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गुरुवार, 22 मई 2014

सोम

सोम 

यजुर्वेद प्रथम अध्याय जैसे यह सूर्यलोक , मेघ के वध के लिए , जल को स्वीकार करता है , जैसे जल , वायु को स्वीकार करते हैं , वैसे ही हे मनुष्यों ! तुम लोग उन जल औषधि - रसों को शुद्ध करने के लिए , मेघ के शीघ्र - वेग में , लौकिक पदार्थों का अभिसिंचन करने वाले , जल को स्वीकार करो और जैसे वे जल शुद्ध होते हैं , वैसे ही तुम भी शुद्ध हो जाओ |

परमेश्वर ने सूर्य एवं अग्नि की रचना इसलिए की, कि वे सभी पदार्थों में प्रवेश कर उनके रस एवं जल को तितर - बितर कर दें ताकि वह पुन: वायुमंडल में जाकर और वर्षा के रूप में फिर धरती पर आ कर सबको शुचिता और सुख प्रदान कर सके |

"आपोSअस्मान् मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्व: पुनन्तु ।
विश्व हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्य: शुचिरा पूतSएमि |
दीक्षातपसोस्तनूरसि तां त्वा शिवा शग्मां परिदधे भद्रं वर्णम पुष्यन् ।"
।। यजुर्वेद, ४ , २ ।।


मनुष्य को चाहिए कि जो सब सुखों को देने वाला , प्राणों को धारण करने वाला तथा माता के समान , पालन - पोषण करने वाला जो जल है , उससे शुचिता को प्राप्त कर , जल का शोधन करने के पश्चात ही , उसका उपयोग करना चाहिए , जिससे देह को सुंदर वर्ण , रोग - मुक्त देह प्राप्त कर , अनवरत उपक्रम सहित , धार्मिक अनुष्ठान करते हुए , अपने पुरुषार्थ से आनंद की प्राप्ति हो सके ।

वैदिक ऋषियों ने वैज्ञानिकों की तरह जल एवं वायु को प्रदूषण - मुक्त करने की बात कही है । यजुर्वेद में उन्होंने यह परामर्श भी दिया है कि हम वर्षा - जल को भी , किस प्रकार औषधीय गुणों से परिपूर्ण कर सकते हैं ।

" अपो देवीरुपसृज मधुमतीरयक्ष्मार्य प्रजाभ्य: ।
तासामास्थानादुज्जिहतामोषधय: सुपिप्पला: । । "
यजुर्वेद / ११ / ३८ /


राजा के पास दो तरह के वैद्य होना चाहिए । एक वैद्य , सुगन्धित पदार्थों के होम से , वायु , वर्षा - जल एवं औषधियों को शुद्ध करे । दूसरा श्रेष्ठ विद्वान् , वैद्य बनकर , प्राणियों को रोग -रहित रखे , " सर्वे भवन्तु सुखिन:" हमारा आदर्श है और इस आदर्श के निर्वाह के लिए इन दोनों दायित्वों का निर्वाह अनिवार्य है ।

वेद में मानव जीवन को ' कृषि - जीवन ' कहा गया है और इसीलिए , जलश्रोतों से हमारा रागात्मक सम्बन्ध रहा है । नदियों को हमने , देवी - स्वरूपा , माता की संज्ञा से अभिहित किया है ।' ऋग्वेद ' की इस ऋचा में ' सरस्वती ' नदी की महिमा गाई गई है -

" अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति ।
अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमंब नस्कृधि ।। "
ऋग्वेद / २ / ८ / १४ /


हे सर्वोत्तम माते सरस्वती ! तू सर्वोत्तम नदी के समान है । जिन नदियों का प्रवाह प्रकट है , वे गंगा - यमुना जैसी , श्रेष्ठ नदियाँ हैं , परन्तु तेरा प्रवाह गुप्त है , इसलिए तू श्रेष्ठ्तम है । तू सभी देवताओं में श्रेष्ठ , आलोक प्रदाता है । हमारा जीवन अप्रशस्त जैसा बन गया है । हे माता ! तू उसे प्रशस्त कर । हम उपेक्षित हैं , निन्दित हैं । हे माता ! तू हमारा पथ प्रशस्त कर ।

" यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टय: संबभूवु:।
यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा नो भूमि: पूर्व पेये दधातु ।। "
अथर्ववेद / द्वादश - काण्डम् / ३ /


सागर ,नदी , कुआँ और वर्षा का जल तथा कृषि कार्य आदि से , जो मनुष्य , नाव , जहाज कला - यंत्र आदि का , विधेयात्मक प्रयोग करता है , वह सबको आनन्द प्रदान करता है । ऐसा व्यक्ति स्वत: भी श्रेष्ठ पद को प्राप्त करता है ।

"शं त आपो हैमवती: शमु ते सन्तूत्स्या: ।
शं ते सनिष्पदा आप: शमु ते सन्तु वर्ष्या:।। "
अथर्ववेद/ एकोनविंश काण्डम् / १ /


मनुष्य को चाहिए कि वह वर्षा , कुऑ ,नदी और सागर के जल को , अपने खान-पान , खेती और शिल्प- कला आदि के लिए उपयोग करे एवम् अपने जीवन को सम्पूर्ण बनाए और चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करे ।

"अनभ्रय: खनमाना विप्रा गम्भीरे अंपस: ।"
भिषग्भ्यो भिषक्तरा आपो अच्छा वदामसि ।।"
अथर्ववेद / एकोनविंश काण्डम् / 3 /

विद्वान् ,जिज्ञासु , वैद आदि तपस्वी साधक , अनेक तरह के रोगों में , जल के प्रयोग के द्वारा , जल के अनन्त गुणों की आपस में व्याख्या करें और समाज के हित में उसका भरपूर उपयोग करें ।

वैदिक ऋषियों का जीवन एक प्रयोग- शाला थी । उन्होंने चिन्तन, मनन और निदिध्यासन से जो उपलब्धि हासिल की , उसे जन- कल्याण हेतु समर्पित कर दिया।

"अपामह दिव्यानामपां स्त्रोतस्यानाम् ।
अपामह प्रणेजनेSश्वा भवथ वाजिन: ॥"
अथर्ववेद / एकोनविंश / काण्डम् / 4 /


जल - चिकित्सा बहुत ही प्रभावी चिकित्सा पद्धति है , समस्त रोगों का निदान इससे सम्भव है। मनुष्य को चाहिये कि वह सागर , वर्षा , नदी , सरोवर आदि के जल को आवश्यकतानुसार चिकित्सा मे उपयोग कर के खेती के संसाधन की तरह , जल का प्रयोग करके , निरोग. वेगवान , प्रखर , एवम् बलशाली बने और समाज के हित में अपनी प्रतिभा एवम् अपने बल का समुचित उपयोग कर सके ।

"ता अप: शिवा अपोSय मं करणीरप: ।
यथैव तप्यते मयस्तास्त आ दत्त भेषजी:।।"
अथर्ववेद / एकोनविंश / काण्डम् / 5 /


जल की महत्ता के विषय में , मैं इतना ही कहना चाहती हूँ कि " जल है तो कल है " इस बात को हमारे पूर्वज , भली - भांति जानते थे और यही कारण है कि उन्होने, जल की महिमा का बखान , वेद- वांग्मय एवम् सभी धर्म- ग्रंथों में किया है । हमें जल बचाने का उपक्रम करना चाहिये । जल के महत्व को समझ कर , सावधानी - पूर्वक उसका उपयोग करना चाहिये ताकि हम अपनी भावी पीढी के लिए जल बचा कर रखें , जैसे हमारे पूर्वज हमारे लिए , जल का विशाल भंडार छोड कर गए हैं। यजुर्वेद - दयानंद सरस्वती

