अष्टांग योग मे यम का महत्व लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अष्टांग योग मे यम का महत्व लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 18 मई 2014

योगा

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश
पूज्यपाद स्वामी रामदेवजी महाराज जन्म-जन्मान्तरों के पुण्य प्रताप से बालब्रह्मचारी, व्याकरण, आयुर्वेद सहित वैदिक दर्शनों के महान् मनीषी, श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ एवं तितिक्षु सन्यासी हैं। आप वेदों के प्रकाण्ड विद्वान, परम तपस्वी, कर्मयोगी ऋषी, आचार्य श्री बलदेवजी महाराज गुरुकुल कालवा के शिष्य हैं। आपने ब्रह्मचर्य आश्रम से ही, पूजनीय तपस्वी अनासक्त संत श्री शंकरदेवजी महाराज से भगीरथी के पावन तट पर सन्यास दीक्षा धारण की।

अष्टध्यायी, महाभाष्य, व दर्शनोपनिषदादि ग्रन्थों को गुरुकुलों में पढ़ाया। हिमालय विचरण करते हुए गंगोत्री की पवित्र गुहाओं में तपश्चर्या व ब्रह्माराधना के द्वारा आध्यात्मिक शक्तियों का अर्जन कर हरिद्वार में अपने परम तपस्वी विद्वान व आयुर्वेद के महान् मनीषी, गवेषक आचार्य श्री बालकृष्ण को साथ लेकर सन् 1995 पावन तीर्थ कनखल में दिव्य योग मन्दिर (ट्रस्ट) की स्थापना कर साधना करते हुए आरोग्य आध्यात्मिक एवं शैक्षणिक सेवा प्रकल्पों का प्रारम्भ किया।

आपके पावन सान्निध्य में आयोजित शताधिक निःशुल्क योगसाधाना एवं योग चिकित्सा शिविरों में लाखों ने असाध्यरोगों से मुक्ति व आध्यात्मिक मार्ग दर्शन प्राप्त किया है। आश्रम के आयुर्वेदिक चिकित्सा आदि सेवा कार्यों से प्रतिवर्ष लाखों लोग तन-मन का स्वास्थ्य एवं आध्यात्मिक रोशनी पा रहे हैं। वैदिक संस्कार एवं आधुनिक शिक्षा पर आधारित एक विशाल आवासीय गुरुकुल किशनगढ़ घासेड़ा का हरियाणा के रेवणी जिले में संचालन कर रहें हैं। फलाहार मात्र पर आश्रित आपका तपस्वी सरल, सहज, स्नेही योगमय व्यक्तित्व सबकी श्रद्धा का केन्द्र है। सेवा व साधना में अहर्निशरत आप हम सबके प्रेरणास्त्रोत, वन्दनीय, श्रद्धेय व अनुकरणीय हैं।

आचार्य बालकृष्ण

प्रकाशकीय

धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् : धर्म का अनुष्ठान, अर्थोपार्जन, दिव्यकामना (शिव-संकल्प) से सन्तति-उत्पत्ति तथा मोक्ष की सिद्धि- इन चतुर्विध पुरुषार्थों को सिद्ध करने के लिए सर्वतोभावेन स्वस्थ होना परम आवश्यक है। जहाँ शरीर रोग-ग्रस्त है, वहाँ सुख शान्ति एवं आन्नद कहाँ ? भले ही धन, वैभव, ऐश्वर्य इष्ट-कुटुम्ब तथा नाम, यश सब कुछ प्राप्त हो, फिर भी यदि शरीर स्वस्थ नहीं है तो जीवन एक भार बन जाता है। जिनके शरीर एवं मन स्वस्थ नहीं, मष्तिष्क में चेतना, देह में स्फूर्ति तथा धमनियों में शक्ति नहीं, शरीर में रक्त-संचार ठीक से नहीं होता, अंग-प्रत्यंग सुदृढ़ नहीं, एवं स्त्रायुओं में बल नहीं, वह मानव-शरीर मुर्दा ही कहा जायेगा। मनाव-जीवन में नीरोग देह और स्वास्थ मन प्रात्त करने के लिए आयुर्वेद का प्रादुर्भाव हुआ है, जो आज भी विद्यमान है। शरीर के आन्तरिक मलों एवं दोषों को दूर करने तथा अन्तःकरण की शुद्धि करके समाधि द्वारा पूर्णानन्द की प्राप्ति हेतु ऋषि, मुनि तथा सिद्ध योगियों ने यौगिक प्रक्रिया का अविष्कार किया है। योग-प्रक्रियाओं के अन्तर्गत प्राणायाम का एक अतिविशिष्ट महत्त्व है। पतंजलि ऋषि ने मनुष्य-मात्र के कल्याण हेतु अष्टांग योग की विधान किया है। उनमें यम, नियम और आसन-बहिरंग योग के अन्तर्गत हैं, जो शरीर और मन को शुद्ध एवं पवित्र करने में सहायक हैं।

धारणा, ध्यान और समाधि अन्तरंग योग के अन्तर्गत हैं जो आत्मोत्थान एवं कैवल्यानन्द की प्राप्ति के साधन हैं। प्राणायाम-अन्तरंग एवं बहिरंग योग के बीच सेतु का कार्य करता है।, यदि शरीर को स्वस्थ एवं रोगमुक्त करना हो या मन को पवित्र या आत्मा को निर्मल करना हो, तो वह प्राणायाम से सम्भव है। प्राणायाम के द्वारा वृत्ति-निरोध करके और आत्मास्थ होकर ही साधक जीवन्मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

