रविवार, 20 जुलाई 2014

पंचकोश

पंचकोश

देह में स्थति पंचकोष 

मनुष्य की आत्मा पाँच कोशों के साथ संयुक्त है, जिन्हें पंचशरीर भी कहते हैं। ये पाँच कोश निम्नांकित हैं : 

1. अन्नमय कोश : यह पांचभौतिक स्थूल शरीर का पहला भाग है। अन्नमय कोश त्वाचा से अस्थिपर्यन्त पृथ्वी-तत्त्व से सम्बन्धित है। आहार-विहार की सुचिता, आसन-सिद्ध और प्राणायाम करने से अन्नमय कोश की शुद्धि होती है। 

2. प्राणमय कोश : शरीर का दूसरा भाग प्राणमयकोश है। शरीर और मन के मध्य में प्राण माध्यम है। ज्ञान-कर्म के सम्पादन का समस्त कार्य प्राण से बना प्राणमय कोश ही करता है। श्वासोच्छ्वास के रूप में भीतर-बाहर जाने-आनेवाला प्राण स्थान तथा कार्य के भेद से दस प्रकार का माना जाता है। जैसे-व्यान, उदान, प्राण, समान और अपान मुख्य प्राण हैं तथा धनंजय, नाग, कूर्म, कृंकल और देवदत्त गौण प्राण या उपप्राण हैं। प्राण मात्र का मुख्य कार्य है- आहार का यथावत् परिपाक करना, शरीर में रसों को समभाव से विभक्त तथा वितरित करते हुए देहेन्द्रियों का तर्पण करना, रक्त के साथ मिलकर देह में सर्वत्र घूम-घूमकर मलों का निष्कासन करना, जो कि देह के विभिन्न भागों में रक्त में आ मिलते हैं। देह के द्वारा भोगों का उपभोग करना भी इसका कार्य है। प्राणायाम के नियमित अभ्यास से प्राणमय कोश की कार्यशक्ति बढ़ती है।

3. मनोमय कोश : सूक्ष्म शरीर के इस पहले क्रियाप्रधान भाग को मनोमय कोश कहते हैं। मनोमय कोश के अन्तर्गत मन, बुद्धि, अंहकार और चित्त हैं जिन्हें अन्तः-करणचतुष्टाय कहते हैं। पाँच कार्मेन्द्रियाँ हैं, जिनका सम्बन्ध बाह्य जगत् के व्यवहार से अधिक रहता है। 

4. विज्ञानमय कोश : सूक्ष्म शरीर का दूसरा भाग, जो ज्ञानप्रधान है, वह विज्ञानमय कोश कहलाता है। इसके मुख्य तत्त्व ज्ञानायुक्त बुद्धि एवं ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। 

शनिवार, 7 जून 2014

उपनिषदों का महत्व

उपनिषदों का महत्व
मनुष्य सांसारिक दुःखों से सन्तप्त होकर सृष्टि के आदिकाल से

परमशान्ति तथा शाश्वत सुख की खोज करता रहा है । सांसारिक भोगों

के सुख क्षणिक तथा नश्वर होते हैं । उनमें शाश्वत-सुखों की आशा

करना मरु-मरीचिकाओं में जल समझने के समान ही है । सांसारिक

भोगों को भोगते-भोगते मानव समस्त जीवन बिता देता है । किन्तु परम

सुख प्राप्त नहीं होता । महाराज भर्तृहरि ने ठीक ही कहा है कि

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः ।। (भर्तृहरि॰ )

अर्थात् भोग भोगे नहीं जा सकते । हमें ही भोग खा जाते हैं ।

अर्थात् जीवन समाप्त हो जाता है कि भोग-कामनाओं की तृप्ति नहीं

होती । मनु जी के शब्दों में भोगों को भोगने से

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।

हविषा कृष्णवत्र्मेव भूय एवाभिवर्धते ।। (मनु॰ )

कभी भी वासनाओं की शान्ति नहीं होती । प्रत्युत कामनाओं की

वैसी ही वृद्धि होती है । जैसे घृतादि से अग्नि प्रचण्ड हो जाती है ।

धन-धान्यादि से सम्पन्न देश इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि उन देशों

में भौतिक सुखों की न्यूनता न होते हुए भी सुख व शान्ति कहा! ?