रविवार, 18 मई 2014

वैदिक-एकेश्वरवाद-अर्थात-ईश्वर-एक-हैं

वैदिक-एकेश्वरवाद-अर्थात-ईश्वर-एक-हैं

By Veda Mandan Pakhand Khandan on Wednesday, May 7, 2014 at 1:53pm
वैदिक-एकेश्वरवाद-अर्थात-ईश्वर-एक-हैंहमारा महान आर्यव्रत देश सृष्टी के प्रारंभ से लेकर महाभारत युद्ध के कुछ काल पश्चात तक विश्व गुरु के रूप में संसार का मार्ग दर्शन करता रहा.कालांतर में वेद विद्या का लोप होने से, धर्म के नाम पर अनेक मत मतान्तरों का प्रचलन होने से, धार्मिक क्रम कांडों के नाम पर यज्ञों में पशु बलि, मांस, मदिरा, मैथुन से ईश्वर प्राप्ति होने के पाखंड के प्रचलित होने से ,वेदों में वर्णित सच्चिदानंदस्वरुप, सर्वव्यापक, सर्वत्र, सर्वशक्तिमान, निराकार, निर्विकार, अजन्मा, अविनाशी, न्यायकारी, दयालु,जगत के कर्ता-धर्ता एक ईश्वर का स्थान अज्ञानी, अनेक अवतार धारण कर जन्म लेने वाले एवं मृत्यु को प्राप्त होने वाले,साकार, एकदेशीय आदि अवगुणों वाले अनेक ईश्वरों (बहुदेवतावाद) ने ले लिया. आर्याव्रत देश की सबसे बड़ी शक्ति उसकी अध्यात्मिक उन्नति थी जिससे वो संसार भर को अपने विज्ञान से प्रकाशित करता आ रहा था. इस पतन के कारण न केवल उसके ज्ञान का नाश हुआ अपितु अनेक मत मतान्तरों के प्रचलित होने से उसकी एकता और अखंडता नष्ट हो गयी जिससे वह विदेशी हमलावरों के सामने प्रतिकार न कर सका और अपनी स्वतंत्रता खोकर सदियों के लिए गुलाम बन गया.वेदों के अप्रतिम विद्वान,सत्य के महान अन्वेषक, वेदों के भाष्यकार, संसार में वैदिक धर्म को पुनर्जीवित करने वाले ऋषिवर दयानंद सरस्वती ने वेदों के विषय में वर्णित सभी भ्रांतियों में से वेदों में वर्णित ईश्वर के सत्य स्वरुप को सिद्ध करने में विशष श्रम किया.उन्ही से प्रेरणा पाकर इस लेख में वेदों में वर्णित एकेश्वरवाद अर्थात “ईश्वर एक हैं” का प्रतिपादन करेंगे.वेदों में वर्णित ईश्वर के विषय में प्रमुख भ्रान्ति इस प्रकार हैं की ईश्वर एक नहीं अनेक हैं, वेदों में अनेक देवताओं जैसे इन्द्र, अग्नि, वायु आदि का वर्णन हैं.वेदों में एकेश्वरवाद अर्थात एक ईश्वर होने के प्रमाणऋग्वेद ६/५१/१६- हे मनुष्य ! जो एक ही सब मनुष्यों का ठीक ठीक देखने वाला सर्वज्ञ सुखों की वर्षा करने वाले कर्म व ज्ञान वाला सर्वशक्तिमान सबका स्वामी हैं, तू सदा उसी की स्तुति कर.ऋग्वेद ८/१/१- हे मित्रों तुम किसी अन्य की विशेष स्तुति अर्थात प्रार्थना उपासना न करो और इस प्रकार अन्यों की स्तुति करके मत दुःख उठाओं. सदा एकांत में और मिलकर किये हुए यज्ञों में सुख, शांति और आनंद की वर्षं करने वाले एक परमेश्वर की ही स्तुति करो और बार बार उसी के स्तुति वचनों का उच्चारण करो.ऋग्वेद १/१६४/४६ में एक ईश्वर होने का महान सन्देश “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” हैं. विद्वान ज्ञानी लोग एक ही सत्यस्वरूप परमेश्वर को विविध गुणों को प्रकट करने के लिए इन्द्र, मित्र,वरुण आदि अनेक नामों से पुकारते हैं. परम ऐश्वर्य संपन्न होने से परमेश्वर को इन्द्र, सबका स्नेही होने से मित्र, सर्वश्रेष्ठ और अज्ञान व अन्धकार निवारक होने से वरुण, ज्ञान स्वरुप और सबका अग्रणी नेता होने से अग्नि, सबका नियामक होने से यम, आकाश,जीवादी में अन्तर्यामिन रूप में व्यापक होने से मातरिश्वा आदि नामों से उस एक की ही स्तुति करते हैं.सामवेद मंत्र २५९ में सायण आचार्य इस कथन की पुष्टि करते हैं.Maxmuller writes in the six systems of philosophy that whatever is the age when the collection of our rigveda samhita was finished, it was before that age, that the conception had been formed that there is but one, one being neither male nor female, a being raised high above all the conditions and limitations of personality and of human nature and nevertheless the being that was really meant by all such names as Indra, Agni,Matrishwan and by the name of Prajapati- Lord of Creatures.प्रो. मक्समूलर तथा यूरोप के कई अन्य विद्वान इस प्रकार के स्पष्ट एकेश्वरवाद प्रतिपादक वेदमंत्रों को ईसाइयत अथवा विकासवाद के पक्षपात के कारण पीछे की रचना बताने का प्रयत्न करते हैं. इस पक्षपात का स्पष्ट प्रमाण प्रो.मक्समूलर द्वारा लिखित History of Ancient Sanskrit Literature में इस प्रकार मिलता हैंI add only one more hymn (Rig 10,121) in which the idea of one god is expressed with such power and decision that it will make us hesitate before we deny to the Aryans an instinctive monotheism.In Vedic Hymns page 3 maxmuller writes about same hymn as “This is one of the Hymns which has always been suspected as modern by European interpreters.”ऋग्वेद के १०/१२१/१० प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्व जातानि परि ता बभूव मन्त्र के विषय में मक्स मूलर लिखते हैं की this last verse is to my mind the most suspicious of all अर्थात यह अंतिम मंत्र जिसमें परमेश्वर को संबोधन करते हुए कहा गया हैं की तुम्हें छोड़कर अन्य कोई भी इस सारे जगत में व्यापक और इसका स्वामी नहीं हैं, मेरी सम्मति में सबसे अधिक संदेहास्पद हैं.वेदों में जिन मन्त्रों में एकेश्वरवाद का स्पष्ट उपदेश हैं उन्हें मानने में पाश्चात्य विद्वानों द्वारा संकोच करना ईसाई पक्षपात और विकासवाद के मिथक सिद्धांत का पोषक हैं.ऋग्वेद ६/२२/१- जो परमेश्वर सब मनुष्यों का एक ही पूजनीय हैं, उसकी इन वाणियों से चारों ओर से प्रेमपूर्वक पूजा कर.ऋग्वेद १०/७२ सूक्त के मंत्र २,३,६ में तीन बार ईश्वर के लिए एक शब्द का प्रयोग हुआ हैं. वेदों में एकेश्वरवाद सिद्ध न हो शायद इसीलिए ऋग्वेद के दसवें मंडल को नवीन सिद्ध करने का प्रयास पाश्चात्य विद्वानोंद्वारा किया गया जो संदेहास्पद हैं.ऋग्वेद १०/७२/२- वह जगतकर्ता परमेश्वर विविध मनों का स्वामी, आकाश के तुल्य व्यापक, संसार का धारण करने वाला, विशेष रूप से सूर्य चन्द्र तथा लोक लोकान्तरों का धारण ओर पोषण करने वाला, अत्यंत उत्कृष्ट ओर सर्वज्ञ हैं, जिस परमेश्वर के विषय में विद्वान् कहते हैं की वह सात इन्द्रियों से परे एक ही हैं और जिस परमेश्वर के आश्रय में उन इन्द्रियादी के अभिलाषित सब भोग्य पदार्थ उस प्रभु की प्रेरक शक्ति से भली प्रकार हर्ष के कारण बनते हैं.ऋग्वेद १०/७२/३ -जो परमेश्वर हमारा पालक हैं, उत्पादक हैं और जो विशेष रूप से हमारा धारण करने वाला और सब स्थानों लोकों और उत्पन्न पदार्थों को जानता हैं, जो सब देवों- इन्द्र , मित्र, वरुण, अग्नि, यम इत्यादि से नाम को प्रधानतया धारण करने वाला एक ही देव हैं उस अच्छी प्रकार से जानने योग्य परमेश्वर की ओर ही अन्य सब लोक ओर प्राणी गति कर रहे हैं.ऋग्वेद १०/७२/६ -प्रकृति ओर उसके परमाणुओं को सबसे पूर्व धारण करने वाला वही एक परमेश्वर हैं , इस अज-प्रकृति, सत्व या प्रधान की नाभि में एक ब्रहम तत्व ही ऊपर अधिष्ठाता रूप में विराजमान हैं, जिसके आधार पर सब लोक स्थित हैं, जो सारे जगत का संचालक ओर अध्यक्ष हैं.ऋग्वेद के १० वें मंडल के अतिरिक्त भी अन्य मंडलों में एकेश्वरवाद के अनेक प्रमाण हैं जैसेऋग्वेद ८/२५/१६ – यह प्रजाओं का स्वामी एक ही हैं, वह एक ही संसार का स्वामी सब प्रजाओं का ठीक ठीक निरिक्षण करता हैं. सब कुछ जानता हैं.ऋग्वेद ८/१/२७ – जो परमेश्वर एक, अत्यंत आश्चर्यजनक, महान और अपने व्रतों के कारण अति तेजस्वी और दुष्टों के लिए भयंकर हैं उसी का ध्यान सबको करना चाहिए.ऋग्वेद १/१००/७ – परमेश्वर को सब करुणापूर्ण शुभ कर्मों का एकमात्र स्वामी बताया गया हैं.ऋग्वेद १/५४/१४- जिस परमेश्वर के आकाश और पृथ्वी, समुद्र और अन्य लोक-लोकान्तर अंत नहीं पा सकते वह सब में ओत-प्रोत हैं, ऐसा वह परमेश्वर एक ही हैं.सामवेद ३७२ और अथर्ववेद ७/२१/१ – हे मनुष्यों! तुम सब सरल भाव और आत्मिक बल के साथ परमेश्वर की ओर उसका ध्यान- भजन के लिए आओ, जो एक ही मनुष्यों में अतिथि की तरह पूजनीय अथवा सर्वव्यापक हैं. वह सनातन- नित्य हैं और नए उत्पन्न पदार्थों के अन्दर भी व्याप रहा हैं. ज्ञान-कर्म-भक्ति के सब मार्ग उसकी और जाते हैं. वह निश्चय से एक ही हैं.ऋग्वेद २/१/३ और २/१/४ में परमात्मा को अग्नि के नाम से संबोधित करते हुए कहा गया हैं की तू ही इन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा और ब्रह्मणस्पति हैं, तू ही वरुण, मित्र, अर्यमा आदि नामों से पुकारा जाता हैं अर्थात परम ऐश्वर्य संपन्न होने से वही परमेश्वर इन्द्र, सर्वव्यापक होने से विष्णु, सबसे बड़ा होने से ब्रह्मा, ज्ञान स्वामी होने से वरुण, सबका स्नेही होने से मित्र और न्यायकारी होने से अर्यमा के नाम से याद किया जाता हैं.अथर्ववेद १३/४/५ – वही परमात्मा अर्यमा, वरुण, इन्द्र, महादेव, अग्नि,सूर्य, महायम इत्यादि नामों से पुकारा जाता हैं. वह एक परमात्मा ही नमस्कार करने योग्य हैं.इस प्रकार अनेक वैदिक मन्त्रों के प्रमाणों से यह सिद्ध होता हैं की वेदों में एक ही ईश्वर का वर्णन हैं जो उपासना करने योग्य हैं.