दिव्य योग मन्दिर ट्रस्ट, कनखल, हरिद्वार के संस्थापक अध्यक्ष योग ऋषि श्रद्धेय स्वामी रामदेव महादेवजी महाराज के सान्निध्य में लाखों साधक प्रतिवर्ष प्राणायाम, ध्यानाधि योग की विशिष्ट प्रक्रियाओं का क्रियात्मक प्रशिक्षण प्राप्त करते हुए तन के रोगों एवं मन के दोषों से मुक्ति पाते हैं। स्वामीजी महाराज का अपने अनुभवों के आधार पर विश्वास है कि अस्थमा, हृदयरोग, मधुमेह, मोटापा, कब्ज, अम्लपित्तादि लगभग 80 प्रतिशत व्याधियाँ मात्र प्राणायाम के 45 मिनट के अभ्यास से अल्प समय में ही दूर हो जाती हैं तथा प्राणायाम से मन का निग्रह होने से ध्यान एवं समाधि की सिद्धि भी सहज ही हो जाती है।
इस पुस्तक से बालक, वृद्ध युवक, रोगी, निरोगी, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी संन्यासी तथा सर्वसाधारणजन लाभान्वित होंगे, ऐसी आशा हम करते हैं।

आचार्य बालकृष्ण

आत्म निवेदन

सिद्ध योगियों एवं पतंजलि आदि ऋषि-मुनियों द्वारा प्रतिपादित प्राणायाम एक पूर्ण वैज्ञानिक पद्धति है, जिससे असाध्य रोगों से मुक्ति के साथ मन की शान्ति एवं समाधि की प्राप्ति भी होती है। आज योग के नाम पर कुछ तथाकथित योगी व्यक्ति एवं समाज के लिए अष्टांग योग की अतिमहत्ता एवं उपयोगिता को भुलाकर मात्र आसनों का ही अधिक प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इससे समाज में योग के नाम पर भ्रम व्याप्त होता जा रहा है। इसके लिए महर्षि पतंजलि-प्रतिपादित अष्टांग योग को प्रचारित करना बहुत आवश्यक है, अन्यथा योग जैसा गरिमामय अति उदात्त शब्द भी संकीर्ण-सा होकर रह जायेगा।

हमने ‘योग-साधना एवं योगाचिकित्सा-रहस्य’ नामक पुस्तक में प्राणायाम को छोड़कर योग का संमग्र रूप से वर्णन किया है। इस ‘प्राणायाम–रहस्य’ पुस्तक में प्राणायाम एवं कुण्डलिनी-जागरण का अनुभवात्मक प्रामाणिक वर्णन देने का प्रयत्न किया है। लाखों व्यक्तियों पर प्रयोगात्मक अनुभवों के आधार पर मेरा मानना है कि प्राणायाम का आरोग्य एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से विशेष महत्त्व है। रोगोपचार की दृष्टि से भी हड्डी के रोगों को छोड़कर शेष सभी व्याधियाँ आसनों से नहीं, अपितु प्राणायाम से ही दूर हो सकती हैं। हृदयरोग, अस्थमा, स्नायुरोग, वातरोग, मधुमेह आदि जटिल रोगों की प्राणायाम के बिना निवृत्ति नहीं हो सकती तथा आसन भी तभी पूर्ण लाभादायक होते हैं, जब वे प्राणायामपूर्वक किये जाते हैं।

प्राणायाम बालक से वृद्ध पर्यन्त सभी सहजता से कर सकते हैं। प्रस्तुत पुस्तक को रोग-साधकों के आग्रह पर पृथक् से प्रकाशित किया जा रहा है। इस पुस्तक को आकर्षण एवं उपयोगी स्वरूप प्रदान करने के लिए साधक एवं परोपकारशील माननीय श्रीलक्ष्मीचन्द्रजी नागर को हार्दिक साधुवाद देता हूँ, जो आश्रम के प्रकाशन-सेवा-प्रकल्पों में अहर्निश संलग्न हैं। यथोचित परामर्श हेतु आयुर्वेद के महान मनीषी एवं गवेषक पूज्य आचार्य श्रीबालकृष्णजी महाराज के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए प्राणायाम एवं ध्यान-विषयक रंगीन चित्रों-सहित पुस्तक को भव्य-रूप में प्रकाशित करने के लिए साईं सिक्यूरिटी प्रिंटर्स लिमिटेड को भी धन्यवाद देता हूँ तथा भगवान् से इनके समृद्ध दीर्घजीवन के लिए प्रार्थना करता हूँ।
योगिराज श्रीजगन्नाथजी पथिक, जिनके आध्यात्मिक ज्ञान एवं अनुभवों से मैंने स्वयं बहुत कुछ पाया है; उनकी पुस्तक ‘सन्ध्या-योग और ब्रह्म-साक्षात्कार’ से इस पुस्तक में चक्रादि से सम्बद्ध रंगीन छायाचित्रादि का संकलन किया गया है। एतदर्थ मैं ब्रह्मलीन साधक पूज्यपाद श्रीपथिकजी महाराज के प्रति कृतज्ञ हूँ और आशान्वित हूँ कि योग-साधकों के साधना-पथ में यह पुस्तक सहयोगी होगी।

