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रविवार, 18 मई 2014

वैदिक-एकेश्वरवाद-अर्थात-ईश्वर-एक-हैं

वैदिक-एकेश्वरवाद-अर्थात-ईश्वर-एक-हैं

By Veda Mandan Pakhand Khandan on Wednesday, May 7, 2014 at 1:53pm
वैदिक-एकेश्वरवाद-अर्थात-ईश्वर-एक-हैंहमारा महान आर्यव्रत देश सृष्टी के प्रारंभ से लेकर महाभारत युद्ध के कुछ काल पश्चात तक विश्व गुरु के रूप में संसार का मार्ग दर्शन करता रहा.कालांतर में वेद विद्या का लोप होने से, धर्म के नाम पर अनेक मत मतान्तरों का प्रचलन होने से, धार्मिक क्रम कांडों के नाम पर यज्ञों में पशु बलि, मांस, मदिरा, मैथुन से ईश्वर प्राप्ति होने के पाखंड के प्रचलित होने से ,वेदों में वर्णित सच्चिदानंदस्वरुप, सर्वव्यापक, सर्वत्र, सर्वशक्तिमान, निराकार, निर्विकार, अजन्मा, अविनाशी, न्यायकारी, दयालु,जगत के कर्ता-धर्ता एक ईश्वर का स्थान अज्ञानी, अनेक अवतार धारण कर जन्म लेने वाले एवं मृत्यु को प्राप्त होने वाले,साकार, एकदेशीय आदि अवगुणों वाले अनेक ईश्वरों (बहुदेवतावाद) ने ले लिया. आर्याव्रत देश की सबसे बड़ी शक्ति उसकी अध्यात्मिक उन्नति थी जिससे वो संसार भर को अपने विज्ञान से प्रकाशित करता आ रहा था. इस पतन के कारण न केवल उसके ज्ञान का नाश हुआ अपितु अनेक मत मतान्तरों के प्रचलित होने से उसकी एकता और अखंडता नष्ट हो गयी जिससे वह विदेशी हमलावरों के सामने प्रतिकार न कर सका और अपनी स्वतंत्रता खोकर सदियों के लिए गुलाम बन गया.वेदों के अप्रतिम विद्वान,सत्य के महान अन्वेषक, वेदों के भाष्यकार, संसार में वैदिक धर्म को पुनर्जीवित करने वाले ऋषिवर दयानंद सरस्वती ने वेदों के विषय में वर्णित सभी भ्रांतियों में से वेदों में वर्णित ईश्वर के सत्य स्वरुप को सिद्ध करने में विशष श्रम किया.उन्ही से प्रेरणा पाकर इस लेख में वेदों में वर्णित एकेश्वरवाद अर्थात “ईश्वर एक हैं” का प्रतिपादन करेंगे.वेदों में वर्णित ईश्वर के विषय में प्रमुख भ्रान्ति इस प्रकार हैं की ईश्वर एक नहीं अनेक हैं, वेदों में अनेक देवताओं जैसे इन्द्र, अग्नि, वायु आदि का वर्णन हैं.वेदों में एकेश्वरवाद अर्थात एक ईश्वर होने के प्रमाणऋग्वेद ६/५१/१६- हे मनुष्य ! जो एक ही सब मनुष्यों का ठीक ठीक देखने वाला सर्वज्ञ सुखों की वर्षा करने वाले कर्म व ज्ञान वाला सर्वशक्तिमान सबका स्वामी हैं, तू सदा उसी की स्तुति कर.ऋग्वेद ८/१/१- हे मित्रों तुम किसी अन्य की विशेष स्तुति अर्थात प्रार्थना उपासना न करो और इस प्रकार अन्यों की स्तुति करके मत दुःख उठाओं. सदा एकांत में और मिलकर किये हुए यज्ञों में सुख, शांति और आनंद की वर्षं करने वाले एक परमेश्वर की ही स्तुति करो और बार बार उसी के स्तुति वचनों का उच्चारण करो.ऋग्वेद १/१६४/४६ में एक ईश्वर होने का महान सन्देश “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” हैं. विद्वान ज्ञानी लोग एक ही सत्यस्वरूप परमेश्वर को विविध गुणों को प्रकट करने के लिए इन्द्र, मित्र,वरुण आदि अनेक नामों से पुकारते हैं. परम ऐश्वर्य संपन्न होने से परमेश्वर को इन्द्र, सबका स्नेही होने से मित्र, सर्वश्रेष्ठ और अज्ञान व अन्धकार निवारक होने से वरुण, ज्ञान स्वरुप और सबका अग्रणी नेता होने से अग्नि, सबका नियामक होने से यम, आकाश,जीवादी में अन्तर्यामिन रूप में व्यापक होने से मातरिश्वा आदि नामों से उस एक की ही स्तुति करते हैं.