वैदिक धर्म की प्रमाणिकता

वैदिक धर्म की प्रमाणिकता !

By Veda Mandan Pakhand Khandan on Wednesday, May 7, 2014 at 2:00pm
वैदिक धर्म की प्रमाणिकता !इस तथ्य को विश्व के सभी इतिहासकार , धार्मिक विद्वान् ,और वैज्ञानिक स्वीकार कर चुके हैं ,वैदिक धर्म सबसे प्रचीन धर्म है , और वेद ही धर्म का मूल हैं .केवल वेदों के सिद्धांत ही विज्ञानं की कसौटी पर खरे पाए गएँ हैं . क्योंकि वेद को लेन वाला कोई फ़रिश्ता नहीं था ,और न वेद सातवें आसमान से जमीन पर उतारे गए थे .इनके सिद्धांत सार्वभौमिक और अटल हैं . जो एकेश्वरवाद (Monotheism ) पर आधारित हैं .लेकिन बड़े दुःख की बात है कि आजकल के हिन्दू वेद के इस सिद्धांत को छोड़कर एक ईश्वर की जगह , भुत प्रेत , साईँ , फ़क़ीर ,यहाँ तक कब्रों तक की पूजा करने लगे हैं .और यही कारण है कि मुसलमान हिन्दुओं को मुशरिक , और काफ़िर कहते हैं . जबकि एकेश्वरवाद एक वैदिक सिद्धांत है , जो भारत से निकल कर .ईरान से होते हुए पुरे मध्य एशिया तक फ़ैल गया था .जिसे इस्लाम ने भी स्वीकार कर लिया .बाद में सिख धर्म ने भी एकेश्वरवाद की पुष्टि कर दी .प्रमाण के लिए उपनिषद् , कुरान और श्रीगुरु ग्रन्थ साहब के ऐसे अंश दिए जा रहे हैं ,जिनमे कुछ शब्दों के अंतर जरुर हैं ,लेकिन सबका आशय और भाव एक ही है .1-वैदिक धर्म"दिव्यो ह्य मूर्तः पूरुषः सबाह्यान्तारो ह्यजः ,अप्रमाणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात परतः परः .मुण्डकोपनिषद -मुण्डक 2 मन्त्र 2अर्थ -" निश्चय ही वह इश्वर आकर रहित और अन्दर बाहर व्याप्त है ,वह जन्म के विकार से रहित उसके न् तो प्राण हैं ,न इन्द्रियां है .न मन है .वह इनके विना ही सब कुछ करने में समर्थ हैं .वह अक्षर यानि अविनाशी हैं .और जीवात्मा से अत्यंत श्रेष्ठ हैइसी प्रकार एक और जगह कहा गया है ," न तस्य कश्चित् पतिरस्ति लोके ,न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम ,स कारणम करणाधिपाधिपो ,न चास्य कश्चित्जनिता न चाधिपःश्वेताश्वतर उपनिषद -अध्याय 6 मन्त्र 9अर्थ -"सम्पूर्ण लोक में उसका कोई स्वामी नहीं है ,और न कोई उसपर शासन करने वाला है .और न कोई उसका लिंग ( gendar ) है. वही कारण और सभी कारणों का अधिपति है .और न किसी ने उसे जन्म दिया है और न कोई उसका पालक ही है "2-इस्लामقُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ ١ اللَّهُ الصَّمَدُ ٢ لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ ٣ وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُوًا أَحَدٌ ٤ "سورة الإخلاص -112:"कुल हुवल्लाहू अहद .अल्लाहुससमद .लम यलिद व् लम यूलद .व् लम यकुन कुफ़ुवन अहद"सूरा इखलास -112अर्थ -कह दो कि अल्लाह एक है ,अल्लाह निराधार और सर्वाधार है ,उसकी कोई औलाद नहीं है और न वह किसी की औलाद है .और कोई ऐसा नहीं जो उसके बराबर हो .3-सिख धर्मੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਜਪੁ ॥ ਆਦਿ ਸਚੁ ਜੁਗਾਦਿ ਸਚੁ ॥ਹੈ ਭੀ ਸਚੁ ਨਾਨਕ ਹੋਸੀ ਭੀ ਸਚੁ ॥੧ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥ जपु ॥ आदि सचु जुगादि सचु ॥ है भी सचु नानक होसी भी सचु ॥॥ १॥श्रीगुरुग्रंथ साहब - मूलमन्त्रअर्थ -इश्वर है ,उसका नाम ओंकार और सत्य है .वह जगतका कर्ता है . निर्भय है . वर हर प्रकार के वैर से रहित काल से परे है ,वह अजन्मा और स्वयंभू है .गुरु के प्रसाद से उसी के नाम का जाप करो .वह ईश्वर प्रारंभ में भी सत्य है और युगों तक सत्य ही रहेगा "वेद और कुरान के उद्धरण साथ में देने से हमारा उदेश्य इस्लाम को वैध सिद्ध करना नहीं है और उसका महिमामंडन करना भी नहीं है , क्योंकि यह ज्ञान भारत से ही अरब गया था .और दूसरों से धन चुराने वाले को धनवान नहीं कहा जा सकता .जहाँ तक श्रीगुरु ग्रन्थ साहब की बात है ,तो उसमे ऐसी हजारों बातें मौजूद है ,जो वेदों शिक्षा से मेल खाती हैं .हमारा वास्तविक उदेश्य तो उन हिन्दुओं को धर्म के बारे में सही बात बताना है ,जो पाखंड को ही धर्म समझ रहे हैं . और धर्म की जड़ काट कर पत्तों की सिंचाई कर रहे हैं .और ईश्वर की उपासना की जगह अनेकों देवी देवता , भुत प्रेत यानि पीर औलिया और कब्रों पर भी सर झुकाते है , इनके लिए गीता में कहा गया है ,यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये जयन्ते तामसा जनाः॥17/4अर्थात सात्विक लोग तो सिर्फ ईश्वर की उपासना करते हैं . और राजसी लोग यक्ष ,रक्ष ( semi gods ) की पूजा करते हैं , जो सिर्फ कल्पित व्यक्ति यानि अर्ध मानव है और सबसे निकृष्ट वह तामसी लोग हैं वह भूत यानि मुर्दों की कब्रों ,इत्यादि की पूजा करते है ,इत्यादि में निर्मल बाबा , साईँ बाबा , राधे माँ जैसे ढोंगी हैयही नहीं अज्ञानी लोग मुसलमानों की नक़ल करके भूखे रहने को ही तप समझते है , जबकि एसा किसी ग्रन्थ में नहीं लिखा . लोग दिन भर तो भूखे रहते हैं . और शाम को चौगुना खाते है ,इसे तप नहीं कहते .जैसा गीता में कहा है ,अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।दम्भाहङ्‍कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥17/5अर्थात शास्त्र विरुद्ध होने पर भी किसी की देखादेखी जो लोग घोर तप् करते हैं ,वह पाखंडी ,अहंकारी और दिखावे की कामना से यह किया करते हैं , यह तप नहीं है .क्योंकि योग सूत्र में कहा है ,"सुखे दुखे समौ भूत्वा समत्वं योग उच्यते " यही गीता में कहा है,सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥3/28अर्थात सुख और दुःख , हार और जीत , लाभ और हानि की परवाह किये बिना ही धर्म की रक्षा के लिए हम युद्ध करेंगे तो हमें कोई पाप नहीं लगेगा .यानी पाप तो तब लगेगा जब हम मूक दर्शक बने तमाशा यानि टी वी देखते रहेंगे ,या सोचते रहेंगे कि यदि हम सत्य और धर्म का साथ देंगे तो हमें सम्प्रदायवादी कहेंगे .भर्तरि शतक में एक श्लोक है ,"निन्दन्तु नीति निपुणा , यदि वा स्तुवन्ति ,लक्ष्मी समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टमअद्यैव मरणमस्तु युगान्तरे वान्यायात पथः प्रविचलन्ति पदम् न धीराः .अर्थात - चाहे बातों में निपुण लोग हमारी निंदा करें या हमारी तारीफ़ करें ,चाहे हमारे पास धन का भंडार हो जाये या हम कंगाल हो जाएँ ,और चाहे हम आज ही मर जाएँ , या युगों तक जीवित रहें . लेकिन सत्य के मार्ग से कभी विचलित नहीं हो सकते .और यदि मानते हैं कि वैदिक धर्म प्रमाणिक है तो उसको बचाने , और धर्म के बहाने होने वाले आतंक का विरोध करिएहमें उपलब्ध सभी साधनों का उपयोग करके देश द्रोहियों और धर्म के शत्रुओं का मुकाबला करना होगा .यही धर्म है"विनाशाय च दुष्क्रताम "