उपनिषत्कार ने ठीक ही कहा है कि

न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः । (कठोप॰२.२७ )

अर्थात् मनुष्य सांसारिक धनों या पदाथो से कभी तृप्त नहीं हो

सकता । समस्त वैदिक दर्शनों का भी यही लक्ष्य रहा है कि शाश्वत-सुख

(मोक्ष) कैसे उपलब्ध हो सके । संसार की प्राचीनतम पुस्तक र्इश्वरीय

ज्ञान वेदों में मोक्ष-प्राप्ति या परम सुख का उपाय शुद्धान्तः करण करके

धर्मानुष्ठान करते हुए परब्रह्म का जानना ही है । वेद में कहा है

तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेsयनाय ।

(यजु॰३१.१८ )

यस्य छायाsमृतं यस्य मृत्युः । (यजु॰२५.१३ )

अर्थात् परब्रह्म को जानकर ही मृत्यु दुःखों से पार होकर मोक्ष को

प्राप्त किया जा सकता है । इससे भिन्न और कोर्इ उपाय नहीं है । क्योंकि

उस परमब्रह्म का आश्रय (शरण) अमृत= मोक्ष सुखप्रद है और जिसकी

अकृपा या उपासना न करना ही मृत्यु दुःखों का कारण है । उस परब्रह्म

को जानने व प्राप्त करने के लिए ऋषि-मुनियों ने जीवन भर तपस्यारत

होके जो ज्ञान (ब्रह्म-ज्ञान ) प्राप्त किया है । उसी का संग्रह उपनिषद

ग्रन्थों में है । इसलिए इन्हें ब्रह्मज्ञान की उत्कृष्टतम पुस्तकें भी माना

जाता है ।

‘उपनिषद्’ शब्द का यौगिकार्थ भी इसी बात की पुष्टि करता है।

इस शब्द में ‘उप’ तथा ‘नि’ दो उपसर्ग तथा ‘षद्लृ’ धातु है । जिसका

अर्थ यह है’उप सामीप्येन नितरां सीदन्ति प्राप्नुवन्ति परं ब्रह्म यया

विद्यया सा उपनिषद् ।’ अर्थात् उपनिषद् वह विद्या है । जिसके द्वारा

परब्रह्म का ज्ञान होने से परब्रह्म के सामीप्य को प्राप्त किया जा सके ।

और उपनिषत=परब्रह्म-ज्ञान का प्रतिपादन करने से ‘र्इशादि’ ग्रन्थों का

नाम भी उपनिषद् प्रसिद्ध हुआ । श्री शंकराचार्य जी ने उपनिषत् की

व्याख्या करते हुए लिखा है
‘सेयं ब्रह्मविद्या उपनिषद् वाच्या

संसारस्यात्यन्तावसादनात् उपपूर्वस्य सदेस्तदर्थत्वात् ग्रन्थोsप्युपनिषद्

उच्यते ।, (बृहदान भूमिका)
अर्थात् यह उपनिषद् नामक ब्रह्मविद्या

संसार के अत्यन्त अवसादन =उच्छेद करने के लिए है । उपपूर्वक सद्

धातु का ऐसा अर्थ होने से । किन्तु यह सत्य नहीं है । उपनिषत् से

दुखोच्छेद होता है । संसारोच्छेद नहीं । यह-विद्या अत्यन्त गूढ़ होने से

‘रहस्य’ नाम से भी जानी जाती है । व्याकरण महाभाष्य में महर्षि

पतन्जलि ने उपनिषत् को ‘रहस्य’ नाम देकर लिखा है

चत्वारो वेदाः सागः सरहस्या बहुधा भिन्नाः ।

उपनिषदों का अमर सन्देश

उपनिषदों का अमर सन्देश

१. उनिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत ।

क्षुरस्य धरा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत् कवयो वदन्ति ।।

(कठो॰ ३.१४)


अर्थात् अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मनुष्यो ! उठो ।

जागो और अपने श्रेष्ठ (विद्वान् व योगी) पुरुषों के पास जाकर ब्रह्मज्ञान

को सीखो । यह ब्रह्मज्ञान का मार्ग तेज उस्तरे की धार के समान अत्यन्त

दुर्गम है । ऐसा परमात्मा के साक्षात्कार करने वाले उपदेश करते हैं ।

२. कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । (र्इशावास्योप॰ )