सामवेद मंत्र २५९ में सायण आचार्य इस कथन की पुष्टि करते हैं.Maxmuller writes in the six systems of philosophy that whatever is the age when the collection of our rigveda samhita was finished, it was before that age, that the conception had been formed that there is but one, one being neither male nor female, a being raised high above all the conditions and limitations of personality and of human nature and nevertheless the being that was really meant by all such names as Indra, Agni,Matrishwan and by the name of Prajapati- Lord of Creatures.प्रो. मक्समूलर तथा यूरोप के कई अन्य विद्वान इस प्रकार के स्पष्ट एकेश्वरवाद प्रतिपादक वेदमंत्रों को ईसाइयत अथवा विकासवाद के पक्षपात के कारण पीछे की रचना बताने का प्रयत्न करते हैं. इस पक्षपात का स्पष्ट प्रमाण प्रो.मक्समूलर द्वारा लिखित History of Ancient Sanskrit Literature में इस प्रकार मिलता हैंI add only one more hymn (Rig 10,121) in which the idea of one god is expressed with such power and decision that it will make us hesitate before we deny to the Aryans an instinctive monotheism.In Vedic Hymns page 3 maxmuller writes about same hymn as “This is one of the Hymns which has always been suspected as modern by European interpreters.”ऋग्वेद के १०/१२१/१० प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्व जातानि परि ता बभूव मन्त्र के विषय में मक्स मूलर लिखते हैं की this last verse is to my mind the most suspicious of all अर्थात यह अंतिम मंत्र जिसमें परमेश्वर को संबोधन करते हुए कहा गया हैं की तुम्हें छोड़कर अन्य कोई भी इस सारे जगत में व्यापक और इसका स्वामी नहीं हैं, मेरी सम्मति में सबसे अधिक संदेहास्पद हैं.वेदों में जिन मन्त्रों में एकेश्वरवाद का स्पष्ट उपदेश हैं उन्हें मानने में पाश्चात्य विद्वानों द्वारा संकोच करना ईसाई पक्षपात और विकासवाद के मिथक सिद्धांत का पोषक हैं.ऋग्वेद ६/२२/१- जो परमेश्वर सब मनुष्यों का एक ही पूजनीय हैं, उसकी इन वाणियों से चारों ओर से प्रेमपूर्वक पूजा कर.ऋग्वेद १०/७२ सूक्त के मंत्र २,३,६ में तीन बार ईश्वर के लिए एक शब्द का प्रयोग हुआ हैं. वेदों में एकेश्वरवाद सिद्ध न हो शायद इसीलिए ऋग्वेद के दसवें मंडल को नवीन सिद्ध करने का प्रयास पाश्चात्य विद्वानोंद्वारा किया गया जो संदेहास्पद हैं.ऋग्वेद १०/७२/२- वह जगतकर्ता परमेश्वर विविध मनों का स्वामी, आकाश के तुल्य व्यापक, संसार का धारण करने वाला, विशेष रूप से सूर्य चन्द्र तथा लोक लोकान्तरों का धारण ओर पोषण करने वाला, अत्यंत उत्कृष्ट ओर सर्वज्ञ हैं, जिस परमेश्वर के विषय में विद्वान् कहते हैं की वह सात इन्द्रियों से परे एक ही हैं और जिस परमेश्वर के आश्रय में उन इन्द्रियादी के अभिलाषित सब भोग्य पदार्थ उस प्रभु की प्रेरक शक्ति से भली प्रकार हर्ष के कारण बनते हैं.