वेद क्या हैं

वेद क्या हैं


Original post in English is available at http://agniveer.com/what-are-vedas/
वास्तव में वेद किसे माना जाए, इस पर कई तरह के मत हैं. यहां हम इस भ्रम को दूर करने का प्रयास करेंगे. वैदिक साहित्य में सम्मिलित होने वाली पुस्तकें:
१. वेद मंत्र संहिताएँ – ऋग्, यजुः, साम, अथर्व.
२. प्रत्येक मंत्र संहिता के ब्राह्मण.
३. आरण्यक.
४. उपनिषद (असल में वेद, ब्राह्मण और आरण्यक का ही भाग).
५. उपवेद (प्रत्येक मंत्र संहिता का एक उपवेद).
वास्तव में केवल मंत्र संहिताएँ ही वेद हैं. अन्य दूसरी पुस्तकें जैसे ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, ६ दर्शन, गीता इत्यादि ऋषियों द्वारा लिखी गई हैं. यह सब मनुष्यों की रचनाएँ हैं, परमात्मा की नहीं. अत: जहां तक यह सब वेद के अनुकूल हो, वहीं तक समझना और अपनाना चाहिए.
प्रश्न. कात्यायन ऋषि के अनुसार तो ब्राह्मण भी ईश्वरीय हैं तब आप ब्राह्मणों को वेदों का भाग क्यों नहीं मानते?
उत्तर.  १. ब्राहमण ग्रंथों को इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा और नाराशंसी भी कहते हैं. इन में ऋषियों ने वेद मन्त्रों की व्याख्याएँ की हैं. इसलिए ये ऋषियों की रचनाएँ हैं ईश्वर की नहीं.
२.शुक्ल यजुर्वेद के कात्यायन प्रतिज्ञा परिशिष्ट को छोड़कर (कई विद्वान कात्यायन को इस का लेखक नहीं मानते) अन्य कोई भी ग्रन्थ ब्राह्मणों को वेदों का भाग नहीं कहता.
३. इसी तरह, कृष्ण यजुर्वेद के श्रौत सूत्र भी मन्त्र और ब्राहमण को एक बताते हैं. किन्तु कृष्ण यजुर्वेद में ही मन्त्र और ब्राहमण सम्मिलित हैं. अत: यह विचार केवल उसी ग्रन्थ के लिए संगत हो सकता है. जैसे ‘ धातु’ शब्द का अर्थ पाणिनि व्याकरण में – ‘ मूल’ , पदार्थ विज्ञान में ‘धातु’ (metal) और आयुर्वेद में जो शरीर को धारण करे या बनाये रखे – रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य और ओज होता है. ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद और सामवेद की किसी शाखा में ब्राह्मणों के वेद होने का प्रमाण नहीं मिलता.
४. वेद ईश्वर का शाश्वत ज्ञान हैं. उन में कोई इतिहास नहीं है. पर ब्राहमण ग्रंथों में ऐतिहासिक व्यक्तियों का वर्णन और इतिहास मिलता है.
५. वैदिक साहित्य के सभी प्रमुख ग्रन्थ ऋग्वेद, यजुर्वेद,सामवेद और अथर्ववेद की मन्त्र संहिताओं को ही वेद मानते हैं.
वेद :
ऋग १०.९०.३, यजु ३१.७, अथर्व १९.६.१३, अथर्व १०.७.२०, यजु ३५.५, अथर्व १.१०.२३, ऋग ४.५८.३,यजु १७.९ १( निरुक्त के अनुसार १३.६ ), अथर्व १५.६.९ ,अथर्व १५.६.८, अथर्व ११.७.२४
उपनिषद् :
बृहदारण्यक उपनिषद २.४.१०, १.२.५, छान्दोग्य उपनिषद् ७.१.२, मुण्डक १.१.५, नृसिंहपूर्वतपाणि, छान्दोग्य ७.७.१, तैत्तरीय १.१, तैत्तरीय २.३

ब्राह्मण:
शतपथ ब्राह्मण ११.५.८, गोपथ पूर्व २.१६, गोपथ १.१.२९

महाभारत:
द्रोणपर्व ५१.२२, शांतिपर्व २३५.१, वनपर्व १८७.१४, २१५.२२, सभापर्व ११.३१

स्मृति:
मनुस्मृति : १.२३
पुराण :
पद्मा ५.२.५०, हरिवंश, विष्णु पुराण १.२२.८२, ५.१.३६, ब्रह्मवैवर्त १४.६४
अन्य:
महाभाष्य पाश पाशणिक,कथक संहिता ४०.७,अथर्ववेद सायन भाष्य १९.९.१२,बृहदारण्यवार्तिकसार (२.४) सायन,सर्वानुक्रमणिभूमिका,रामायण ३.२८