स्वामी रामदेव

प्राण का अर्थ एवं महत्त्व

पंच तत्त्वों में से एक प्रमुख तत्त्व वायु हमारे शरीर को जीवित रखती है और वात के रूप में शरीर के तीन दोषों में से एक दोष है, जो श्वास के रूप में हमारा प्राण है।

पित्तः पंगुः कफः पंगुः पंगवो मलधातवः।
वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत्।।
पवनस्तेषु बलवान् विभागकरणान्मतः।
रजोगुणमयः सूक्ष्मः शीतो रूक्षो लघुश्चलः

(शांर्गधरसंहिताः 5.25-26)

पित्त, कफ, देह की अन्य धातुएँ तथा मल-ये सब पंगु हैं, अर्थात् ये सभी शरीर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्वयं नहीं जा सकते। इन्हें वायु ही जहाँ-तहाँ ले जाता है, जैसे आकाश में वायु बादलों को इधर-उधर ले जाता है। अतएव इन तीनों दोषों-वात, पित्त एवं कफ में वात (वायु) ही बलवान् है; क्योंकि वह सब धातु, मल आदि का विभाग करनेवाला और रजोगुण से युक्त सूक्ष्म, अर्थात् समस्त शरीर के सूक्ष्म छिद्रों में प्रवेश करनेवाला, शीतवीर्य, रूखा, हल्का और चंचल है।
उपनिषदों में प्राण को ब्रह्म कहा है। प्राण शरीर के कण-कण में व्याप्त है, शरीर के कर्मेन्द्रियादि तो सो भी जाते हैं, विश्राम कर लेते हैं, किन्तु यह प्राण-शक्ति कभी न सोती है, न विश्राम ही करती है। रात-दिन अनवरत रूप में कार्य करती ही रहती है, चलती ही रहती है-‘चरैवेति चरैवेति’ यही इसका मूलमन्त्र है। जबतक प्राण-शक्ति चलती रहती है, तभी तक प्राणियों की आयु रहती है। जब यह इस शरीर में काम करना बन्द कर देती है, तब आयु समाप्त हो जाती है। प्राण जबतक कार्य करते रहते हैं, तभी तक जीवन है, प्राणी तभी तक जीवित कहलाता है। प्राण-शक्ति के कार्य बन्द करने पर वह मृतक कहलाने लगता है। शरीर में प्राण ही तो सब कुछ है। अखिल ब्रह्माण्ड में प्राण सर्वाधिक शक्तिशाली एवं उपयोगी जीवनीय तत्त्व है प्राण के आश्रय से ही जीवन है।

प्राण के कारण ही पिण्ड (देह) तथा ब्राह्माण्ड की सत्ता है। प्राण की अदृश्य शक्ति से ही सम्पूर्ण विश्व का संचालन हो रहा है। हमारा देह भी प्राण की उर्जा-शक्ति से क्रियाशील होता है। हमारे अन्नमय कोश (PHYSIKAL BODY) तथा दृश्य शरीर भी प्राणमय कोश (ETHRICAL BODY) की अदृश्य शक्ति से संचालित होता है। अहार के बिना व्यक्ति वर्षों जीवित रह सकता है, परन्तु प्राण-तत्त्व के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकता। प्राणिक ऊर्जा (ओरा) ही हमारी जीविनी-शक्ति तथा रोग- प्रतिरोधक शक्ति का आधार है। सभी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थियों (GLANDS), हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क एवं मेरूदण्ड-सहित सम्पूर्ण शरीर को प्राण ही स्वास्थ्य एवं ऊर्जावान् बनाता है। प्राण की ऊर्जा से ही आँखों में दर्शन-शक्ति, कानों में श्रवण-शक्ति, नासिका में घ्राण-शक्ति, वाणी में सरसता, मुख पर आभा, ओज एवं तेज, मस्तिष्क में ज्ञान-शक्ति एवं उदर में पाचन-शक्ति कर्यरत रहती है। इसलिए उपनिषदों में ऋषि कहते हैं :

प्राणस्येदं वशे सर्वं यत् त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्।
मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति।।

(प्रश्नोपनिषद्:2.13)

पृथिवी, द्यु तता अन्तरिक्ष तीन लोकों में जो कुछ भी है, वह सब प्राण के वश में है। हे प्राण ! जैसे माता स्नेहाभाव से पुत्रों की रक्षा करती है, ऐसे ही तू हमारी रक्षा कर। हमें श्री (भौतिक सम्पदा) तथा प्रज्ञा (मानसिक एवं आत्मिक ऐश्वर्य) प्रदान कर।

प्राण के प्रकार

प्राण साक्षात् ब्रह्म से अथवा प्रकृति-रूपी माया से उत्पन्न है। प्राण गत्यात्मक है। इस प्राण की गत्यात्मक सदागतिक वायु में पायी जाती है, अतः गौणी वृत्ति में वायु को प्राण कह देते हैं। शरीरगत स्थानभेद से एक ही वायु प्राण, अपान आदि नामों से व्यवहृत होता हैं। प्राण–शक्ति एक है। इसी प्राण को स्थान एवं कार्यों के भेद से विविध नामों से जाना जाता है। देह में मुख्य रूप से पाँच प्राण तथा पाँच उपप्राण हैं।

पंचप्राण की अवस्थिति तथा कार्य :

