी  किताब "बहारुल अनवार  -بحار الأنوار‎, "   में  अली  , आयशा  और उम्र के बारे में  ऎसी ऐसी  गुप्त   बातें   लिखी   हैं  ,जिन को  पढ़  कर  सुन्नी   शर्म   के  मारे  डूब   कर   मर   जायेंगे   , यहाँ  केवल दो  नमूने    दिए    जा  रहे   हैं ,

1.इमाम  जाफर  बिन  मुहम्मद   ने  बताया कि रसूल अपना  चेहरा  अपनी  पुत्री  फातिमा  के स्तनों   के  बीच  में  रख  कर  सोया  कर

"It was narrated that [Imam] Ja`far Ibn Muhamad said : The prophet Muhammad p.b.u.h used to put his face between the breasts of [his daughter] Fatima before going to sleep” (

وقال جعفر بن محمد: النبي محمد عليه الصلاة والسلام يستخدم لوضع وجهه بين الثديين من [ابنته] فاطمة قبل النوم "(

(Bihaar al-Anwar( بحار الأنوار‎, ) vol. 43, p. 78

2.अली  इब्न अबी तालिब  ने  बताया  कि एक  बार  मैं  रसूल  के  साथ  सोया   और एक   ही  चादर   में  आयशा   भी  थी  . और  जब  रसूल सवेरे  नमाज  के लिए उठ  कर चले  गए  तब   भी  मैं और आयशा उसी तरह एक  ही  चादर    में  सोते  रहे "

Ali Ibn Abi Talib said that he once slept with the prophet Muhammad p.b.u.h and his wife Ayesha in one bed, and under one cover, then the prophet woke up to pray, and left them together [Ali and Ayesha] in the same bed, under the same cover” 

وقال علي بن أبي طالب أن ينام مرة واحدة مع النبي محمد عليه الصلاة والسلام وزوجته عائشة في سرير واحد، وتحت غطاء واحد، ثم استيقظ النبي إلى الصلاة، وترك لهم معا [علي وعائشة] في نفس السرير، تحت نفس غطاء "

(Bihaar al-Anwar( بحار الأنوار‎, ) vol. 40, p. 2

अब  कोई  मुल्ला मौलवी  बताये कि अली    किस रिश्ते   के अनुसार  आयशा  के साथ एक  ही  चादर   में  सोया   था  .  एक तरफ  वह   रसूल   का  चचेरा  भाई था  तो  आयशा  उसकी  भाभी   हुई ,  फिर  मुहम्मद ने अपनी बेटी  फातिमा उसे   व्याह    दी यानि  वह  मुहम्मद  का  ससुर  और आयशा  उसकी  सास    हुई  , यानी अली अपनी  भाभी और सास  के साथ  सोया  था  . 

जिहाद   हमेशा   औरतो   को निशाना   बनाया   जाता   है  ,   जो जिहाद  में अनिवार्य    है  ,इसलिए

3-जिहाद में  बलात्कार गुनाह  नहीं  

 फतवा आलमगीरी   में कहा   है  कि अगर खलीफा  या  शहर   का  मुखिया जिहाद   का  हुक्म   कर दे  तो  सेना  या उसके साथी व्यभिचार  करें  या  बलात्कार   करें  ,तो  उन  पर  कोई सजा  नहीं   दी  जा  सकती   है "

“If the Caliph or the head of the city ordains legal penalties on people using his authority, personally goes on Jihad with the army and commits adultery, or he associates with the people at war and indulges in adultery,and rape  no legal penalty will be enforced on him.”

"إذا كان الخليفة أو رئيس المدينة يأمر العقوبات القانونية على الأشخاص الذين يستخدمون سلطته، ويذهب شخصيا على الجهاد مع الجيش ويرتكب الزنا، أو أنه يقترن مع الشعب في حالة حرب ويتمادى في الزنا، وسيتم فرض أي عقوبة قانونية على له "

Fatawa-e-Alamgiri,( فتاویٰ عالمگیری ) volume 3, page 266, Kitab al-Hudood,( published by Daar ul-Isha’at, Karachi.)