इत्यादि.शंकराचार्य ने भी चारों मन्त्र संहिताओं को ही वेद माना है – “चतुर्विध मंत्रजातं  ” (शंकराचार्य बृहदारण्यक भाष्य २ .४ .१ ० )
६. ब्राह्मण ग्रन्थ स्वयं भी वेद होने की घोषणा नहीं करते .
७. शतपथ ब्राह्मण के अनुसार वेदों में कुल ८.६४ लाख शब्द हैं.यदि ब्राह्मणों को भी शामिल किया जाता, तो यह संख्या कहीं अधिक होती.
८. केवल मन्त्र ही जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वज, दंड, रथ और घन पाठ की विधियों से सुरक्षित किए गए हैं. ब्राह्मण ग्रंथों की सुरक्षा का ऐसा कोई उपाय नहीं है.
९. केवल मन्त्रों के लिए ही स्वर भेद और मात्राओं का उपयोग किया जाता है. ब्राह्मणों के लिए नहीं.
१०. प्रत्येक मन्त्र का अपना विशिष्ट ऋषि, देवता, छंद और स्वर है. ब्राह्मण ग्रंथों में ऐसा नहीं है.
११. यजु: प्रतिशाख्य में कहा गया है कि मन्त्रों से पूर्व ‘ओम’ और ब्राह्मण श्लोकों से पूर्व ‘अथ’ बोला जाना चाहिए. इसी तरह की बात ऐतरेय ब्राह्मण में भी कही गयी है.
१२. ब्राह्मणों में स्वयं उनके लेखकों की जानकारी मिलती है. और मन्त्रों की व्याख्या करते हुए कई स्थानों पर कहा है “नत्र  तिरोहितमिवस्ति” - हमने सरल भागों को छोड़ कर केवल कठिन भागों की ही व्याख्या की है.
What-are-Vedas
प्रश्न. पुराणों को ब्राह्मण कैसे कहा जा सकता है जब कि पुराणों का अर्थ को वेद व्यास के बनाये १८ पुराणों से है?
उत्तर. यह एक बहुत ही गलत धारणा है. पुराण का अर्थ पुरातन या पुराना है और यह नए पुराण तो बहुत आधुनिक समय में लिखे गए हैं.
तैत्तरीय आरण्यक २.९ और आश्वलायन गृह्यसूत्र ३.३.१ में स्पष्ट वर्णित है कि ब्राह्मण ही कल्प, गाथा, पुराण, इतिहास या नाराशंसी कहे जाते हैं. आचार्य शंकर भी बृहदारण्यक उपनिषद २.४.१० के भाष्य में यही कहते हैं.
तैत्तरीय आरण्यक ८.२१ की व्याख्या में सायण का भी यही मत है. काफ़ी प्राचीन माने जाने वाले शतपथ ब्राह्मण(३.४.३.१३) अश्वमेध यज्ञ के ९ वें दिन पुराणों को सुनने का विधान करते हैं. अब यदि पुराणों से मतलब नए ब्रह्मवैवर्त आदि पुराणों से है, तो श्री राम और श्री कृष्ण आदि ने अश्वमेध यज्ञ के ९ वें दिन किस का श्रवण किया था? वेद व्यास के जन्म के बहुत पहले ही ब्राह्मण ग्रंथ मौजूद थे. इन नए पुराणों को झूठे ही वेद व्यास पर थोपा गया है. ब्रह्मवैवर्त पुराण को पढने के बाद तो उसे योग दर्शन पर भाष्य करने वाले ऋषि की रचना मानना संभव ही नहीं है.
प्रश्न. वेदों में इतिहास भी है – जैसे यजुर्वेद ३.६२ में जमदग्नि और कश्यप ऋषियों के नाम मिलते हैं. कई वैदिक मंत्रों में ऐतिहासिक व्यक्तियों का भी उल्लेख है.
उत्तर. इन से भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है. वेदों में आए जमदग्नि और कश्यप शब्द ऐतिहासिक पुरुष नहीं हैं. शतपथ के अनुसार जमदग्नि का अर्थ आंखें तथा कश्यप शब्द का अर्थ प्राण या जीवनीय शक्ति है.और वेदों में यही अर्थ प्रयुक्त हुआ है.
इसी तरह, वेदों में आए हुए सभी नाम गुणवाचक हैं. बाद में मनुष्यों ने इन शब्दों को नाम के रूप में अपना लिया. जैसे, महाभारत में आए हुए लाल और कृष्ण – आडवाणी नहीं हो सकते और शंकराचार्य द्वारा वर्णित ‘माया’  का मतलब आज की मायावती से नहीं है. ऐसा ही वेदों में आये शब्दों के साथ भी है.
प्रश्न. वेदों की शाखाएं क्या हैं? वेदों की ११३१ शाखाएं बतलाई जाती हैं, जो बहुत सी लुप्त हो गई हैं, तब यह कैसे माना जाए कि वेद मूल स्वरुप में ही हैं?
उत्तर. वेदों की शाखाओं का तात्पर्य मूल वेद संहिताओं से नहीं है. वेदों को समझने, उनके अध्ययन आदि तथा वेदों की व्याख्या करने के लिए शाखाएं बनाई गई हैं. समय – समय पर प्रचलित प्रणालियों के अनुसार मन्त्रों के अर्थ सरल करने के लिये शाखाएं मूल मन्त्रों में परिवर्तन करती रहती हैं. किसी यज्ञ विशेष के लिए या अन्य किन्ही कारणों से कई शाखाएं मूल मंत्रों के क्रम को आगे- पीछे भी करती हैं. इसी तरह कुछ शाखाओं में मंत्र तथा ब्राह्मण ग्रंथों का भाग मिला दिया गया है.
मूल चारों वेद संहिताएँ  – अपौरुषेय हैं. वेदों की शाखाएं तथा ब्राह्मण ग्रंथ मनुष्य कृत हैं. उन्हें वहीं तक विश्वासयोग्य माना जा सकता है जहां तक वे वेदों के अनुकूल हैं. मूल मंत्र संहिताओं का परम्परा से जतन किया गया है और विद्वानों ने भी भाष्य उन पर ही किया है.
प्रश्न. अन्य ग्रंथ  - उपनिषद, उपवेद,गीता इत्यादि क्या ईश्वरीय नहीं हैं?
उत्तर. इस का उत्तर बहुत कुछ पहले भी दिया जा चुका है. यह सब हमारे महान पूर्वजों – ऋषियों द्वारा निर्मित महान ग्रंथ हैं पर यह भी ईश्वरीय रचना वेदों की बराबरी नहीं कर सकते.
यदि इन ग्रंथों की रचना ईश्वरीय होती तो यह वेदों की ही तरह अद्वितीय रक्षा पद्धति से युक्त होते. पर वेदों के अलावा अन्य किसी भी ग्रंथ में यह लक्षण नहीं दिखता.
अत: इन ग्रंथों में भी जो बातें वेदों के विपरीत हैं उन्हें मान्य नहीं किया जा सकता क्योंकि ईश्वरीय ज्ञान सर्वोपरि है. यह बात विश्व की सभी पुस्तकों पर लागू होती है. हमारी संस्कृति के सभी ग्रंथ वेदों को ही सत्य का अंतिम प्रमाण मानते हैं.
प्रश्न.  वेदों में तो केवल कर्म कांड और ईश्वर पूजा का ही विधान है. क्या दर्शन तथा अन्य व्यवहारिक ज्ञान के लिए हमें दूसरे ग्रंथों की आवश्यकता नहीं है ?
उत्तर. ये झूठी बातें वेदों को न पढने वाले लोगों ने फ़ैला रखी हैं. हमारी संस्कृति के सभी महान ग्रंथकार अपनी रचना को वेदों पर आधारित ही बताते हैं. वे वेदों को ही सब सत्य विद्या का मूल मानते हैं.
उपनिषद ,गीता जैसे सभी दार्शनिक ग्रंथों का उद्गम भी वेद ही हैं. यह सभी ग्रंथ वेद और सत्य को समझने के लिए ही बनाये गए और इन ग्रंथों में ऐसी कोई बात नहीं है जो वेदों में पहले से ही मौजूद नहीं हो. जैसे कि हम पहले चर्चा कर चुके हैं – वेद परम प्रमाण हैं और अन्य ग्रंथ तो उस तक पहुंचने की सीढियां मात्र हैं – इसलिए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि कहीं कोई सीढ़ी हमें वेदों से दूर तो नहीं ले जा रही.
वेद एकमात्र सर्वत्र व्यापक ईश्वर का ही बखान करते हैं और शाश्वत ज्ञान की निधि होने से उन में कहीं कोई कर्म कांड नहीं है. अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए ही पथभ्रष्ट लोगों ने वेदों के विषय में गलत धारणाएं फैलाईं हैं.यह हमारा परम कर्तव्य है कि हम इन सभी पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर – वेद और उसके सत्य उद्देश्य का प्रचार करें.
सत्यमेव जयते!
अनुवादक- आर्यबाला

ईश्वर निराकार और अजन्मा है यजु॰ ४०।८

भगवान निराकार और अजन्मा अर्थात कभी न जन्म लेने वाला है-----
“” यजुर्वेद “”

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरंशुद्ध्मपापविद्धम ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयव्हह्रभूर्याथातथ्यतोअर्थान व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः
समाभ्यः ॥ यजु॰ ४०।८

अर्थात----- जो ब्रह्म शीघ्रकारी , तेजस्वी , सर्वशक्तिमान ( अकायम अव्रणम अस्नाविरम ) कारण , सूक्ष्म , एवं स्थूल शरीरों से रहित अर्थात कभी भी नस नाडी के बन्धन मे न आनेवाला अविद्या आदि दोषों से रहित , सदा पवित्र , पापसंसर्ग से सदा पृथक , सर्वज्ञ , अन्तर्यामी दुष्टों का तिरस्कार करने वाला ,( स्वयंभू ) स्वसत्ता में परानपेक्ष , अनादिस्वरूप अनादि स्वरूप अर्थात जिसकी संयोग से उत्पत्ति , विभाग से नाश , माता पिता , गर्भवास ,जन्म , वृद्धि ह्रास , मरण , कभी नही होते ( परिअगात ) सर्वत्र व्यापक है । वही परमेश्वर नित्य जीवरूप प्रजाओं को ( याथातथ्यतः ) ठीक ठीक रीति से वेद द्वारा सब पदार्थों को देता है अथवा कर्मफल देता है ।
इस मन्त्र मे ईश्वर के अनेक गुणों का वर्णन है, यहां विशेष उल्लेख के योग्य उसका सब शरीर बन्धनों से रहित है । किस मनोरम रीति से ईश्वर की निराकारता का प्रतिपादन किया है ।   