ऋग्वेद १०/७२/३ -जो परमेश्वर हमारा पालक हैं, उत्पादक हैं और जो विशेष रूप से हमारा धारण करने वाला और सब स्थानों लोकों और उत्पन्न पदार्थों को जानता हैं, जो सब देवों- इन्द्र , मित्र, वरुण, अग्नि, यम इत्यादि से नाम को प्रधानतया धारण करने वाला एक ही देव हैं उस अच्छी प्रकार से जानने योग्य परमेश्वर की ओर ही अन्य सब लोक ओर प्राणी गति कर रहे हैं.ऋग्वेद १०/७२/६ -प्रकृति ओर उसके परमाणुओं को सबसे पूर्व धारण करने वाला वही एक परमेश्वर हैं , इस अज-प्रकृति, सत्व या प्रधान की नाभि में एक ब्रहम तत्व ही ऊपर अधिष्ठाता रूप में विराजमान हैं, जिसके आधार पर सब लोक स्थित हैं, जो सारे जगत का संचालक ओर अध्यक्ष हैं.ऋग्वेद के १० वें मंडल के अतिरिक्त भी अन्य मंडलों में एकेश्वरवाद के अनेक प्रमाण हैं जैसेऋग्वेद ८/२५/१६ – यह प्रजाओं का स्वामी एक ही हैं, वह एक ही संसार का स्वामी सब प्रजाओं का ठीक ठीक निरिक्षण करता हैं. सब कुछ जानता हैं.ऋग्वेद ८/१/२७ – जो परमेश्वर एक, अत्यंत आश्चर्यजनक, महान और अपने व्रतों के कारण अति तेजस्वी और दुष्टों के लिए भयंकर हैं उसी का ध्यान सबको करना चाहिए.ऋग्वेद १/१००/७ – परमेश्वर को सब करुणापूर्ण शुभ कर्मों का एकमात्र स्वामी बताया गया हैं.ऋग्वेद १/५४/१४- जिस परमेश्वर के आकाश और पृथ्वी, समुद्र और अन्य लोक-लोकान्तर अंत नहीं पा सकते वह सब में ओत-प्रोत हैं, ऐसा वह परमेश्वर एक ही हैं.सामवेद ३७२ और अथर्ववेद ७/२१/१ – हे मनुष्यों! तुम सब सरल भाव और आत्मिक बल के साथ परमेश्वर की ओर उसका ध्यान- भजन के लिए आओ, जो एक ही मनुष्यों में अतिथि की तरह पूजनीय अथवा सर्वव्यापक हैं. वह सनातन- नित्य हैं और नए उत्पन्न पदार्थों के अन्दर भी व्याप रहा हैं. ज्ञान-कर्म-भक्ति के सब मार्ग उसकी और जाते हैं. वह निश्चय से एक ही हैं.ऋग्वेद २/१/३ और २/१/४ में परमात्मा को अग्नि के नाम से संबोधित करते हुए कहा गया हैं की तू ही इन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा और ब्रह्मणस्पति हैं, तू ही वरुण, मित्र, अर्यमा आदि नामों से पुकारा जाता हैं अर्थात परम ऐश्वर्य संपन्न होने से वही परमेश्वर इन्द्र, सर्वव्यापक होने से विष्णु, सबसे बड़ा होने से ब्रह्मा, ज्ञान स्वामी होने से वरुण, सबका स्नेही होने से मित्र और न्यायकारी होने से अर्यमा के नाम से याद किया जाता हैं.अथर्ववेद १३/४/५ – वही परमात्मा अर्यमा, वरुण, इन्द्र, महादेव, अग्नि,सूर्य, महायम इत्यादि नामों से पुकारा जाता हैं. वह एक परमात्मा ही नमस्कार करने योग्य हैं.इस प्रकार अनेक वैदिक मन्त्रों के प्रमाणों से यह सिद्ध होता हैं की वेदों में एक ही ईश्वर का वर्णन हैं जो उपासना करने योग्य हैं.

वेद क्या हैं

वेद क्या हैं


Original post in English is available at http://agniveer.com/what-are-vedas/
वास्तव में वेद किसे माना जाए, इस पर कई तरह के मत हैं. यहां हम इस भ्रम को दूर करने का प्रयास करेंगे. वैदिक साहित्य में सम्मिलित होने वाली पुस्तकें:
१. वेद मंत्र संहिताएँ – ऋग्, यजुः, साम, अथर्व.
२. प्रत्येक मंत्र संहिता के ब्राह्मण.
३. आरण्यक.
४. उपनिषद (असल में वेद, ब्राह्मण और आरण्यक का ही भाग).
५. उपवेद (प्रत्येक मंत्र संहिता का एक उपवेद).