अश्लीलता  और  बेशर्मी   भी  इस्लाम   की  सौगात   है   , जो  इस हदीस  से    साबित   होती   है  ,

4-नमाज  में योनि प्रदर्शन 
 सुन्नी  इमाम अबू हनीफा ने   कहा   है कि  गुलाम औरतें    नग्न   हो  कर  नमाज  पढें  ताकि  ऐसा  करने  से  लोग  उनके स्तन  देख  लें  , और  नमाज  पढते  समय  औरत   की  योनि  भी  दिख   जाये लेकिन आजाद  औरत  नमाज   में  जानबूझ  कर अपनी  योनि  सबको दिखा  सकती   है , "

A slave woman can perform the prayers naked, and others can abandon their work in order to stare at her body:

لا يستحي من أن يطلق أن للمملوكة أن تصلي عريانة يرى الناس ثدييها وخاصرتها وان للحرة أن تتعمد أن تكشف من شفتي فرجها مقدار الدرهم البغلي تصلي كذلك ويراها الصادر والوارد بين الجماعة في المسجد

“He (Abu Hanifa) say that a slave woman can pray naked and the people can observe her breasts and waist. A free woman can purposely show the parts of her vagina during prayers and can be observed by whosoever enters and leaves the mosque.”

Al-Muhala,( المحلى ) Kitab al-Rizaa, Volume 10 page 23

5-अल्लाह औरतें   सप्लाई  करता  है
एक  बार रसूल  की  सारी  पत्नियां   इकट्ठी  होकर रसूल   का   मजाक  उड़ाने   लगी  ,  जिस से  वह   चिढ    गए  और   औरतों   को  धमका  कर   बोले  मुझे  औरतो   की   कमी   नहीं  , फिर  रसूल   ने   कुरान   की   यह  आयत  सुना  दी  "यदि वह  तुम्हें  तलाक  दे देगा   तो अल्लाह  को  कोई देर  नही  लगेगा  कि वह  तुम्हारी  जगह उस से भी अच्छी  नयी  औरतें उपलब्ध   करा दे ' सूरा  -तहरीम  66 :5 

सही बुखारी -जिल्द 1 किताब 8  हदीस 395

जो लोग  सामूहिक  दुराचार (Group sex  )  और पत्निया  बदल  कर के   व्यभिचार (Wife swaping)  को आधुनिक काल उपज  बताते   है ,उन्हें पता  होना   चाहिए कि  यह  भी इस्लाम   की  सौगात है ,

6-पत्नी  की दसियों  से  सम्भोग 

इसी   किताब   में  आगे   कहा गया  है   ,कि यदि   पकड़ी  गयी  दासी   से  बच्ची   पैदा   हो  जाये   तो  बच्ची  उस  व्यक्ति   की दासी  मानी  जायेगी ,और  ऐसा करना   हलाल   है ,और ऐसा करने  वाले को  कोई सजा  नहीं  होगी ,यही  नहीं ऎसी  औरतें आपस में   बाँट  लेने  (  sharing )  करने  पर भी   बिलकुल   कोई  सजा नहीं   होगी   .

                 لا حد في ذلك أصلا   حلال فإن ولدت فولدها حر , والأمة لامرأته , ولا يغرم الزوج شيئا


It is Halal, if she (the slave girl) gives birth to a child, then the child is free and the slave woman belongs to his wife and there will be no penalty on the husband’.There is no punishment (hadd) in that at all .for sharing a slave-girl  "

http://www.islamweb.net/ver2/library/BooksCategory.php?idfrom=2315&idto=2315&bk_no=17&ID=2258

इस्लामी  देशो   में   औरतों  का   व्यापार  करना   जायज   है  ,जो  इन  हदीसों   से  साबित   होता   है ,

7-औरतों  की  सौदेबाजी 

अबू बकर "इब्न अबी शैबा-  أبي شيبة    "  (195 -235 हि  . ) एक सुन्नी  मुहद्दिस  यानी हदीसों   के  जमा  करने  वाले थे  . इनका पूरा नाम अब्दुल्लाह इब्न  मुहम्मद इब्न इब्राहीम था   . इन्हों  "अल  मुसहफ -المصنف"    नाम  से  हद्दीसों   का  संकलन   किया   है  . इस किताब  में  खलीफा  उमर और उसके  लडके  के बारे  में   जो   बातें    दी   गयी    हैं  ,उन्हें पढ़  कर  मुसलमानों   को शर्म  आना  चाहिए   ,यहाँ पर  उमर  और उसके  बेटे  के बारे  में तीन  हदीसें   दी   जा रही   हैं  .