न तस्य प्रतिमा यजुर्वेद ३२।३

“ ईश्वर निराकार है “-----
उसकी को प्रतिमा या मूर्ति नही हो सकती
“”” यजुर्वेद “””

न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद यशः ।
हिरण्यगर्भ इत्येष मा मा हिन्सीदत्येषा यस्मात्र जात इत्येष ॥ यजु॰ ३२।३

भावार्थ – हे मनुष्यो ! ( यस्य ) जिसका ( महत ) पूज्य बडा ( यशः ) कीर्ति करनेहारा धर्मयुक्त कर्म का आचरण ही ( नाम ) नामस्मरण है , जो ( हिरण्यगर्भः ) सूर्य बिजुली आदि पदार्थो का आधार ( इति ) इस प्रकार ( एषः ) अन्तर्यामी होने से प्रत्यक्ष जिसकी ( मा ) मुझको ( मा, हिंसत ) मत ताड्ना दे वा वह अपने से मुझ को विमुख मत करे, ( इति ) इस प्रकार ( एषा ) यह प्रार्थना वा बुद्धि और ( यस्मात ) जिस कारण ( न ) नही ( जातः ) उत्पन्न हुआ ( इति ) इस प्रकार ( एषः ) यह परमात्मा उपासना के योग्य है । ( तस्य ) उस परमेश्वर की ( प्रतिमा ) प्रतिमा – परिणाम उसके तुल्य अवधि का साधन का साधन प्रतिकृति , मूर्ति वा आकृति व प्रतिबिम्ब ( न , अस्ति ) नही है ।
भावार्थ ------ हे मनुष्यो ! जो कभी देहधारी नहीं होता , जिसका कुछ भी परिमाण सीमा का कारण ( ‘कारण’ अर्थात जिसके होने से कार्य होता है ) नही है , जिसकी आज्ञा का पालन ही उसका नामस्मरण करना है, जो उपासना किया हुआ अर्थात जिसकी सब उपासना करते है, अपने उपासकों पर अनुग्रह ( कृपा ) करता है. वेदों के अनेक स्थलों में जिसका महत्व कहा गया है, जो नहीं मरता , न विकृत होता है ,न नष्ट होता उसी की उपासना निरन्तर करो । जो इससे भिन्न की उपासना तो करोगे तो इस महान पाप से युक्त हुए आप लोग दुःख – क्लेशों से नष्ट हो जाओगे ॥ ३ ॥

वेद और राक्षस

वेद और राक्षस



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एक भ्रांत कल्पना यह भी कर ली गई है कि आर्यों ने यहां के निवासियों को राक्षस नाम से पुकारा और उनका वध किया | अतः आर्यों के अत्याचार का शिकार माने गए दास या दस्यु ही राक्षस समझ लिए गए हैं | वस्तुतः राक्षस शब्द का अर्थ दस्यु या दास के काफ़ी पास है | परंतु राक्षस को भिन्न नस्ल या वंश मानना कोरी कल्पना ही है |
पहले के लेखों में हम देख ही चुके हैं कि दास या दस्यु कोई भिन्न जाति या नस्ल नहीं बल्कि विध्वंसकारी गतिविधियों में रत मनुष्यों को ही कहा जाता था |
इस लेख में हम राक्षस कौन हैं और वेद में स्त्री राक्षसी के भी वध की आज्ञा क्यों दी गई है ? यह देखेंगे -
ऋग्वेद ७ |१०४| २४
हे राजेन्द्र !  आप पुरुष राक्षस का और छल कपट से हिंसा करने वाली स्त्री राक्षसी का भी वध करो | वे दुष्ट राक्षस भोर का उजाला न देखें |
यहां राक्षसों को यातुधान ( जो मनुष्यों के निवास स्थान पर आक्रमण करते हैं ) और क्रव्याद ( कच्चा मांस खाने वाले ) कहा गया है |
ऋग्वेद ७|१०४|१७
जो राक्षसी रात में उल्लू के समान हिंसा करने के लिए निकलती है, वह अन्य राक्षसों के साथ नष्ट हो जाए |
ऋग्वेद ७|१०४| १८
हे बलवान रक्षकों ! आप प्रजा में विविध प्रकार से रक्षा के लिए स्थित हों | विध्वंसकारी और रात्रि में आक्रमण करने वाले राक्षसों को पकड़ें |
ऋग्वेद ७|१०४|२१
परम ऐश्वर्यशाली राजा, हिंसा करने वाले तथा शांतिमय कार्यों में विघ्न करने वाले राक्षसों का नाशक है |
ऋग्वेद ७|१०४|२२
उल्लू, कुत्ते, भेड़िये, बाज़ और गिद्ध के समान आक्रमण करनेवाले जो राक्षस हैं, उनका संहार करो |

स्पष्ट है कि राक्षस शब्द तबाही मचाने वाले, क्रूर आतंकियों और भयंकर अपराधियों के लिए प्रयुक्त हुआ है | ऐसे महादुष्ट पुरुष या स्त्री दोनों ही दंड के पात्र हैं |
इसी सूक्त के दो मंत्र राक्षस कर्म से बचने के लिए कहते हैं -
ऋग्वेद ७|१०४|१५
यदि मैं यातुधान ( मनुष्यों के निवास स्थान पर आक्रमण करने वाला) हूं और यदि मैं किसी मनुष्य के जीवन को नष्ट करता हूं | यदि मैं ऐसा हूं तो, हे भगवन! मैं आज ही मर जाऊं | परंतु यदि मैं ऐसा नहीं हूं तो, जो मुझको व्यर्थ ही यातुधान कहता है वह नष्ट हो जाए |
ऋग्वेद ७|१०४|१६
जो मुझको यातुधान या राक्षस कहता है, जबकि मैं राक्षस नहीं हूं, और जो राक्षसों के साथ होने पर भी स्वयं को पवित्र कहता है ऐसे दोनों प्रकार के मनुष्यों का नाश हो |
जो सदाचारी जनों को झूठे ही कलंकित करे और स्वयं राक्षसों – आतंकियों का समर्थक होकर भी सदाचारी बनने का दंभ करे, ऐसे भयंकर समाज घातकों के लिए भी वेद में दयाभाव के बिना विनाश की आज्ञा है |

आइए, इन प्रार्थनाओं को सफ़ल बनाएं, समूचे विश्व से राक्षसों- आतंकियों का नामो – निशान मिटा दें |