हे मनुष्यो ! जीवन भर श्रेष्ठ कर्मो को करते हुए ही जीने की

इच्छा करो ।

३. तेन त्यक्तेन भुन्जीथा मा गृध्ः कस्यस्विद् धनम् ।। (र्इशावा॰ )

अनासक्ति भाव से संसार के भोगों को भोगो और किसी के

धन या वस्तुओं की इच्छा मत करो ।

४. न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः ।। (कठो॰१.२७)

मनुष्य की धन से कभी तृप्ति नहीं हो सकती ।

५. नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।

नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ।। (कठो॰२.२४)

परमात्मा की प्राप्ति केवल बाह्यप्रदर्शन भजन कीर्त्तन से तबतक

कदापि नहीं हो सकती । जबतक पाप-कर्मो में लगा हुआ है । अशान्त इन्द्रियों

के विषयों में फंसा हुआ है । असमाहित= विक्षिप्त चित्त वाला है और

अशान्त मन= जिसका मन तृष्णा में फंसा हुआ है । चाहे कितना ही

विद्वान् हो जाए । उसे उपर्युक्त दुष्कर्म छोड़ने पर ही परमात्मज्ञान हो

सकता है ।

६. भस्मान्तं शरीरम् ।। (र्इशावास्योप॰ )
शरीर का अन्तिम संस्कार भस्मान्त= दाह ​क्रिया ही है । तत्पश्चात्

मृतक के लिए कोर्इ मृतक श्राद्ध या संस्कार शेष नहीं रहता । संसार के

सभी शारीरिक सम्बन्धों का अन्त भी भस्म ही है ।

७. ओ३म कृतो स्मर ।। (र्इशावास्यो॰ )

ओ३म् परमात्मा का मुख्य नाम है । हे कृतो कर्मशील जीव ! तू

ओ३म् का ही स्मरण किया कर ।

८. स पर्यगाच्छुव्म् अकायम् । (र्इशावास्यो॰ )

वह परमात्मा सर्वत्र व्यापक है । सर्वशक्तिमान् तथा स्थूल । सूक्ष्म व

कारणशरीरों से रहित है ।

९. विद्ययाsमृतमश्नुते ।। (र्इशावास्यो॰ )

परमात्मा की प्राप्ति विद्या=आत्मा और शुद्धान्तः करण के संयोगरूप

धर्म से उत्पन्न यथार्थ ज्ञान से होती है ।

१०. ओ३म खं ब्रह्म ।। (र्इशावास्यो॰ )

वह परमात्मा किसी स्थान विशेष में नहीं रहता । वह तो आकाश

के समान व्यापक । ओ३म =सब का रक्षक तथा ब्रह्म=गुण , कर्म , स्वभाव

से सब से बड़ा है ।

11. सत्यमेव जयते नानृतम् ।। (मुण्डको॰ )
सत्य ही की विजय होती है । झूठ की नहीं ।

12. न तस्य काय करणं च विद्यते ।। (श्वेताश्वतर॰ )

उस परमात्मा का कोर्इ कारण नहीं है । और न ही उसका कोर्इ

कार्य ही हैअर्थात् परमात्मा इस जगत् का उपादानकारण नहीं है ।

13. तमेव विदित्वातिमृत्युमेति ।। (श्वेताश्वतर॰ )

मनुष्य एकमात्र परब्रह्म को जानकर ही मृत्युदुः ख से मुक्त हो

सकता है ।

उपनिषद् विषयक महर्षि दयानन्द के वचन

1. वेदान्तसूत्रों के पढ़ने से पूर्व र्इश । केन । कठ । प्रश्न । मुण्डक ।

माण्डूक्य । ऐतरेय । तैतिरीय । छान्दोग्य और बृहदारsयक इन दश उपनिषदों

को पढ़के छः शास्त्रों के भाष्यवृत्ति-सहित सूत्रों को दो वर्ष के भीतर

पढ़ावें और पढ़ लेवें ।, (सत्यार्थन तृतीय समु॰ )

सोमवार, 2 जून 2014

आर्य ईश्वरपुत्रः । निरुक्त ६/२६

आर्य ईश्वरपुत्रः निरुक्त /२६
आर्य ईश्वर के पुत्र का नाम है
कृण्वन्तो विश्वमार्यम ऋग्वेद /६३/
ईश्वर आदेश करता है कि समस्त विश्व को आर्य बनाओ