1.अनस   ने  कहा  कि एक बार उमर गुलामों   के बाजार में गया  तो देखा  कि एक गुलाम औरत सर पर दुपट्टा डाले  हुए  है ,उमर उसे तमाचा   मारा  और दुपट्टा   खींच   कर  कहा  , तू  गुलाम  हो  कर भी  आजाद  औरत की  तरह   दुपट्टा क्यों    डाले हुए  है  .

anas reported: ‘Umar once saw a slave-girl that belonged to us (to Anas) wearing a scarf, so Umar hit her and told her: ‘Don’t assume the manners of a free woman.”

وعن أنس: عمر رأى مرة واحدة في العبيد الفتاة التي ينتمي لنا (لانس) وهو يرتدي وشاح، لذلك ضرب عمر لها وقال لها: "لا تفترض آداب امرأة حرة".

Musnaf Ibn Abi Shaybah,(المصنف لاْبن أبي شيبة   ) -  Volume 2 page 41 Tradition 6236

2.नाफ़अ   ने  कहा   जब   भी उमर  किसी  गुलाम   लड़की  को खरीदना   चाहता था  , तो पहले उस लड़की   की  टांगें उघाड़  देता  था, फिर उसके नितम्बों  और जांघो   के बीच  हाथ  घुसा  कर  जाँच  करता  था  .

نا علي بن مسهر عن عبيدالله عن نافع عن ابن عمر أنه إذا أراد أن يشتري الجارية وضع يده على أليتيها وبين فخذيها وربما كشف عن ساقها

‘Naf’e reported that when Ibn Umar wanted to buy a slave-girl he would place his hand on her buttocks, between her thighs, and may uncover her legs

Musnaf Ibn Abi Shaybah,(المصنف لاْبن أبي شيبة  ) -  Volume 4 page 289 Tradition 20241

3.एक मुजाहिद  ने कहा  कि  मैं  इब्ने उमर  के  साथ   गुलामों   की  मंडी  में  गया तो देखा  वहाँ  व्यापारी  एक गुलाम लड़की   को घेर  कर  उसका सौदा  कर  रहे   थे  , तभी  इब्ने उमर  उनके  पास  गया  और उस लड़की  के   गुप्त  अंग  में हाथ  घुसा  कर   जाँच  करने  के बाद पूछने  लगा कि इस लड़की  का   मालिक  कौन   है  ,यह  तो  बढ़िया   माल  है   .

حدثنا جرير عن منصور عن مجاهد قال كنت مع بن عمر امشي في السوق فإذا نحن بناس من النخاسين قد اجتمعوا على جارية يقلبونها فلما راوا بن عمر تنحوا وقالوا بن عمر قد جاء فدنا منها بن عمر فلمس شيئا من جسدها وقال أين أصحاب هذه الجارية إنما هي سلعة

Mujahid said: ‘I was walking with ibn Umar in a slave market, then we saw some slave dealers gathered around one slave-girl and they were checking her, when they saw Ibn Umar, they stopped and said: ‘Ibn Umar has arrived’. Then ibn Umar came closer to the slave-girl, he touched some private  parts of her body and then said: ‘Who is the master of this slave-girl, she is just a good commodity!’

Musnaf Ibn Abi Shaybah,(المصنف لاْبن أبي شيبة  ) -  Volume 4 page 289 Tradition 20242


8-दासियों की जाच  करने  का तरीका  

इब्न साद  सुन्नी  विद्वान    थे  इनका  काल 784  से 845  ईस्वी   है  , इनका पूरा नाम "मुहम्मद बिन साद  बिन  मनीअ  -محمد بن سعد بن مَنِيع" है  . इन्होने "तबकाते अल कबीर -الطبقات الكبير "  के  नाम  से  हदीसों     का संकलन    किया   है   ,  इसी  से ख़लीफ़ा  उमर  के लडके के  बारे  में यह  हदीस   दी  जा रही  है ,

"मुसैब बिन दारूम  ने कहा  कि  मैंने देखा  उमर  एक  छड़ी  से  पकड़ी  गई गुलाम  लड़की  के सर से  दुपट्टा निकालते  हुए  बोले सिर्फ  आजाद  औरतें  ऐसा   कर  सकती   हैं   ?.