अनुवादक: आर्यबाला

वेद और दस्यु

वेद और दस्यु

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मैकाले की कुटिल शिक्षा नीति के कारण ही अनेक भारतीय विद्वान भी यह मानते हैं कि वेद में कथित आर्यों और दस्युओं के संघर्ष का वर्णन है | आर्य लोग मध्य एशिया से आए हैं | भारत के मूल निवासी दास या दस्यु थे, जिन्हें आर्यों ने आकर लूटा, खदेडा, पराजित कर दास बनाया, कठोर व्यवहार कर उनसे नीचा काम करवाया और सदा के लिए भारतवर्ष पर आधिपत्य स्थापित कर लिया |
वेदों के बारे में पाश्चात्य विद्वानों ने यह लाल बुझक्कड़ वाली कल्पना इस देश की वैदिक विचारधारा, सभ्यता, संस्कृति को नष्ट कर पाश्चात्य पद्धतियों के प्रचार – प्रसार तथा यहां साम्राज्य स्थापित करने के लिए ही गढ़ी थी | और इस देश का सत्यानाश करने के षड्यंत्र में शामिल उनके पुछल्ले साम्यवादी भी यही राग अलापते रहते हैं कि आर्यों ने अपनी महत्ता को जन्मगत भेदभाव के आधार पर प्रस्थापित किया |
भारतवर्ष को विभाजित करनेवाले इन्हीं विचारों के कारण आज स्वयं को द्रविड़ तथा दलित कहलानेवाले भाई – बहन जो अपने आप को अनार्य मानते हैं – उनके मन में वेदों के प्रति तथा उन्हें मानने वालों के प्रति घृणा और द्वेष का ज़हर भर गया है, परिणाम देश भुगत ही रहा है |
उनकी इस निराधार कल्पना का खंडन कई विद्वान कर चुके हैं | यहां तक कि डा. अम्बेडकर भी उनके इन विचारों से सहमत नहीं थे | क्योंकि  इस मिथ्या विवाद का आधार वेदों को बताया जा रहा है तो अब हम वेदों से ही आर्य और दस्यु के वास्तविक अर्थ जानेंगे | यही इस लेख का मूल उद्देश्य है |
आरोप :   वेदों में कई स्थानों पर आर्य और दस्यु का वर्णन आया है | कई मंत्र दस्यु के विनाश तथा आर्यों के रक्षा की प्रार्थना करते हैं | कुछ मंत्र तो यह भी कहते हैं कि जो स्त्रियां भी दस्यु पाई जाएं तो उन्हें भी नहीं बख्शना चाहिए |  इसलिए इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि वेद में दस्युओं पर आर्यों के अत्यंत घातक आक्रमण का वर्णन है |
समाधान :  ऋग्वेद में दस्यु से संबंधित ८५ मंत्र हैं | जिन में से कई दास के संदर्भ में भी हैं, जो दस्यु का ही पर्यायवाची है | आइए उन में से कुछ के अर्थ देखें -
ऋग्वेद १|३३|४
हे शूरवीर राजन्  ! विविध शक्तियों से युक्त आप एकाकी विचरण करते हुए अपने शक्तिशाली अस्त्र से धनिक दस्यु (अपराधी) और सनक: (अधर्म से दूसरों के पदार्थ छीनने वाले ) का वध कीजिये | आपके अस्त्र से वे मृत्यु को प्राप्त हों | यह सनक: शुभ कर्मों से रहित हैं |
यहां  दस्यु  के  लिए  ‘अयज्व’  विशेषण आया है अर्थात् जो शुभ कर्मों और संकल्पों से रहित हो और ऐसा व्यक्ति पाप कर्म करने वाला अपराधी ही होता है |  अतः यहां राजा को प्रजा की रक्षा के लिए ऐसे लोगों का वध करने के लिए कहा गया है | सायण ने इस में दस्यु का अर्थ चोर किया है | दस्यु का मूल ‘ दस ‘ धातु है जिसका अर्थ होता है – ‘ उपक्क्षया ‘ – जो नाश करे  | अतः दस्यु कोई अलग जाति या नस्ल नहीं है, बल्कि दस्यु का अर्थ विनाशकारी और अपराधी प्रवृत्ति के लोगों से है |
ऋग्वेद १|३३|५
जो दस्यु (दुष्ट जन ) शुभ कर्मों से रहित हैं परंतु शुभ करने वालों के साथ द्वेष रखने वाले हैं,  आपकी रक्षा के प्रताप से वे भाग जाते हैं | हे पराक्रमी राजेन्द्र !  आपने सभी स्थानों से ‘ अव्रत ‘  (शुभ कर्म रहित ) जनों को निकाल बाहर किया है |  इस मंत्र में दस्यु के दो विशेषण आए हैं – ‘ अयज्व ‘ = शुभ कर्म और संकल्पों से रहित , ‘ अव्रत ‘ = नियम न पलनेवाला तथा अनाचारी | साफ़ है, दस्यु शब्द अपराधियों के लिए ही आया है | और सभ्य समाज में ऐसे लोगों को दिए जानेवाले दंड का ही विधान वेद करते हैं |
ऋग्वेद १|३३|७
हे वीर राजन् !  इन रोते हुए या हँसते हुए दस्युओं को इस लोक से बहुत दूर भगा दीजिये और उन्हें नष्ट कर दीजिये तथा  जो शुभ कर्मों से युक्त तथा ईश्वर का गुण गाने वाले मनुष्य हैं उनकी रक्षा कीजिये |
ऋग्वेद १|५१|५
हे राजेन्द्र ! आप अपनी दक्षता से छल कपट से युक्त ‘ अयज्वा’  ‘ अव्रती’ दस्युयों को कम्पायमान करें, जो प्रत्येक वस्तु का उपभोग केवल स्वयं के लिए ही करते हैं, उन दुष्टों को दूर करें | हे मनुष्यों के रक्षक ! आप उपद्रव, अशांति फैलानेवाले दस्युओं के नगर को नष्ट करें और सत्यवादी सरल प्रकृति जनों की रक्षा करें |
इस मंत्र में दान- परोपकार से रहित, सब कुछ स्वयं पर ही व्यय करने वाले को दस्यु कहा है |
कौषीतकी ब्राह्मण में ऐसे लोगों को असुर कहा गया है | जो दान न करे वह असुर है,  अतः  असुर और दास दोनों का तात्पर्य दुष्ट अपराधी जनों से है |
ऋग्वेद १|५१|६
हे वीर राजन्  !  आप प्रजाओं का शोषण करने वालों की हत्या और ऋषियों की रक्षा करते हैं |  और दुसरों  की सहायता करने वालों के कल्याण के लिए आप महादुष्ट जनों को भी कुचल देते हैं | सदा से ही आप दस्यु ( दुष्ट जनों )  के हनन के लिए ही उत्पन्न होते हैं |
यहां दस्यु के लिए ‘ शुष्ण ‘ का प्रयोग है – जिसका अर्थ है शोषण – दु:ख  देना |
ऋग्वेद १|५१|७
हे परमेश्वर ! आप आर्य और दस्यु को अच्छे प्रकार जानते हैं | शुभ कर्म करने वालों के लिए आप ‘ अव्रती’  (शुभ कर्म के विरोधी ) दस्युओं को नष्ट करो | हे भगवन् !  मैं सभी उत्तम कर्मों के प्रति पालन में आपकी प्रेरणा सदा चाहता हूं |