1. प्राण : शरीर में कण्ठ से हृदय पर्यन्त जो वायु कार्य करता है, उसे ‘प्राण’ कहा जाता है।
कार्य : यह प्राण नासिका-मार्ग, कण्ठ, स्वर-तन्त्र वाक्-इन्द्रिय, अन्न-नलिका, श्वसन-तन्त्र, फेफड़ों एवं हृदय को क्रियाशीलता तथा शक्ति प्रदान करता है

2. अपान : नाभि के नीचे से पैर के अंगुष्ठ पर्यन्त जो प्राण कार्यशील रहता है, उसे ‘अपान’ प्राण कहते हैं।

3. उदान : कण्ठ के ऊपर से सिर पर्यन्त देह में अवस्थित प्राण को ‘उदान’ कहते हैं।

कार्य : कण्ठ से ऊपर शरीर के समस्त अंगों-नेत्र, नासिका एवं सम्पूर्ण मुखमण्डल को ऊर्जा और आभा प्रदान करता है। पिच्युटरी तथा पिनियल ग्रन्थि-सहित पूरे मष्तिष्क को यह ‘उदान’ प्राण क्रियाशीलता प्रदान करता है।
4. समान : हृदय के नीचे से नाभि पर्यन्त शरीर में क्रियाशील प्राणवायु को ‘समान’ कहते हैं।

कार्य : यकृत्, आँत, प्लीहा एवं अग्न्याशय-सहित सम्पूर्ण पाचन-तन्त्र की आन्तरिक कार्य-प्रणाली को नियन्त्रित करता है।

5. व्यान : यह जीवनी प्राण-शक्ति पूरे शरीर में व्याप्त है। शरीर की समस्त गतिविधियों को नियमित तथा नियन्त्रित करती है। सभी अंगों मांस-पेशियों, तन्तुओं, सन्धियों एवं नाड़ियों को क्रियाशीलता, उर्जा एवं शक्ति यही ‘व्यान प्राण’ प्रदान करता है।

इन पाँच प्राणों के अतिरिक्त शरीर में ‘देवदत्त’, ‘नाग’ ‘कृंकल’, ‘कूर्म’ एवं ‘धनंजय’ नामक पाँच उपप्राण हैं, जो क्रमशः छींकना, पलक झपकाना, जँभाई लेना, खुजलाना, हिचकी लेना आदि क्रियाओं को संचालित करते हैं।
प्राणों का कार्य प्राणामय कोश से सम्बन्धित है और प्राणायाम इन्हीं प्राणों एवं प्राणमय कोश को शुद्ध, स्वस्थ और नीरोग रखने का प्रमुख कार्य करता है, इसलिए प्राणायाम का सर्वधिक महत्त्व और उपयोग भी है। प्राणायाम का अभ्यास शुरू करने से पहले इसकी पृष्ठभूमि का परिज्ञान बहुत आवश्यक है। अतः, प्राणायाम-रूपी-साधना के प्रकरण के आरम्भ में प्राणों से सम्बन्धित विवरण दिया गया है। पाठकों को सुविधा के लिए प्राणदर्शन-तालिका अगले पृष्ठ पर दी जा रही है।

देह में स्थति पंचकोष

मनुष्य की आत्मा पाँच कोशों के साथ संयुक्त है, जिन्हें पंचशरीर भी कहते हैं। ये पाँच कोश निम्नांकित हैं :

1. अन्नमय कोश : यह पांचभौतिक स्थूल शरीर का पहला भाग है। अन्नमय कोश त्वाचा से अस्थिपर्यन्त पृथ्वी-तत्त्व से सम्बन्धित है। आहार-विहार की सुचिता, आसन-सिद्ध और प्राणायाम करने से अन्नमय कोश की शुद्धि होती है।

2. प्राणमय कोश : शरीर का दूसरा भाग प्राणमयकोश है। शरीर और मन के मध्य में प्राण माध्यम है। ज्ञान-कर्म के सम्पादन का समस्त कार्य प्राण से बना प्राणमय कोश ही करता है। श्वासोच्छ्वास के रूप में भीतर-बाहर जाने-आनेवाला प्राण स्थान तथा कार्य के भेद से दस प्रकार का माना जाता है। जैसे-व्यान, उदान, प्राण, समान और अपान मुख्य प्राण हैं तथा धनंजय, नाग, कूर्म, कृंकल और देवदत्त गौण प्राण या उपप्राण हैं। प्राण मात्र का मुख्य कार्य है- आहार का यथावत् परिपाक करना, शरीर में रसों को समभाव से विभक्त तथा वितरित करते हुए देहेन्द्रियों का तर्पण करना, रक्त के साथ मिलकर देह में सर्वत्र घूम-घूमकर मलों का निष्कासन करना, जो कि देह के विभिन्न भागों में रक्त में आ मिलते हैं। देह के द्वारा भोगों का उपभोग करना भी इसका कार्य है। प्राणायाम के नियमित अभ्यास से प्राणमय कोश की कार्यशक्ति बढ़ती है।

3. मनोमय कोश : सूक्ष्म शरीर के इस पहले क्रियाप्रधान भाग को मनोमय कोश कहते हैं। मनोमय कोश के अन्तर्गत मन, बुद्धि, अंहकार और चित्त हैं जिन्हें अन्तः-करणचतुष्टाय कहते हैं। पाँच कार्मेन्द्रियाँ हैं, जिनका सम्बन्ध बाह्य जगत् के व्यवहार से अधिक रहता है।