Al-Musaiab bin Darum said: ‘I saw Umar holding a stick in his hand and striking a slave-girl’s head until her scarf same off, he the said: ‘Why does the slave assume the manners of free woman?’

 Tabaqat ibn Saad,( الطبقات الكبرى ) Volume 7 page 127

9-छातियाँ  हिलाना   कर देखना 
ऐसे   ही एक सुन्नी  विद्वान् "अब्दुर रज्जाक अल सनआनी - عبد الرزاق الصنعاني "   हैं  ,जिनका काल 126 -211  हिजरी   है , इनकी   हदीस   की  किताब  का  नाम  " मसनफ -مصنف "   इसमे भी खलीफा  उमर  के बारे में  यह  हदीस   दी   जा  रही   है   .

"मुजाहिद ने  कहा कि  ऊमर गुलाम   लड़कियां   खरीदते  समय  अंदर   हाथ  घुसा  कर  उस लड़की   स्तन  हिला हिला   कर  जांच  करते  थे  . "

Mujahid reported that ibn Umar placed his hand between (a slave-girl’s) breasts and shook them’

'عن مجاهد أن بن عمر وضع يده بين الثديين (عبدا، الفتاة) وزلزلهم "

Musnaf Abdur Razak,( مصنف عبد الرزاق  ) Volume 7 page 286 Tradition 13204

10-दासियों की छातियाँ दबा कर जांच 

सुन्नी  इमाम " अल बेयहकी -البيهقي'' अपनी  हदीस   की  किताब "सुन्नन अल  कुबरा -السنن الكبرى"   में उमर  के बारे में बताते हैं   ,कि अनस  बिन मलिक  ने बताया   खलीफा  उमर  के  यहाँ जो  दासियाँ    काम  करती  थी  ,उमर उनके  कपडे  उतार  कर  बाल  खोल  देते  थे  , फिर अपने हाथों  से   उनके  स्तन हिलाया   करते  थे "Anas bin Malik said: ‘The slave-girls of Umar were serving us with uncovered hair and their breasts shaking”


عن جده أنس بن مالك قال كن إماء عمر رضي الله عنه يخدمننا كاشفات عن شعورهن تضطرب ثديهن
قال الشيخ والآثار عن عمر بن الخطاب رضي الله عنه في ذلك صحيحة


Al-Sunnan al-Kubra(السنن الكبرى ) -Volume 2 page 227

  नाफय ने यह भी   बताया  कि जब  भी  औरतें  पकड़ी   जाती थी  , तो उनको  बेचने से पहले उमर  लड़का औरतों   की  जाच करने के लिए उनके  नितम्ब और  छातियाँ  दबा कर  और गुप्तांग  में  हाथ  डाल कर परीक्षा    करता  था  "

Nafe’e narrated that whenever Ibn Umar wanted to buy a slave-girl, he would inspect her by analysing her legs and placing his hands between her breasts and on her buttocks”
عن نافع ، عن ابن عمر ” أنه كان إذا اشترى جارية كشف عن ساقها ووضع يده بين ثدييها و على عجزها

Al-Sunnan al-Kubra(السنن الكبرى ) -Volume 5  page 329
    
11-पकड़ी गयी औरतों से  बलात्कार 
इस्लामी   कानून  के अनुसार  अगवा  की  गयी ,या  अपहरण     करके  उठायी   गई    लड़कियों  से  भी  सम्भोग  करना   जायज   है  ,   जैसा   कि इस  हदीस   में   कहा   है  ,सलमा  बिन मुहब्बक  ने  कहा  कि रसूल   ने  कहा  जो भी  व्यक्ति  अपनी   पत्नी  की  दासी से  सम्भोग  करना  चाहे  तो वह  पहले अपनी  पत्नी   से  सहमति    प्राप्त   कर   ले   .

، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَضَى فِي رَجُلٍ وَقَعَ عَلَى جَارِيَةِ امْرَأَتِهِ إِنْ كَانَ اسْتَكْرَهَهَا فَهِيَ حُرَّةٌ وَعَلَيْهِ لِسَيِّدَتِهَا مِثْلُهَا فَإِنْ كَانَتْ طَاوَعَتْهُ فَهِيَ لَهُ وَعَلَيْهِ لِسَيِّدَتِهَا مِثْلُهَا 

 a man who  like  intercourse with his wife’s slave-girl ,ask her  if she ask if  she have intercourse voluntarily

सुन्नन अबी दाउद - किताब 39 हदीस 444

12-योनि उधार पर देना 
हनफी फिरके  के इमाम  शेख "अल तूसी "  ने अपनी  किताब  " अल मसबूत -  كـتـاب الـمـبسـوط" में दासियों   या युद्ध   में पकड़ी  गयी  औरतों   की  योनि  को  किराये पर  देने    का तरीका   भी  बता  दिया   है  ,अरबी  में इसे "इआरतुल फ़ुर्ज -  الفرج   إعارة" "    यानी  "Loaning  of Vagina "  कहा  जाता   है  ,शिआ फिक्का  की  किताब   में  इस  विषय  में एक  अलग  से  अध्याय   दिया   गया   है   , इमाम कहते   हैं,

  "ऐसी  औरत   जो   मासिक   से  हो  उसको  बेचने वाले  और खरीदने  वाले   के  लिए जायज   नही   है  ,  और ऎसी  दशा में  उसकी  योनि  को  छोड़  दूसरी  जगह   सम्भोग   कर  सकते  हैं  , या उसे  चूम  सकते   हैं   , या  उसकी योनि  किराये  पर  दे  सकते   हैं "
الاستبراء في الجارية واجب على البايع والمشتري معا ، والإستبراء يكون بقرء واحد وهو الطهر ، ولا يجوز للمشتري وطئها قبل الاستبراء في الفرج ولا في غيره ولا لمسها بشهوة ولا قبلتها "

in  the monthly period. It is not allowed for the buyer to have sexual relation with her through her vagina or other part,exept to touch her with lust or to kiss her ,or loan her vagina”

Al-Mabsut( كـتـاب الـمـبسـوط في الـفـقـه الـحـنـفـي ) volume 2 page 140

13-दासियो  की योनि उपहार में  
सुन्नी इमाम "इब्न  हज्म - ابن حزم  "  ने अपनी  किताब " अल  महला-المحلى "  में  इसी विषय   में और  विस्तार  से  बताया   है  , किसी ने  उन  से   सवाल- 2222 किया था ,
समस्या  -गुलाम औरतो की योनि दूसरों को देने  के बारे   में ,इमाम   ने  जवाब दिया  कि  जब  तक  वह दासी   उस  व्यक्ति   के   कब्जे   में  रहे    वह  व्यक्ति  जल्दी  जल्दी  उस  दासी   की  जांघों   के  बीच   से  सम्भोग   कर  सकता   है  ,

مسألة : من أحل فرج أمته لغيره ؟
نا حمام نا ابن مفرج نا ابن الأعرابي نا الدبري نا عبد الرزاق عن ابن جريج قال : أخبرني عمرو بن دينار أنه سمع طاوسا يقول : قال ابن عباس : إذا أحلت امرأة الرجل , أو ابنته , أو أخته له جاريتها فليصبها وهي لها , فليجعل به بين وركيها ؟
2222: Problem: Who allowed the vagina of his slave woman to the others?

 let him perform quick intercourse between her thighs”

Al-Mahala( :ابن حزم - المحلى ) Volume 12 pages 207-209

14-सार्वजनिक बलात्कार 

जिहाद  में  गैर  मुस्लिमों  की  संपत्ति  लूटने   के साथ  औरतें     भी  पकड़ी   जाती    हैं ,जिन्हे  जिहादी  यातो  खुद रख लेते हैं  या  बेच देते   हैं  , यह हदीस इमाम  बुखारी   ने  ऐतिहासिक  किताब" तारीखे  कबीर - التاريخ الكبير"   में  संकलित    की   है ,सन  627  ई ० यानि  19  हिजरी   के मुहर्रम  महीने  में  ख़लीफ़ा  उमर  ने  दमिश्क  (Conquest of Damascus  )के" जलूला - جلولاء "कस्बे  पर   हमला   किया  , उमर  साथ  उसका  बेटा   भी   था ,इस  घटना   से अंदाजा   हो   जायेगा  कि इन   बाप  बेटा  का  चरित्र  कैसा  था  ,  हदीस में   कहा  है  ,
अय्यूब  बिन अबुल्लाह   ने  कहा   कि इब्ने उमर  ने  बताया  कि  जलूला   के  हमले  में  मैंने एक लड़की  पकड़ी  ,  जिसकी  गर्दन   चांदी  की  जैसी  थी ,उसे देख  कर  मैं अपनी  कामेच्छा   को  नहीं  रोक सका   , और फ़ौरन उस  पर   चढ़     गया   , और चूमने   लगा  ,  वहाँ   मौजूद    सभी   लोग   मजे  से  देख  रहे  थे ,किसी  ने कुछ  नहीं   कहा   .