ऋग्वेद १|५१|९
हे राजेन्द्र ! आप नियमों का पालन करने वाले तथा शुभ कर्म करने वाले के कल्याण हेतु व्रत रहित दस्यु का संहार करते हो | स्तुति करने वालों के साथ द्वेष रखने वाले, अनाचारी, ईश्वर गुण गान रहित लोगों को वश में रखते हो |
ऋग्वेद १|११७|२१
हे शूरवीर सेनाधीशों !  आप उत्तम जनों की रक्षा तथा दस्यु का संहार करो |
इस मंत्र में रचनात्मक कार्यों में संलग्न मनुष्यों को आर्य कहा गया है |
ऋग्वेद १|१३०|८
हे परम ऐश्वर्यवान् राजा ! आप तीन प्रकार के – साधारण, स्पर्धा के लिए और सुख की वृद्धि के लिए किए जाने वाले संग्रामों में यजमानम् आर्यम् ( उत्तम गुण, कर्म स्वभाव के लोग ) का रक्षण करें | और अव्रतान् ( नियन के न् पलनेवाले, दुष्ट आचरण वाले ), जिनका अंत: करण काला हो गया है, हिंसा में रत या हिंसा की इच्छा करने वाले को नष्ट कर दें |
यहां ‘ कृष्ण त्वक् ‘  शब्द से कलि त्वचा वाले लोगों की कल्पना कर ली गई है | जब की यहाँ ‘ कृष्ण त्वक् ‘ का अर्थ अंत: करण का दुष्ट भाव है | साथ ही यहां ‘ ततृषाणाम् ‘ और  ‘अर्शसानम्’  भी आए हैं,  जिनका अर्थ है – हिंसा करना चाहना और हिंसा में रत | इस के विरुद्ध आर्य यहां श्रेष्ठ और परोपकारी मनुष्यों के लिए आया है |
इस से स्पष्ट होता है  कि आर्य और दस्यु शब्द गुण वाचक हैं, जाति वाचक नहीं हैं |
ऋग्वेद ३|३४|९
यह मंत्र भी दस्यु का नाश और आर्य की रक्षा का अर्थ रखता है | यहां आर्य के लिए वर्ण शब्द आया है, वर्ण अर्थात्  स्वीकार किए जाने योग्य इसलिए आर्य वर्ण = स्वीकार करने योग्य उत्तम व्यक्ति |
ऋग्वेद ४|२६|२
मैं आर्य को भूमि देता हूं, दानशील मनुष्य को वर्षा देता हूं और सब मनुष्यों के लिए अन्य संपदा देता हूं |
यहां आर्य दान शील मनुष्यों के विशेषण रूप में आया है |
ऋग्वेद के अन्य मंत्र हैं -
ऋग्वेद ४|३०|१८
ऋग्वेद ५|३४|६
ऋग्वेद ६|१८|३
ऋग्वेद ६|२२|१०
ऋग्वेद ६|२२|१०
ऋग्वेद ६|२५|२
ऋग्वेद ६|३३|३
ऋग्वेद ६|६०|६
ऋग्वेद ७|५|७
ऋग्वेद ७|१८|७
ऋग्वेद ८|२४|२७
ऋग्वेद ८|१०३|१
ऋग्वेद १०|४३|४
ऋग्वेद १०|४०|३
ऋग्वेद १०|६९|६
इन मंत्रों में भी आर्य और दस्यु दास शब्दों के विशेषणों से पता चलता है कि अपने गुण, कर्म और स्वभाव के कारण ही मनुष्य आर्य और दस्यु नाम से पुकारे जाते हैं | अतः उत्तम स्वभाव वाले, शांतिप्रिय, परोपकारी गुणों को अपनाने वाले आर्य तथा अनाचारी और अपराधी प्रवृत्ति वाले दस्यु हैं |
ऋग्वेद ६|२२|१० दास को भी आर्य बनाने की शिक्षा देता है | साफ़ है कि आर्य और दस्यु का अंतर कर्मों के कारण है जाति के कारण नहीं |
ऋग्वेद ६|६०|६ में कहा गया है – यदि आर्य ( विद्वान श्रेष्ठ लोग ) भी अपराधी प्रवृत्ति के हो जाएं तो उनका भी संहार करो | यही भावना  ऋग्वेद १०|६९|६ और १०|८३|१ में व्यक्त की गई है |
अतः आर्य कोई सदैव बने रहने वाला विशेषण नहीं है | आर्य गुणवाचक शब्द है | श्रेष्ठ गुणों को धारण करनेवाले आर्य कहलाते हैं | अगर वह अपने गुणों से विमुख हो जाएं – अपराधिक प्रवृत्तियों में लिप्त हो जाएं – तो वह भी दस्यु की तरह ही दंड के पात्र हैं |
अथर्ववेद  ५ | ११ |३ वर्णन करता है कि ईश्वर के नियमों को आर्य या दास कोई भंग नहीं कर सकता |
शंका : इस मंत्र में आर्य और दास शब्दों से दो अलग जातियां होने का संदेह होता है | यदि दास का अर्थ अपराधी है तो ईश्वर अपराधियों को अपराध करने ही क्यों देता है ? जबकि वो स्वयं कह रहा है कि मेरे नियम कोई नहीं तोड़ सकता ? 
 समाधान :
ईश्वर के नियमानुसार मनुष्य का आत्मा कर्म करने में स्वतंत्र है | वह अपने लिए भले या बुरे दोनों प्रकार के कर्मों में से चुनाव कर सकता है | लेकिन, कर्म का फ़ल उसके हाथ में नहीं है | कर्मफल प्राप्त करने में जीवात्मा ईश्वर के अधीन है |  यही इस मंत्र में दर्शाया गया है |
इसी सूक्त के अगले दो मंत्रों अथर्ववेद ५|११|४ और ५|११|६ में कहा गया है कि बुरे लोग भी ईश्वर के अपरिवर्तनीय नियमों से डरते हैं, परंतु वे मनुष्यों से भयभीत नहीं होते और उपद्रव करते रहते हैं |  इसलिए यहां ईश्वर से प्रार्थना है कि बदमाश और अपराधियों की नहीं चले, वे दबे रहें और विद्वानों को बढ़ावा मिले |
यहां बदमाश अपराधियों के लिए दास या दस्यु ही नहीं आए बल्कि कई मंत्रों में ज्ञान, तपस्या और शुभ कर्मों से द्वेष करने वालों के लिए ‘ ब्रह्म द्वेषी ‘ शब्द भी आया है |
ऋग्वेद के ३|३०|१७ तथा ७|१०४|२ मंत्र  ब्रह्म द्वेषी, नरभक्षक, भयंकर और कुटिल लोगों को युद्ध के द्वारा वश में रखने को कहते हैं | अब जैसे ब्रह्म द्वेषी, नरभक्षक, भयंकर और कुटिल कोई अलग जाति नहीं है, मनुष्यों में ही इन अवगुणों को अपनानेवालों को कहते हैं | उसी तरह, अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को दास, दस्यु और ब्रह्म द्वेषी कहते हैं – यह अलग कोई जाति या नस्ल नहीं है |
ऋग्वेद ७|८३|७ इसे और स्पष्ट करता हुआ कहता है कि दस अपराधी प्रवृत्ति के राजा मिलकर भी एक सदाचारी राजा को नहीं हरा सकते | क्योंकि उत्तम मनुष्यों की प्रार्थनाएं हमेशा पूर्ण होती हैं और उन्हें बहुत से बलवान जनों का सहयोग और साधन भी मिलते हैं | यहां अपराधी प्रवृत्ति के लिए ‘ अयज्व ‘ आया है जो कि ऊपर के कुछ मंत्रों में दस्यु के लिए भी आ चुका है | और कथित बुद्धिवादी पाश्चात्यों ने इस में दस राजाओं का युद्ध दिखाने का प्रयास किया है !
अंत में ऋग्वेद के मंत्र ७|१०४|१२ से हम आर्य और दास दस्यु अव्रत अयज्व के संघर्ष को सार रूप में समझें -
” विद्वान यह जानें कि सत् ( सत्य) और असत् ( असत्य) परस्पर संघर्ष करते रहते हैं | सत् – असत् को और असत् – सत् को दबाना चाहता है | परंतु इन दोनों में जो सत् है और ऋत ( शाश्वत सत्य ) है उसी को ईश्वर सदा रक्षा करता है और असत् का हनन करता है | ”

आइए, हम भी झूठा अभिमान त्याग कर, सत् और ऋत के मार्ग पर चलें |

अनुवादक: आर्यबाला

वैदिक १६ संस्कार

वेदो मे सोलह संस्कार -----------------------------

षोडशिन एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने । यजुर्वेद ८ । ३३
अर्थात  सोलह संस्कारों से युक्त परमैश्वर्य देनेवाले गृह - आश्रम करने के लिए तुझे आज्ञा देता हूं ॥
इस मन्त्र मे परमेश्वर ने गृहस्थों के लिए सोलह संस्कारों के करने की स्पष्ट आज्ञा दी है । 

 वैदिक १६ संस्कार :
 
वैदिक कर्मकाण्ड के अनुसार निम्न सोलह संस्कार होते हैं:
1. गर्भाधान संस्कारः उत्तम सन्तान की प्राप्ति के लिये प्रथम संस्कार।
2. पुंसवन संस्कारः गर्भस्थ शिशु के बौद्धि एवं मानसिक विकास हेतु गर्भाधान के पश्चात्् दूसरे या तीसरे महीने किया जाने वाला द्वितीय संस्कार।
3. सीमन्तोन्नयन संस्कारः माता को प्रसन्नचित्त रखने के लिये, ताकि गर्भस्थ शिशु सौभाग्य सम्पन्न हो पाये, गर्भाधान के पश्चात् आठवें माह में किया जाने वाला तृतीय संस्कार।
4. जातकर्म संस्कारः नवजात शिशु के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की कामना हेतु किया जाने वाला चतुर्थ संस्कार।
5. नामकरण संस्कारः नवजात शिशु को उचित नाम प्रदान करने हेतु जन्म के ग्यारह दिन पश्चात् किया जाने वाला पंचम संस्कार।
6. निष्क्रमण संस्कारः शिशु के दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करने की कामना के लिये जन्म के तीन माह पश्चात् चौथे माह में किया जाने वला षष्ठम संस्कार।
7. अन्नप्राशन संस्कारः शिशु को माता के दूध के साथ अन्न को भोजन के रूप में प्रदान किया जाने वाला जन्म के पश्चात् छठवें माह में किया जाने वाला सप्तम संस्कार।
8. चूड़ाकर्म (मुण्डन) संस्कारः शिशु के बौद्धिक, मानसिक एवं शारीरिक विकास की कामना से जन्म के पश्चात् पहले, तीसरे अथवा पाँचवे वर्ष में किया जाने वाला अष्टम संस्कार।
9. विद्यारम्भ संस्कारः जातक को उत्तमोत्तम विद्या प्रदान के की कामना से किया जाने वाला नवम संस्कार।
10. कर्णवेध संस्कारः जातक की शारीरिक व्याधियों से रक्षा की कामना से किया जाने वाला दशम संस्कार।
11. यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कारः जातक की दीर्घायु की कामना से किया जाने वाला एकादश संस्कार।
12. वेदारम्भ संस्कारः जातक के ज्ञानवर्धन की कामना से किया जाने वाला द्वादश संस्कार।
13. केशान्त संस्कारः गुरुकुल से विदा लेने के पूर्व किया जाने वाला त्रयोदश संस्कार।
14. समावर्तन संस्कारः गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की कामना से किया जाने वाला चतुर्दश संस्कार।
15. पाणिग्रहण संस्कारः पति-पत्नी को परिणय-सूत्र में बाँधने वाला पंचदश संस्कार।
16. अन्त्येष्टि संस्कारः मृत्योपरान्त किया जाने वाला षष्ठदश संस्कार।
उपरोक्त सोलह संस्कारों में आजकल नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म (मुण्डन), यज्ञोपवीत (उपनयन), पाणिग्रहण और अन्त्येष्टि संस्कार ही चलन में बाकी रह गये हैं