4. विज्ञानमय कोश : सूक्ष्म शरीर का दूसरा भाग, जो ज्ञानप्रधान है, वह विज्ञानमय कोश कहलाता है। इसके मुख्य तत्त्व ज्ञानायुक्त बुद्धि एवं ज्ञानेन्द्रियाँ हैं।

अष्टांग योग मे यम का महत्व

असली दशानन (रावण) कौन ?
प्रत्येक वर्ष की भांति दशहरे का त्योहार आ गया. सब लोग विशेष रूप से रावण के जलने का इंतजार कर रहे हैं . सभी मर्यादा पुरुषोतम श्री रामचन्द्र जी महाराज को याद करते हैं की किस प्रकार उन्होंने राक्षस रावण का वध कर धरती को पापी से मुक्त किया था. आज उनके उस पवित्र तप की स्मृति में रावण के पुतले का दहन किया जाता हैं ताकि जनमानस को प्रेरणा मिल सके की बुराई पर किस प्रकार अच्छे की जीत होती हैं.
एक प्रश्न मेरे मन में सदा आता हैं की क्या आज भी समाज में रावण फिर से जीवित हो उठा हैं? उत्तर हैं हाँ. रावण न केवल आज फिर से जीवित हो उठा हैं अपितु पहले से भी शक्तिशाली हो उठा हैं. वह रावण कौन हैं और कहाँ रहता हैं?
उत्तर हैं वह रावण हैं हमारी आतंरिक बुराइयाँ जो हमारे भीतर ही हैं और हमें दिन प्रतिदिन धर्म मार्ग से विचलित करती हैं.उसके दस सिर हैं जिन पर यम-नियम रुपी दस तलवारों से विजय प्राप्त करी जा सकती हैं.अब पाठकगण सोच रहे होगे की यह दस तलवारे कौन सी हैं और उनसे किन बुराइयों पर विजय प्राप्त करी जा सकती हैं.
इस आंतरिक रावण से लड़ने की दस तलवारे हैं यम और नियम. यम पांच हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रहमचर्य और अपरिग्रह . नियम भी पांच हैं शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान. यम-नियम के पालन करने से हम अपनी आंतरिक बुराईयों को जो की रावण के दस सिर के समान हैं का सामना कर सकते हैं.
१. अहिंसा
सर्वदा सभी प्राणियों के साथ वैरभाव को छोड़कर प्रीति से वर्तना अहिंसा हैं. सभी प्राणियों में मनुष्य के साथ साथ पशु आदि की भी आते हैं. जहाँ अपनी जिह्वा के स्वाद अथवा उदर की भूख की पूर्ति के लिए निरीह प्राणियों की हत्या करना निश्चित रूप से हिंसा हैं वहीँ विचार मात्र से किसी व्यक्ति विशेष की हानी करने की इच्छा करना भी हिंसा हैं. यदि किसी व्यक्ति को चोरी आदि करने पर उसके सुधार के लिए दंड दिया जाये तो वह कर्म अहिंसा कहलाता हैं, हिंसा नहीं कहलाता हैं क्यूंकि वह कर्म प्राणिमात्र के उद्धार के लिए किया जा रहा हैं.इसी प्रकार किसी आदमखोर जानवर को मारना भी हिंसा नहीं कहलाता क्यूंकि वह जन कल्याण के लिए हैं. आज धर्म के नाम पर विश्व भर में दंगे फसाद, लूट, बलात्कार क़त्ल आदि सुनने को मिलते हैं. हर कोई अपने अपने मजहब, अपने अपने मत,अपनी अपनी विचारधारा,अपने अपने गुरु को श्रेष्ठ और दूसरे को नीचा समझने लगा हैं जिसके कारण चारों तरफ असुरक्षा. अविश्वास और डर का माहोल बन गया हैं.अगर मनुष्य अहिंसा के इस पाठ को समझ जाये तो और सभी के साथ प्रीतिपूर्वक वर्तने लगे तो इस हिंसा रुपी रावण का नाश किया जा सकता हैं.
२. सत्य
जैसा देखा हो, अनुमान से जाना हो और सुना हो, वैसा ही मन और वाणी में होना सत्य हैं अर्थात जो पथार्थ जैसा हैं, उसको वैसा ही जानना, मानना, बोलना और शरीर से उसको आचरण में लाना सत्य हैं. सत्य को परीक्षा पूर्वक जानना और उसका सर्व हितार्थ बोलना और आचरण में लाना सत्य हैं. वस्तु के स्वरुप के विपरीत जानना, मानना, बोलना, आचरण में लाना असत्य हैं. परन्तु हित के नाम से सत्य के स्थान में असत्य का आचरण करना सत्य नहीं हैं.इतिहास इस बात का गवाह हैं की जो भी व्यक्ति सत्य बोलते हैं वे विश्व में श्रेष्ठ कहलाया हैं जबकि जो भी व्यक्ति असत्य के मार्ग पर चलते हैं वे अप्रसिद्धि का पात्र बने हैं.आज मनुष्य मनुष्य पर विश्वास नहीं करता क्यूंकि असत्य वचन के कारण विश्वास के स्थान पर कुटिलता ही कुटिलता दिखती हैं. एक दूसरे से घृणा का कारण भी यहीं असत्य वचन हैं. सत्य बोलने से व्यक्ति न केवल निडर, शक्तिशाली और दृढ बनता हैं अपितु सभी के द्वारा सम्मान का पात्र भी बनता हैं जबकि असत्य वचन करने वाला क्षणिक सफलता और तात्कालिक सुख का भोग तो कर सकता हैं पर कालांतर में भय, आशंका और रोग उसे अपना शिकार बना लेते हैं जिससे उसका नाश हो जाता हैं. इसलिए असत्य रुपी इस रावण का नाश सत्य से किया जा सकता हैं.