33 कारोड देवता कौन है

प्रश्न -- 33 कारोड देवता कौन है--------------


: वेदों में वर्णित विभिन्न देवताओं या ईश्वरों के बारे में आप क्या कहेंगे ? 33 करोड़ देवताओं के बारे में क्या?
उत्तर:
1. जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है जो पदार्थ हमारे लिए उपयोगी होते हैं वो देवता कहलाते हैं । लेकिन वेदों में ऐसा कहीं नहीं कहा गया कि हमे उनकी उपासना करनी चाहिए । ईश्वर देवताओं का भी देवता है और इसीलिए वह महादेव कहलाता है , सिर्फ और सिर्फ उसी की ही उपासना करनी चाहिए ।
2. वेदों में 33 कोटि का अर्थ 33 करोड़ नहीं बल्कि 33 प्रकार (संस्कृत में कोटि शब्द का अर्थ प्रकार होता है) के देवता हैं । और ये शतपथ ब्राह्मण में बहुत ही स्पष्टतः वर्णित किये गए हैं, जो कि इस प्रकार है :
8 वसु (पृथ्वी, जल, वायु , अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र ), जिनमे सारा संसार निवास करता है ।
10 जीवनी शक्तियां अर्थात प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त , धनञ्जय ), ये तथा 1 जीव ये ग्यारह रूद्र कहलाते हैं
12 आदित्य अर्थात वर्ष के 12 महीने
1 विद्युत् जो कि हमारे लिए अत्यधिक उपयोगी है
1 यज्ञ अर्थात मनुष्यों के द्वारा निरंतर किये जाने वाले निस्वार्थ कर्म ।
शतपथ ब्राहमण के 14 वें कांड के अनुसार इन 33 देवताओं का स्वामी परमपिता परमात्मा ( महावेव } ही एकमात्र उपासनीय है । जिसका सर्वोत्तम नाम " ओ३म है ।

ईसाई धर्मान्तरण का एक कुत्सित तरीका- प्रार्थना से चंगाई

ईसाई धर्मान्तरण का एक कुत्सित तरीका- प्रार्थना से चंगाई


विश्व इतिहास इस बात का प्रबल प्रमाण हैं की हिन्दू समाज सदा से शांतिप्रिय समाज रहा हैं। एक ओर मुस्लिम समाज ने पहले तलवार के बल पर हिन्दुओं को मुस्लमान बनाने की कोशिश करी थी, अब सूफियो की कब्रों पर हिन्दूओं के सर झुकवाकर, लव जिहाद या ज्यादा बच्चे बनाकर भारत की सम्पन्नता और अखंडता को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं दूसरी ओर ईसाई समाज हिन्दुओ को ईसा मसीह की भेड़ बनाने के लिए रुपये, नौकरी, शिक्षा अथवा प्रार्थना से चंगाई के पाखंड का तरीका अपना रहे हैं।

आज के समाचार पत्र में छपी खबर की चर्च द्वारा दिवंगत पोप जॉन पॉल द्वितीय को संत घोषित किया गया हैं ने सेमेटिक मतों की धर्मांतरण की उसी कुटिल मानसिकता की ओर हमारा ध्यान दिलाया हैं। पहले तो हम यह जाने की यह संत बनाने की प्रक्रिया क्या हैं?

सबसे पहले ईसाई समाज अपने किसी व्यक्ति को संत घोषित करके उसमे चमत्कार की शक्ति होने का दावा करते हैं। विदेशो में ईसाई चर्च बंद होकर बिकने लगे हैं और भोगवाद की लहर में ईसाई मत मृतप्राय हो गया हैं। इसलिए अपनी संख्या और प्रभाव को बनाये रखने के लिए एशिया में वो भी विशेष रूप से भारत के हिन्दुओं से ईसाई धर्म की रक्षा का एक सुनहरा सपना वेटिकन के संचालकों द्वारा देखा गया हैं। इसी श्रृंखला में सोची समझी रणनीति के अंतर्गत पहले भारत से दो हस्तियों को नन से संत का दर्जा दिया गया था ।पहले मदर टेरेसा और बाद में सिस्टर अलफोंसो को संत बनाया गया था और अब जॉन पॉल को घोषित किया गया हैं।