“Narrated Ayoub bin Abdullah   that ibn Umar said: ‘On the day of the  Jalula  battle I won a slave-girl, her neck was like a silver ewe.’ Then ibn Umar added: ‘I couldn’t control myself, I immediately jumped on her and began kissing her, while the people were looking at me”

"رواه أيوب بن عبد الله بن عمر أن قال:" في يوم من معركة جلولاء فزت الرقيق فتاة، كان عنقها مثل النعجة الفضة. "ثم أضاف بن عمر:" لم أتمكن من السيطرة على نفسي، وعلى الفور قفز على بلدها وبدأت تقبيلها، في حين أن الناس كانوا يبحثون في وجهي "
(The battle of Jalula,of Muharram, 19 A.H. (642 A.C.) جلولاء)

Al-Tarikh al-Kabir(التاريخ الكبير  (of Imam Bukhari, Volume 1 page 419, No. 1339

15-दहेज  में  दासी  की योनि 
बशरह  ने  कहा  कि एक अनसार  रसूल  के पास  गया और  बोला मैंने एक कुंवारी   दासी  से  शादी  की  थी ,  लेकिन   बाद  में  पता चला  कि वह  गर्भवती  हैं ,रसूल   ने   कहा  कि  वह  दहेज़  के  रूप में  अपनी  योनि ( फुर्ज )  तो  दे  रही   है , फिर  उसका   जो बच्चा  होगा  वह  भी  तुम्हारा  गुलाम  होगा ,
" She will get the dower, for you made her VAGINA (farj) lawful for you. The child will be your slave"


، عَنْ رَجُلٍ، مِنَ الأَنْصَارِ - قَالَ ابْنُ أَبِي السَّرِيِّ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم وَلَمْ يَقُلْ مِنَ الأَنْصَارِ ثُمَّ اتَّفَقُوا - يُقَالُ لَهُ بَصْرَةُ قَالَ تَزَوَّجْتُ امْرَأَةً بِكْرًا فِي سِتْرِهَا فَدَخَلْتُ عَلَيْهَا فَإِذَا هِيَ حُبْلَى فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ لَهَا الصَّدَاقُ بِمَا اسْتَحْلَلْتَ مِنْ فَرْجِهَا وَالْوَلَدُ عَبْدٌ لَكَ فَإِذَا وَلَدَتْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ الْحَسَنُ ‏"‏ فَاجْلِدْهَا ‏"‏ ‏.‏ وَقَالَ ابْنُ أَبِي السَّرِيِّ ‏"‏ فَاجْلِدُوهَا ‏"‏ ‏

सुन्नन अबी  दाउद - किताब 11  हदीस 2126

16-दासी के साथ बच्चा भी बेच दो 

अबू दाऊद    ने बताया कि  हिजरी सन 63  में  हर्रा  की लड़ाई  में  जब अली  ने एक  औरत  को बच्चे   के  साथ  पकड़ा   और  औरत  को बेचने   लगे  तो यह  बात अबी  शैब  ने   रसूल   को बता दी  , रसूल  बोले   तुम  औरत  के  साथ  बच्चे   को  भी बेच दो , इस से  अधिक   कीमत  मिलेगी  "
، عَنْ عَلِيٍّ، أَنَّهُ فَرَّقَ بَيْنَ جَارِيَةٍ وَوَلَدِهَا فَنَهَاهُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم عَنْ ذَلِكَ وَرَدَّ الْبَيْعَ ‏.