३. अस्तेय
मन, वाणी और शरीर से चोरी का परित्याग करके उत्तम कार्यों में तन, मन, धन से सहायता करना अस्तेय हैं. आज देश की सबसे बड़ी समस्या भ्रस्ताचार हैं.बड़े बड़े नेताओं से लेकर दफ्तर के छोटे कर्मचारी तक अपवाद रूप किसी किसी को छोड़कर सब इस पाप से धीरे धीरे ग्रसित हो गए हैं. यह भी एक प्रकार की चोरी ही हैं. किसी दूसरे के धन, संपत्ति आदि की इच्छा रखने से सबसे बड़ी हानि हमारी आंतरिक शांति का समाप्त हो जाना हैं.मनुष्य जीवन अनेक योनियों में जन्म लेने के बाद मिलता हैं और इस अमूल्य जीवन को हम इतनी अशांति में गुजार दे क्यूंकि हम सदा दूसरे के धन की इच्छा रकते रहे अथवा प्रयास करते रहे अथवा चोरी करते रहे, ऐसे करने वाले व्यक्ति को आप अज्ञानी नहीं कहेगे तो फिर क्या कहेगे.इसलिए मन, वचन और शरीर से चोरी का परित्याग करके हम इस रावण का नाश कर सकते हैं.
४. ब्रह्मचर्य
वेदों का पढना , ईश्वर की उपासना करना और वीर्य की रक्षा करना ब्रह्मचर्य कहलाता हैं. जब योगी मन, वचन और शरीर से ब्रह्मचर्य का दृढ पालन बना लेता हैं तब बौधिक और शारीरिक बल की प्राप्ति होती हैं. उससे वह अपनी तथा अन्यों की रक्षा करने में, विद्या प्राप्ति तथा विद्या दान में समर्थ हो जाता हैं. ब्रह्मचर्य के पालन से शारीरिक और बौधिक बल की प्राप्ति होती हैं. शरीर का बल बढ़ने से शरीर निरोग एवं दीर्घ आयु होता हैं और उत्तम स्वास्थ्य को प्राप्त करता हैं. बौद्धिक बल के बढ़ने से वह अति सूक्षम विषयों को जानने में और अन्यों को विद्या पढ़ाने में सफल हो जाता हैं.
अथर्ववेद ११/५/१९ में कहा भी गया हैं की ब्रह्मचर्य के तप से देव मृत्यु को जीत लेते हैं. महाभारत में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं – हे राजन. तू ब्रह्मचर्य के गुण सुन. जो मनुष्य इस संसार में जन्म से लेकर मरण पर्यंत ब्रह्मचर्य होता हैं. उसको कोई शुभ अशुभ अप्राय नहीं रहता ऐसा तू जान की जिसके प्रताप से अनेक करोड़ो ऋषि ब्रह्मलोक अर्थात सर्वानन्द स्वरुप परमात्मा में वास करते और इस लोक में भी अनेक सुखों को प्राप्त होते हैं. जो निरंतर सत्य में रमण, जितेन्द्रिय, शांत आत्मा, उत्कृष्ट, शुभ गुण स्वाभाव युक्त और रोग रहित पराकर्मयुक्त शरीर, ब्रह्मचर्य अर्थात वेदादि सत्य शस्त्र और परमात्मा की उपासना का अभ्यास कर्मादी करते हैं वे सब बुरे काम और दुखों को नष्ट कर सर्वोत्तम धर्मयुक्त कर्म और सब सुखों की प्राप्ति कराने हारे होते और इन्हीं के सेवन से मनुष्य उत्तम अध्यापक और उत्तम विद्यार्थी हो सकते हैं.
ब्रह्मचर्य के विपरीत कर्म व्यभिचार कहलाता हैं. आज समाज में यह रावण विकराल रूप धारण कर समाज में अनैतिकता फैला रहा हैं जिसके दुष्कर परिणामों से सभी परिचित हैं. भोगवाद की व्यभिचार रुपी लहर में बहकर युवक युवती अपना पूरा जीवन बर्बाद कर लेते हैं. आदि कच्ची उम्र में बलात्कार जैसा घृणित पाप कर डालते हैं जिसके कारण पूरा जीवन अंधकारमय हो जाता हैं. मीडिया इस अपराध में सबसे बड़ा जिम्मेदार हैं क्यूंकि अपरिपक्व मानसिक अवस्था में सही या गलत की पहचान कम ही को होती हैं.इस व्यभिचार रुपी रावण के कारण न जाने कितनो का जीवन बर्बाद हो रहा हैं और कितनो का होगा इसलिए ब्रह्मचर्य रुपी उत्तम नियम के पालन से इस रावण का नाश किया जा सकता हैं.
५. अपरिग्रह