यह संत बनाने की प्रक्रिय अत्यंत सुनियोजीत होती हैं। पहले किसी गरीब व्यक्ति का चयन किया जाता हैं जिसके पास इलाज करवाने के लिए पैसे नहीं होते, जो बेसहारा होता हैं, फिर यह प्रचलित कर दिया जाता हैं की बिना किसी ईलाज के केवल मात्र प्रार्थना से उसकी बीमारी ठीक हो गई और यह कृपा एक संत के चमत्कार से हुई। गरीब और बीमारी से पीड़ित जनता को यह सन्देश दिया जाता हैं की सभी को ईसा मसीह को धन्यवाद देना चाहिए और ईसाइयत को स्वीकार करना चाहिए क्योंकि पगान पूजा अर्थात हिन्दुओं के देवता जैसे श्रीराम और श्रीकृष्ण में चंगाई अर्थात बीमारी को ठीक करने की शक्ति नहीं हैं अन्यथा उनको मानने वाले कभी के ठीक हो गए होते।







अब जरा ईसाई समाज के दावों को परिक्षा की कसौटी पर भी परख लेते हैं।







मदर टेरेसा जिन्हें दया की मूर्ति, कोलकाता के सभी गरीबो को भोजन देने वाली, अनाथ एवं बेसहारा बच्चो को आश्रय देने वाली, जिसने अपने जन्म देश को छोड़ कर भारत के गटरों से अतिनिर्धनों को सहारा दिया, जो की नोबेल शांति पुरस्कार की विजेता थी, एक नन से संत बना दी गयी की उनकी हकीकत से कम ही लोग वाकिफ हैं। जब मोरारजी देसाई की सरकार में धर्मांतरण के विरुद्ध बिल पेश हुआ तो इन्ही मदर टेरेसा ने प्रधान मंत्री को पत्र लिख कर कहाँ था की ईसाई समाज सभी समाज सेवा की गतिविधिया जैसे की शिक्षा, रोजगार, अनाथालय आदि को बंद कर देगा अगर उन्हें अपने ईसाई मत का प्रचार करने से रोका जायेगा। तब प्रधान मंत्री देसाई ने कहाँ था इसका अर्थ क्या यह समझा जाये की ईसाईयों द्वारा की जा रही समाज सेवा एक दिखावा मात्र हैं और उनका असली प्रयोजन तो धर्मान्तरण हैं।



यही मदर टेरेसा दिल्ली में दलित ईसाईयों के लिए आरक्षण की हिमायत करने के लिए धरने पर बैठी थी। महाराष्ट्र में 1947 में एक चर्च के बंद होने पर उसकी संपत्ति को आर्यसमाज ने खरीद लिया। कुछ दशकों के पश्चात ईसाईयों ने उस संपत्ति को दोबारा से आर्यसमाज से ख़रीदने का दबाव बनाया। आर्यसमाज के अधिकारीयों द्वारा मना करने पर मदर टेरेसा द्वारा आर्यसमाज के पदाधिकारियों को देख लेने की धमकी दी गई थी।



प्रार्थना से चंगाई में विश्वास रखने वाली मदर टेरेसा खुद विदेश जाकर तीन बार आँखों एवं दिल की शल्य चिकित्सा करवा चुकी थी। यह जानने की सभी को उत्सुकता होगी की हिन्दुओं को प्रार्थना से चंगाई का सन्देश देने वाली मदर टेरेसा को क्या उनको प्रभु ईसा मसीह अथवा अन्य ईसाई संतो की प्रार्थना द्वारा चंगा होने का विश्वास नहीं था जो वे शल्य चिकित्सा करवाने विदेश जाती थी?