वास्तव में केवल मंत्र संहिताएँ ही वेद हैं. अन्य दूसरी पुस्तकें जैसे ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, ६ दर्शन, गीता इत्यादि ऋषियों द्वारा लिखी गई हैं. यह सब मनुष्यों की रचनाएँ हैं, परमात्मा की नहीं. अत: जहां तक यह सब वेद के अनुकूल हो, वहीं तक समझना और अपनाना चाहिए.
प्रश्न. कात्यायन ऋषि के अनुसार तो ब्राह्मण भी ईश्वरीय हैं तब आप ब्राह्मणों को वेदों का भाग क्यों नहीं मानते?
उत्तर.  १. ब्राहमण ग्रंथों को इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा और नाराशंसी भी कहते हैं. इन में ऋषियों ने वेद मन्त्रों की व्याख्याएँ की हैं. इसलिए ये ऋषियों की रचनाएँ हैं ईश्वर की नहीं.
२.शुक्ल यजुर्वेद के कात्यायन प्रतिज्ञा परिशिष्ट को छोड़कर (कई विद्वान कात्यायन को इस का लेखक नहीं मानते) अन्य कोई भी ग्रन्थ ब्राह्मणों को वेदों का भाग नहीं कहता.
३. इसी तरह, कृष्ण यजुर्वेद के श्रौत सूत्र भी मन्त्र और ब्राहमण को एक बताते हैं. किन्तु कृष्ण यजुर्वेद में ही मन्त्र और ब्राहमण सम्मिलित हैं. अत: यह विचार केवल उसी ग्रन्थ के लिए संगत हो सकता है. जैसे ‘ धातु’ शब्द का अर्थ पाणिनि व्याकरण में – ‘ मूल’ , पदार्थ विज्ञान में ‘धातु’ (metal) और आयुर्वेद में जो शरीर को धारण करे या बनाये रखे – रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य और ओज होता है. ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद और सामवेद की किसी शाखा में ब्राह्मणों के वेद होने का प्रमाण नहीं मिलता.
४. वेद ईश्वर का शाश्वत ज्ञान हैं. उन में कोई इतिहास नहीं है. पर ब्राहमण ग्रंथों में ऐतिहासिक व्यक्तियों का वर्णन और इतिहास मिलता है.
५. वैदिक साहित्य के सभी प्रमुख ग्रन्थ ऋग्वेद, यजुर्वेद,सामवेद और अथर्ववेद की मन्त्र संहिताओं को ही वेद मानते हैं.
वेद :
ऋग १०.९०.३, यजु ३१.७, अथर्व १९.६.१३, अथर्व १०.७.२०, यजु ३५.५, अथर्व १.१०.२३, ऋग ४.५८.३,यजु १७.९ १( निरुक्त के अनुसार १३.६ ), अथर्व १५.६.९ ,अथर्व १५.६.८, अथर्व ११.७.२४
उपनिषद् :
बृहदारण्यक उपनिषद २.४.१०, १.२.५, छान्दोग्य उपनिषद् ७.१.२, मुण्डक १.१.५, नृसिंहपूर्वतपाणि, छान्दोग्य ७.७.१, तैत्तरीय १.१, तैत्तरीय २.३

ब्राह्मण:
शतपथ ब्राह्मण ११.५.८, गोपथ पूर्व २.१६, गोपथ १.१.२९

महाभारत:
द्रोणपर्व ५१.२२, शांतिपर्व २३५.१, वनपर्व १८७.१४, २१५.२२, सभापर्व ११.३१

स्मृति:
मनुस्मृति : १.२३
पुराण :
पद्मा ५.२.५०, हरिवंश, विष्णु पुराण १.२२.८२, ५.१.३६, ब्रह्मवैवर्त १४.६४
अन्य:
महाभाष्य पाश पाशणिक,कथक संहिता ४०.७,अथर्ववेद सायन भाष्य १९.९.१२,बृहदारण्यवार्तिकसार (२.४) सायन,सर्वानुक्रमणिभूमिका,रामायण ३.२८

इत्यादि.शंकराचार्य ने भी चारों मन्त्र संहिताओं को ही वेद माना है – “चतुर्विध मंत्रजातं  ” (शंकराचार्य बृहदारण्यक भाष्य २ .४ .१ ० )
६. ब्राह्मण ग्रन्थ स्वयं भी वेद होने की घोषणा नहीं करते .