विषयों में उपार्जन, रक्षण, क्षय, संग, हिंसा दोष देखकर विषय भोग की दृष्टी से उनका संग्रह न करना अपरिग्रह हैं. अर्थात हानिकारक अनावश्यक वस्तु और अभिमान आदि हानिकारक, अनावश्यक अशुभ विचारों को त्याग देना अपरिग्रह हैं. जो जो वस्तु अथवा विचार ईश्वर प्राप्ति में बाधक हैं उन सबका परित्याग और जो जो वस्तु , विचार ईश्वर प्राप्ति में साधन हैं उनका ग्रहण करना अपरिग्रह हैं. आज के समाज में अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह करने की होड़ सी लगी हुई हैं . हर कोई अपने जीवन के उद्देश्य को भूलकर एक मशीन की भांति संग्रह करने के पीछे भाग रहा हैं, जिससे व्यक्ति मानसिक तनाव, दुःख, भय आदि का शिकार होकर अपने जीवन को साक्षात् नरक बनाये हुए हैं. भोगवाद की लहर में बहकर हम जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूल गए हैं. हमारे चारों ओर इसके अनेक उदहारण मिलेगे कोई काला बाजारी करता हैं ताकि सुख मिले, क्या सुख मिलेगा? कोई धोखे से किसी की संपत्ति पर कब्ज़ा कर रहा हैं, क्या सुख मिलेगा? बिलकुल नहीं. कोई दिन रात एक कर धन इकट्ठा करने में लगा हुआ हैं पर उसे यह नहीं मालूम की एक सीमा के पश्चात यह धन एक एक प्रकार का भोझ ही हैं. हमारे देश के नेता ओर बड़े व्यापारी इसके साक्षात् उदहारण हैं की इतनी धन-संपत्ति को इकठ्ठा करने के बावजूद घोटाले पर घोटाले किये जा रहे हैं. अंत में सब कुछ छोड़कर मृत्यु को ही तो प्राप्त होना हैं. अगर समाज अपरिग्रह के सन्देश को समझ ले तो सभी सुखी हो सकते हैं.अपरिग्रह के इस सन्देश को अगर जनमानस समझ ले तो भटक रहे समाज को अज्ञानता रुपी रावण से मुक्ति मिल जाएगी.
६. शौच
शौच का एक अर्थ शुद्धि भी हैं. शुद्धि दो प्रकार की होती हैं एक बाह्य ओर एक आन्तरिक. जल आदि से, पवित्र भोजन से शरीर की बाह्य शुद्धि होती हैं जबकि चित की मलिनताओं को दूर करने से शरीर की आन्तरिक शुद्धि होती हैं.मनुष्य अपने शरीर की बाह्य शुद्धता पर हर प्रकार से ध्यान देता हैं ताकि वो सुन्दर दीख सके. इस सुन्दरता के कारण वो भ्रमित होकर अपने शरीर पर अभिमान कर बैठता हैं और दुसरे के शरीर को घृणा की दृष्टी से देखता हैं. इस अभिमान से मनुष्य सत्य से दूर चला जाता हैं और अपना बहुत सारा बहुमूल्य समय शरीर को सुन्दर बनाने में लगा देता हैं. सत्संग, स्वाध्याय, ईश्वर उपासना, आत्म निरिक्षण के लिए उसके पास समय ही नहीं रहता. आन्तरिक मलिनता की शुद्धि इन्हीं कर्मों से होती हैं.कोई कोई मनुष्य दुसरे के शरीर की सुन्दरता पर मोहित हो जाता हैं जिससे काम वासना की उत्पत्ति होती हैं. अभिमान और काम वासना दोनों व्यक्ति को आन्तरिक रूप से असुद्ध कर देती हैं.आन्तरिक शुद्धि से बुद्धि की शुद्धि होती हैं जिससे मन में प्रसन्नता और एकाग्रता आती हैं, जिससे इन्द्रियों पर विजय प्राप्त होती हैं, उससे बुद्धि ईश्वर की उपासना में लीन होती हैं जिससे ईश्वरीय सुख की प्राप्ति होती हैं.आज के समाज में मांसाहार से भोजन की अपवित्रता होती हैं जिससे न केवल शरीर अशूद्ध होता हैं अपितु विचारों में भी मलिनता आती हैं. अभिमान और काम वासना से मनुष्य जाति का जितना नाश हुआ हैं उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. समाज में फैल रही अराजकता को मांसाहार, अभिमान, काम वासना रुपी रावण से मुक्ति तभी मिल सकती हैं जब शौच (शुद्धि) के मार्ग पर चला जाये.
७. संतोष
संपूर्ण प्रयास के पश्चात जो भी उपलब्ध हो, उसी में संतुष्ट रहना, उससे अधिक की इच्छा न करना संतोष हैं. जो व्यक्ति अपने पूर्ण पुरुषार्थ के पश्चात अपने उपलब्ध साधनों से अधिक पदार्थों की इच्छा नहीं करता तो उसको अनुपम सुख की प्राप्ति होती हैं. जब व्यक्ति इन्द्रियों के भोगों में आसक्त रहता हैं तो उसकी विषय भोग की तृष्णा बढती जाती हैं और वो उस तृष्णा की पूर्ती के लिए प्रयासशील रहता हैं. प्रयास में परिणाम पाने के लिए या तो वह अपराध कर बैठता हैं अथवा विफल होने पर दुखों का भोगी बनता हैं.इसलिए संतोष का पालन करने चाहोये जिससे सात्विक सुख की प्राप्ति होती हैं नाकि क्षणिक सुखों की प्राप्ति होती हैं. संतोष का पालन करने से व्यवहार में भी सुख की प्राप्ति होती हैं और दुखों की निवृति होती हैं. जब कोई हानिकारक घटना घट जाती हैं तो संतोषी व्यक्ति को नयून दुःख होता हैं इसलिए संतोष जीवन में सुख प्राप्ति का उपयोगी मार्ग हैं. आज समाज में हर कोई दुखी हैं उसका एक कारण संतोष का नहीं होना हैं इसलिए असंतोष रुपी रावण को त्याग कर संतोष का पालन करने से अनुपम सुख की प्राप्ति करी जाये.