अब सिस्टर अलफोंसो का उदहारण लेते हैं। वह केरल की रहने वाली थी। अपनी करीब तीन दशकों के जीवन में वे करीब २० वर्ष तक अनेक रोगों से स्वयं ग्रस्त रही थी। केरल एवं दक्षिण भारत में निर्धन हिन्दुओं को ईसाई बनाने की प्रक्रिया को गति देने के लिए संभवत उन्हें भी संत का दर्जा दे दिया गया और यह प्रचारित कर दिया गया की उनकी प्रार्थना से भी चंगाई हो जाती हैं।



अभी हाल ही में सुर्ख़ियों में आये दिवंगत पोप जॉन पॉल स्वयं पार्किन्सन रोग से पीड़ित थे और चलने फिरने से भी असमर्थ थे। यहाँ तक की उन्होंने अपना पद अपनी बीमारी के चलते छोड़ा था।







पोप जॉन पॉल को संत घोषित करने के पीछे कोस्टा रिका की एक महिला का उदहारण दिया जा रहा हैं जिसके मस्तिष्क की व्याधि का ईलाज करने से चिकित्सकों ने मना कर दिया था। उस महिला द्वारा यह दावा किया गया हैं की उसकी बीमारी पोप जॉन पॉल द्वितीय की प्रार्थना करने से ठीक हो गई हैं। पोप जॉन पॉल चंगाई करने की शक्ति से संपन्न हैं एवं इस करिश्मे अर्थात चमत्कार को करने के कारण उन्हें संत का दर्ज दिया जाये।







इस लेख का मुख्य उद्देश्य आपस में वैमनस्य फैलाना नहीं हैं अपितु पाखंड खंडन हैं। ईसाई समाज से जब यह पूछा जाता हैं की आप यह बताये की जो व्यक्ति अपनी खुद की बीमारी को ठीक नहीं कर सकता, जो व्यक्ति बीमारी से लाचार होकर अपना पद त्याग देता हैं उस व्यक्ति में चमत्कार की शक्ति होना पाखंड और ढोंग के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। अपने आपको चंगा करने से उन्हें कौन रोक रहा था?



यह तो वही बात हो गई की खुद निसंतान मर गए औरो को औलाद बक्शते हैं। ईसाई समाज को जो अपने आपको पढ़ा लिखा समाज समझता हैं इस प्रकार के पाखंड में विश्वास रखता हैं यह बड़ी विडम्बना हैं। मदर टेरेसा, सिस्टर अल्फोंसो, पोप जॉन पॉल सभी अपने जीवन में गंभीर रूप से बीमार रहे। उन्हें चमत्कारी एवं संत घोषित करना केवल मात्र एक छलावा हैं, ढोंग हैं, पाखंड हैं, निर्धन हिन्दुओं को ईसाई बनाने का एक सुनियोजित षडयन्त्र हैं। अगर प्रार्थना से सभी चंगे हो जाते तब तो किसी भी ईसाई देश में कोई भी अस्पताल नहीं होने चाहिए, कोई भी बीमारी हो जाओ चर्च में जाकर प्रार्थना कर लीजिये। आप चंगे हो जायेगे। खेद हैं की गैर ईसाईयों को ऐसा बताने वाले ईसाई स्वयं अपना ईलाज अस्पतालों में करवाते हैं।



मेरा सभी हिन्दू भाइयों से अनुरोध हैं की ईसाई समाज के इस कुत्सित तरीके की पोल खोल कर हिन्दू समाज की रक्षा करे और सबसे आवश्यक अगर किसी गरीब हिन्दू को ईलाज के लिए मदद की जरुरत हो तो उसकी धन आदि से अवश्य सहयोग करे जिससे वह ईसाईयों के कुचक्र से बचा रहे।

डॉ विवेक आर्य

रविवार, 1 जून 2014

प्रतिमा-पूजन वेद विरूद्ध

प्रतिमा-पूजन वेद विरूद्ध 



विषयवती वा प्रवृनिरुत्पन्ना मनस: स्थितिनिबन्ध्नी ।

(योग॰ समा॰ ३५)


इस सूत्रा के भाष्य में लिखा है कि--

एतेन चंद्रदित्यग्रहमणिप्रदीपरत्नादिषु प्रवृ्त्तिरुत्पन्ना विषयवत्येव

वेदितव्येति ।


इससे प्रतिमा-पूजन कभी नहीं आ सकता । क्योंकि इन में देवबुद्धि करना नहीं लिखा । किन्तु जैसे वे जड़ हैं, वैसे ही योगी लोग उनको जानते

