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रविवार, 18 मई 2014

|| मनु स्मृती ||

|| मनु स्मृती ||
काममामरणात्तिष्ठेत गृहे कन्यर्तुमत्यपि ।
न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित ॥ मनु स्मृति ९ ।८९
अर्थात कन्या ऋतुमति होने पर भी चाहे मरणपर्यंत घर मे बैठी रहे किन्तु गुण हीन वर के लिए उसे कदापि नहीं देना चाहिये ॥

सुयोग्य वर को ही कन्या देनी चाहिये -----------------------
मनु स्मृति ९ ।८९

काममामरणात्तिष्ठेत गृहे कन्यर्तुमत्यपि ।
न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित ॥ मनु स्मृति ९ ।८९
अर्थात कन्या ऋतुमति होने पर भी चाहे मरणपर्यंत घर मे बैठी रहे किन्तु गुण हीन वर के लिए उसे कदापि नहीं देना चाहिये ॥

सन्ध्या करना प्रत्येक मनुष्य का परम धर्म है

सन्ध्या करना प्रत्येक मनुष्य का परम धर्म है 
सन्ध्या करना प्रत्येक मनुष्य का परम धर्म है ---------------
न तिष्ठति तु यः पूर्वा नोपास्ते यश्च पश्चिमाम ।
स शूद्रवद बहिष्कार्यः सर्वस्माद द्विजकर्मणः॥ मनु स्मृति २।१०३
अर्थात जो मनुष्य प्रातः और सायं सन्ध्या नहीं करता वह समस्त द्विजकर्मो से शूद्र की भांति बाहर कर देने योग्य है ॥१०३

मनु जन्मना वर्णव्यवस्था नहीं मानते

मनु जन्मना वर्णव्यवस्था नहीं मानते । शिक्षा – दीक्षा के उपरान्त आचार्य योग्यता के आधार पर अन्तिम रूप से वर्णों का निश्चय करता है । जो व्यक्ति इन तीनों ( ब्रह्मण , क्षत्रिय , वेश्य ) वर्णों के गुणों को धारण नहीं कर पाता , इसी कारण अज्ञानता के प्रतीकरूप में शुद्र की उपमा दी है । वस्तुतः जो व्यक्ति
पढ – लिख नहीं पाता और ऊपर के किसी वर्ण के किसी वर्ण के योग्य नहीं होता वही शूद्र कहलाता है ।
उदा॰ २।१२१-१२३ ,२।१४-१५ ,२।१२६
शूद्र को धर्मपालन का अधिकार है । मनु॰ २।२१३
शूद्र को वेदाध्ययन का अधिकार है । यजु॰ २६।२
वेदों में शूद्र को यज्ञ आदि धार्मिक कार्य करने का अधिकार है । ऋग्वेद १०।५३।४-५
शूद्र श्रेष्ठ और पवित्र कर्मो को करके उत्कृष्ट वर्णों को प्राप्त कर सकता है । मनु॰९।३३५