८. तप
धर्म आचरण करते हुए हानि लाभ, सुख दुःख, मान अपमान , सर्दी गर्मी, भूख प्यास आदि को शांत चित से सहन करना तप हैं. जिन जिन उत्तम कार्यों के करने में स्वयं का और अन्यों का दुःख दूर होता हैं और सुख की प्राप्ति होती हैं उनको करते रहना और न छोड़ना धर्म आचरण हैं . धर्म आचरण करने में जो जो दुःख व्यक्ति को सहना पड़ता हैं उसको तप कहते हैं. आज समाज में अराजकता का एक कारण सज्जन व्यक्तियों द्वारा तप न करना हैं और दुर्जन व्यक्तियों द्वारा करे जा रहे दुष्ट कार्यों को न रोकना हैं.श्री राम सतयुग के विशेष उदहारण हैं जिन्होंने अपने तप से राक्षस रावण को समाप्त किया.उनसे प्रेरणा पाकर आज हमे भी समाज में फैल रही बुराइयों को समाप्त करने के लिए तप करना चाहिए जिससे अधर्म रुपी रावण का नाश किया जा सके.
९ . स्वाध्याय
वेद आदि धर्म शास्त्रों को पढ़कर ईश्वर के स्वरुप को जानना और ईश्वर का चिंतन मनन करना, अपने दैनिक कार्यों का मानसिक अवलोकन कर अपनी गलतियों को पहचानना और उनको भविष्य में दोबारा न करने की प्रतिज्ञा करना स्वाध्याय कहलाता हैं. धर्म शास्त्रों के अध्ययन से और उनका पालन करने से व्यक्ति के आचरण में इतनी योग्यता आ जाती हैं की वह अन्यों को भी धर्म मार्ग पर चला सकता हैं.समाज में सदा श्रेष्ठ मनुष्यों की कीर्ति हुई हैं. सर्व प्रथम व्यक्ति को अपना ही स्वाध्याय करना चाहिए की उसमे क्या क्या बुराइयाँ समाहित हैं फिर उन पर विजय प्राप्त करनी चाहिए. इस कार्य में ईश्वर ही केवल सहाय हैं और उन ईश्वर को जानने के लिए वेदादि धर्म शास्त्रों का स्वाध्याय करना चाहिए.आज समाज में हर व्यक्ति अपने आपको सबसे सही और दुसरे को सबसे गलत मान रहा हैं. इसका कारण हैं वह अपने आपको न जानना. अगर व्यक्ति अपनी वास्तविकता को समझे और धर्म ग्रंथों का स्वाध्याय कर उसी अनुसार वर्ते तो वह किसी को कष्ट नहीं देगा. ऐसा व्यक्ति न केवल बुद्धिमान कहलायगा अपितु समाज का मार्ग दर्शन भी करेगा. स्वाध्यायशील ज्ञानी व्यक्ति ही समाज का नेतृत्व कर सकते हैं. आज समाज का नेतृत्व अज्ञानी भोगी व्यक्ति कर रहे हैं जिसके कारण समाज गर्त में जा रहा हैं.अपने आपको स्वाध्यायशील और ईश्वर प्रेमी बनाकर समाज का नेतृत्व योग्य व्यक्ति द्वारा होने से समाज में अज्ञान रुपी रावण का नाश होगा.
१०. ईश्वर प्रणिधान
समस्त विद्याओं को देने वाले परम गुरु ईश्वर में समस्त कर्मों को समर्पित कर देना, उसकी भक्ति करना, व्यवहार में उसके आदेशों का पालन करना, शरीर आदि पदार्थों को उसके मानकर धर्माचरण करना, कर्मों का लौकिक फल न चाहना, ईश्वर को ही लक्ष्य बनाकर कार्यों को करना ईश्वर प्रणिधान हैं. कोई भी मनुष्य गलत कार्य तभी करता हैं जब वह ईश्वर को सर्वथा भूल जाता हैं. अगर मनुष्य किसी भी कार्य को करने से पहले ईश्वर के अनुकूल अथवा प्रतिकूल की परीक्षा करे तो वह पाप कार्य से अपने आपको बचा सकता हैं. समाज में पाप कर्म को रोकने यह सबसे कारगर तरीका हैं. इससे न केवल पाप आचरण कम होगा अपितु सात्विक वातावरण का माहौल भी बनेगा.पाप रुपी रावण का नाश करने का यह सबसे कारगर तरीका हैं.
आशा हैं की यम नियम की अहिंसा, सत्य, अस्तेय , ब्रहमचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष,तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान रुपी तलवारों से हिंसा, असत्य, चोरी, व्यभिचार, भ्रष्ट आचार, अशुद्धि, असंतोष,अकर्मयता, अज्ञान और पाप आचरण रुपी रावण के दस सिरों का नाश होगा. अपने जीवन को योगी लोग इन्हीं सीढियों पर चलकर श्रेष्ठ बनाते हैं और अपने भीतर छिपे हुए आन्तरिक रावण का नाश करते हैं. आशा हैं की जिज्ञासु भी योग मार्ग का अनुसरण कर अपने जीवन को यथार्थ करेगे.