हैं । और बाह्यमुख जो वृ्त्ति, उस को भीतर मुख करने के वास्ते योगशास्त्र

की प्रवृत्ति है । बाहर के पदार्थ का ध्यान करना, योगी लोग को नहीं

लिखा । क्योंकि जितने सावयव पदार्थ हैं, उनमें कभी चिन की स्थिरता नहीं

होती । और जो होवे तो मूर्तिमान् धन, पुत्रा, दारादिक के मयान में सब संसार

लगा ही है । परन्तु चि्त्त की स्थिरता कोर्इ की भी नहीं होती । इस वास्ते

यह सूत्रा लिखा--

विशोका वा ज्योतिष्मती (योग॰स॰६६)

प्रतिमा शब्द -- "दयानन्द शास्त्रार्थ, प्रश्नोनर-संग्रह"

प्रतिमा शब्द -- "दयानन्द शास्त्रार्थ, प्रश्नोनर-संग्रह"

 

इसके आगे जिन शब्दों के अर्थ के नहीं जानने से, टीकाकारों को भ्रम


हो गया है तथा नवीन ग्रन्थ बनाने वाले और कहने वाले तथा सुनने वाले


को भी भ्रम होता है । उन शब्दों का शास्त्रा रीति तथा प्रमाण और युक्ति से,


जो ठीक-ठीक अर्थ है, उन्हीं का प्रकाश संक्षेप से लिखा जाता है । प्रथम


तो एक प्रतिमा शब्द है ।



प्रतिमीयते यया सा प्रतिमा ।

अर्थात् प्रतिमानम् जिससे प्रमाण अर्थात् परिमाण किया जाये, उसको

कहना प्रतिमा, जैसे कि कृटांक, आध्पाव, पावसेर, सेर, पसेरी इत्यादि और

यज्ञ के चमसादिक पात्रा । क्योंकि इन से पदाथो के परिमाण किये जाते हैं।

इससे इन्हों का ही नाम है प्रतिमा । यही अर्थ मनु भगवान् ने मनुस्मृति में

लिखा--

तुलामानं प्रतिमानं सर्व च स्यात् सुलक्षितम् ।

षट्सु षट्सु च मासेषु पुनरेव परीक्षयेत् ।।

पक्ष-पक्ष में, वा मास-मास में, अथवा छठवें-छठवें मास तुला की राजा

परीक्षा करे । क्योंकि तराजू की दण्डी में भीतर छिद्र करके पारा उसमें डाल

देते हैं । जब कोर्इ पदार्थ को तौल के लेने लगते हैं, तब दण्डी को पीछे

नमा देते हैं । फिर पारा पीछे जाने से चीज अधिक आती है । और, जब

देने के समय में दण्डी आगे नमा देते हैं उससे चीज थोड़ी जाती है । इससे

तुला की परीक्षा अवश्य करनी चाहिए तथा प्रतिमान अर्थात् प्रतिमा की परीक्षा

अवश्य करे । राजा जिस से कि अधिक, न्यून प्रतिमा अर्थात् दुकान के बाट

जितने हैं, उन्हों का ही नाम प्रतिमा । इसी वास्ते प्रतिमा के भेदक अर्थात्

घाट बाढ़ तौलने वाले के उफपर दण्ड लिखा है--

संक्रमवजयष्टीनां प्रतिमानां च भेदक: ।

प्रतिकुर्याच्च तत्सव पंच दद्या्च्छतानि च ।।

यह मनु जी का श्लोक है । इसका अभिप्राय यह है कि संक्र्म अर्थात्

रथ, उस रथ के मवजा की यष्टि, जिसके उफपर मवजा बांधी जाती है, और

प्रतिमा छटांक आदिक बटखरे, इन तीनों को तोड़ डाले वा अधिक न्यून कर

देवे, उनको उससे राजा बनवा लेवे । और जैसा जिसका ऐश्वर्य, उसके योग्य

दण्ड करे । जो दरिद्र, होवे तो उससे पांच सौ पैसा राजा दण्ड लेवे । जो

कु्छ धनाढ्य होवे तो पांच सौ रुपया उससे दण्ड लेवे । और जो बहुत

धनाढय होवे, उससे पांच सौ अशर्फी दण्ड लेवे । रथादिकों को उसी के

हाथ से बनवा लेवे । इससे सज्जन लोग बटखरा तथा चमसादिक यज्ञ के

पात्रा उन्हीं को ही प्रतिमा शब्द से निश्चित जानें ।