७. शतपथ ब्राह्मण के अनुसार वेदों में कुल ८.६४ लाख शब्द हैं.यदि ब्राह्मणों को भी शामिल किया जाता, तो यह संख्या कहीं अधिक होती.
८. केवल मन्त्र ही जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वज, दंड, रथ और घन पाठ की विधियों से सुरक्षित किए गए हैं. ब्राह्मण ग्रंथों की सुरक्षा का ऐसा कोई उपाय नहीं है.
९. केवल मन्त्रों के लिए ही स्वर भेद और मात्राओं का उपयोग किया जाता है. ब्राह्मणों के लिए नहीं.
१०. प्रत्येक मन्त्र का अपना विशिष्ट ऋषि, देवता, छंद और स्वर है. ब्राह्मण ग्रंथों में ऐसा नहीं है.
११. यजु: प्रतिशाख्य में कहा गया है कि मन्त्रों से पूर्व ‘ओम’ और ब्राह्मण श्लोकों से पूर्व ‘अथ’ बोला जाना चाहिए. इसी तरह की बात ऐतरेय ब्राह्मण में भी कही गयी है.
१२. ब्राह्मणों में स्वयं उनके लेखकों की जानकारी मिलती है. और मन्त्रों की व्याख्या करते हुए कई स्थानों पर कहा है “नत्र  तिरोहितमिवस्ति” - हमने सरल भागों को छोड़ कर केवल कठिन भागों की ही व्याख्या की है.
What-are-Vedas
प्रश्न. पुराणों को ब्राह्मण कैसे कहा जा सकता है जब कि पुराणों का अर्थ को वेद व्यास के बनाये १८ पुराणों से है?
उत्तर. यह एक बहुत ही गलत धारणा है. पुराण का अर्थ पुरातन या पुराना है और यह नए पुराण तो बहुत आधुनिक समय में लिखे गए हैं.
तैत्तरीय आरण्यक २.९ और आश्वलायन गृह्यसूत्र ३.३.१ में स्पष्ट वर्णित है कि ब्राह्मण ही कल्प, गाथा, पुराण, इतिहास या नाराशंसी कहे जाते हैं. आचार्य शंकर भी बृहदारण्यक उपनिषद २.४.१० के भाष्य में यही कहते हैं.
तैत्तरीय आरण्यक ८.२१ की व्याख्या में सायण का भी यही मत है. काफ़ी प्राचीन माने जाने वाले शतपथ ब्राह्मण(३.४.३.१३) अश्वमेध यज्ञ के ९ वें दिन पुराणों को सुनने का विधान करते हैं. अब यदि पुराणों से मतलब नए ब्रह्मवैवर्त आदि पुराणों से है, तो श्री राम और श्री कृष्ण आदि ने अश्वमेध यज्ञ के ९ वें दिन किस का श्रवण किया था? वेद व्यास के जन्म के बहुत पहले ही ब्राह्मण ग्रंथ मौजूद थे. इन नए पुराणों को झूठे ही वेद व्यास पर थोपा गया है. ब्रह्मवैवर्त पुराण को पढने के बाद तो उसे योग दर्शन पर भाष्य करने वाले ऋषि की रचना मानना संभव ही नहीं है.
प्रश्न. वेदों में इतिहास भी है – जैसे यजुर्वेद ३.६२ में जमदग्नि और कश्यप ऋषियों के नाम मिलते हैं. कई वैदिक मंत्रों में ऐतिहासिक व्यक्तियों का भी उल्लेख है.
उत्तर. इन से भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है. वेदों में आए जमदग्नि और कश्यप शब्द ऐतिहासिक पुरुष नहीं हैं. शतपथ के अनुसार जमदग्नि का अर्थ आंखें तथा कश्यप शब्द का अर्थ प्राण या जीवनीय शक्ति है.और वेदों में यही अर्थ प्रयुक्त हुआ है.
इसी तरह, वेदों में आए हुए सभी नाम गुणवाचक हैं. बाद में मनुष्यों ने इन शब्दों को नाम के रूप में अपना लिया. जैसे, महाभारत में आए हुए लाल और कृष्ण – आडवाणी नहीं हो सकते और शंकराचार्य द्वारा वर्णित ‘माया’  का मतलब आज की मायावती से नहीं है. ऐसा ही वेदों में आये शब्दों के साथ भी है.