सुन्नन अबी दाऊद  - किताब 14 हदीस 2690

17-टेक्स के बदले बलात्कार 

इस्लामी  कानून  के अनुसार हरेक  गैर  मुस्लिम   से  हर साल गैर   मुस्लिम   से  हर साल उसकी सम्पत्ति   का पांचवा  भाग  यानि 20  प्रतिशत   टेक्स   लिया   जाता   है  , इसे अरबी  में " ख़ुम्स -  الْخُمُسَ "   कहा  जाता   है  ,इसी  के बारे में  यह  हदीस  है  , जिसमे  बताया है कि ख़ुम्स   नही  चुका   पाने  पर उस  व्यक्ति   की  औरत   से  बलात्कार  किया   जा  सकता   है ,
"बुरैदा   ने कहा कि रसूल   ने  अली   को ख़ुम्स  के  बदले   औरत  पकड़ने   के   भेजा   था  ,  लेकिन  जब अली  उस औरत  के  साथ  बलात्कार  करके  वापस आ रहा था  तो लोगों  ने  देख   लिया  , और  रसूल   को  बता  दिया   . रसूल  बोले  तुंम अली   से क्यों   नाराज   हो  , इस  से अच्छा  ख़ुम्स   कौन  सा  हो सकता है  ?
O Buraida! Do you hate `Ali?" I said, "Yes." He said, "Do you hate him, for he deserves more than that from the Khumlus."


، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ ـ رضى الله عنه ـ قَالَ بَعَثَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم عَلِيًّا إِلَى خَالِدٍ لِيَقْبِضَ الْخُمُسَ وَكُنْتُ أُبْغِضُ عَلِيًّا، وَقَدِ اغْتَسَلَ، فَقُلْتُ لِخَالِدٍ أَلاَ تَرَى إِلَى هَذَا فَلَمَّا قَدِمْنَا عَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم ذَكَرْتُ ذَلِكَ لَهُ فَقَالَ ‏"‏ يَا بُرَيْدَةُ أَتُبْغِضُ عَلِيًّا ‏"‏‏.‏ فَقُلْتُ نَعَمْ‏.‏ قَالَ ‏"‏ لاَ تُبْغِضْهُ فَإِنَّ لَهُ فِي الْخُمُسِ أَكْثَرَ مِنْ ذَلِكَ ‏"‏‏

सही बुखारी  - जिल्द 5 किताब 59  हदीस 637

जितने भी  मुस्लिम   बादशाह   हुए  हैं ,सभी  अय्याश   थे  , जैसा कि  उमर  का  बेटा  था   ,

18-उमर के  लडके  की अदम्य  वासना 
सुन्नी इमाम मुहम्मद  बिन हम्बल   ने अपनी   किताब ' मसाइल अहमद -مـسـائـل الإمـام أحـمـد  "  में  लिखा  है  कि उमर का  लड़का  इतना  कामांध  था  कि पकड़ी  गयी  हरेक  औरत के शारीरिक  रूप  से  आसक्त   हो  कर उसे प्राप्त  करना चाहता  था
:وذكر أبويوسف في الأمالي أن أباحنيفة كان يقول بالقياس ثم رجع إلى الاستحسان فقال ليس عليه أن يستبرئها وهو قول أبي يوسف ومحمد رحمهما الله

  . Ibn Umar was extremely passionate when it came to the physical beauty of slave-girls,and want to touch  her .

 Masail al-Imam Ahmad ( -مـسـائـل الإمـام أحـمـد بن حـنـبـل )-page 281


अब  इतने  पुख्ता  सबूत  दने  पर  भी  यदि   कोई  इस  सत्य  को  नहीं   मानता  कि  हरेक  यौन  अपरध  की  प्रेरणा  इस्लामी  तालीम से   मिलती  है  ,  जो  मुस्लिम   बच्चो   को  बचपन  में  ही  मिल  जाती   है  , फिर जब  वह जवान   हो  जाते  हैं तो ऐसे   ही जघन्य  अपराध  करते   हैं  , और उनकी संगती   से  कुछ  हिन्दू  युवक   भी  फस  जाते   हैं  , यदि  इन  अपराधों    को रोकना    हो  तो  इस्लाम  की ऎसी तालीम   पर  रोक  लगाना  जरूरी     है  ,

 यह  ईस्वी  संवत  का  पहला  और  नए ब्लॉग  का 160  वां   लेख   है  ,



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