प्रश्न. वेदों की शाखाएं क्या हैं? वेदों की ११३१ शाखाएं बतलाई जाती हैं, जो बहुत सी लुप्त हो गई हैं, तब यह कैसे माना जाए कि वेद मूल स्वरुप में ही हैं?
उत्तर. वेदों की शाखाओं का तात्पर्य मूल वेद संहिताओं से नहीं है. वेदों को समझने, उनके अध्ययन आदि तथा वेदों की व्याख्या करने के लिए शाखाएं बनाई गई हैं. समय – समय पर प्रचलित प्रणालियों के अनुसार मन्त्रों के अर्थ सरल करने के लिये शाखाएं मूल मन्त्रों में परिवर्तन करती रहती हैं. किसी यज्ञ विशेष के लिए या अन्य किन्ही कारणों से कई शाखाएं मूल मंत्रों के क्रम को आगे- पीछे भी करती हैं. इसी तरह कुछ शाखाओं में मंत्र तथा ब्राह्मण ग्रंथों का भाग मिला दिया गया है.
मूल चारों वेद संहिताएँ  – अपौरुषेय हैं. वेदों की शाखाएं तथा ब्राह्मण ग्रंथ मनुष्य कृत हैं. उन्हें वहीं तक विश्वासयोग्य माना जा सकता है जहां तक वे वेदों के अनुकूल हैं. मूल मंत्र संहिताओं का परम्परा से जतन किया गया है और विद्वानों ने भी भाष्य उन पर ही किया है.
प्रश्न. अन्य ग्रंथ  - उपनिषद, उपवेद,गीता इत्यादि क्या ईश्वरीय नहीं हैं?
उत्तर. इस का उत्तर बहुत कुछ पहले भी दिया जा चुका है. यह सब हमारे महान पूर्वजों – ऋषियों द्वारा निर्मित महान ग्रंथ हैं पर यह भी ईश्वरीय रचना वेदों की बराबरी नहीं कर सकते.
यदि इन ग्रंथों की रचना ईश्वरीय होती तो यह वेदों की ही तरह अद्वितीय रक्षा पद्धति से युक्त होते. पर वेदों के अलावा अन्य किसी भी ग्रंथ में यह लक्षण नहीं दिखता.
अत: इन ग्रंथों में भी जो बातें वेदों के विपरीत हैं उन्हें मान्य नहीं किया जा सकता क्योंकि ईश्वरीय ज्ञान सर्वोपरि है. यह बात विश्व की सभी पुस्तकों पर लागू होती है. हमारी संस्कृति के सभी ग्रंथ वेदों को ही सत्य का अंतिम प्रमाण मानते हैं.
प्रश्न.  वेदों में तो केवल कर्म कांड और ईश्वर पूजा का ही विधान है. क्या दर्शन तथा अन्य व्यवहारिक ज्ञान के लिए हमें दूसरे ग्रंथों की आवश्यकता नहीं है ?
उत्तर. ये झूठी बातें वेदों को न पढने वाले लोगों ने फ़ैला रखी हैं. हमारी संस्कृति के सभी महान ग्रंथकार अपनी रचना को वेदों पर आधारित ही बताते हैं. वे वेदों को ही सब सत्य विद्या का मूल मानते हैं.
उपनिषद ,गीता जैसे सभी दार्शनिक ग्रंथों का उद्गम भी वेद ही हैं. यह सभी ग्रंथ वेद और सत्य को समझने के लिए ही बनाये गए और इन ग्रंथों में ऐसी कोई बात नहीं है जो वेदों में पहले से ही मौजूद नहीं हो. जैसे कि हम पहले चर्चा कर चुके हैं – वेद परम प्रमाण हैं और अन्य ग्रंथ तो उस तक पहुंचने की सीढियां मात्र हैं – इसलिए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि कहीं कोई सीढ़ी हमें वेदों से दूर तो नहीं ले जा रही.
वेद एकमात्र सर्वत्र व्यापक ईश्वर का ही बखान करते हैं और शाश्वत ज्ञान की निधि होने से उन में कहीं कोई कर्म कांड नहीं है. अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए ही पथभ्रष्ट लोगों ने वेदों के विषय में गलत धारणाएं फैलाईं हैं.यह हमारा परम कर्तव्य है कि हम इन सभी पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर – वेद और उसके सत्य उद्देश्य का प्रचार करें.
सत्यमेव जयते!
अनुवादक- आर्यबाला